नेपाल में चुनाव: अस्थिरता, आकांक्षाएँ और लोकतांत्रिक संक्रमण का गहन विश्लेषण
— शाश्वत तिवारी, स्वतंत्र पत्रकार
नेपाल दक्षिण एशिया का एक ऐसा राष्ट्र है, जिसने पिछले तीन दशकों में राजनीतिक परिवर्तन के अनेक उथल-पुथल भरे दौर देखे हैं। राजशाही से गणतंत्र तक की यात्रा, माओवादी जनयुद्ध से लेकर बहुदलीय लोकतंत्र की स्थापना तक का संघर्ष, और फिर संविधान निर्माण के बाद संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना, इन सबके बीच नेपाल की राजनीति निरंतर पुनर्गठन की प्रक्रिया से गुजरती रही है। ऐसे में नेपाल के चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे राष्ट्र की वैचारिक दिशा, सामाजिक संतुलन और भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं को भी निर्धारित करते हैं।
यह विश्लेषण नेपाल के हालिया चुनावी परिदृश्य, प्रमुख राजनीतिक शक्तियों, मतदाताओं के रुझान, सामाजिक-सांस्कृतिक आयामों, आर्थिक चुनौतियों और भारत-चीन जैसे पड़ोसी देशों के प्रभाव सहित व्यापक संदर्भों का गहन अध्ययन प्रस्तुत करता है। राजशाही से गणतंत्र तक नेपाल में 1990 का जनआंदोलन बहुदलीय लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का आधार बना। किंतु राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और सत्ता संघर्ष के कारण लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकी। 1996 में माओवादी जनयुद्ध आरंभ हुआ, जिसने दस वर्षों तक देश को हिंसा और अस्थिरता में झोंक दिया।
2006 के जनआंदोलन (लोकतंत्र आंदोलन-2) के बाद राजशाही का अंत हुआ और नेपाल एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित हुआ। 2015 में नया संविधान लागू हुआ, जिसने संघीय ढांचा स्थापित किया-7 प्रांतों के साथ एक संघीय शासन प्रणाली। संविधान लागू होने के बाद हुए चुनावों ने नेपाल को नई राजनीतिक दिशा दी, लेकिन स्थायित्व अब भी चुनौती बना हुआ है।
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नेपाल की संघीय संसद द्विसदनीय है, जिसमें दो सदन हैं, पहला, राष्ट्रीय सभा, यह ऊपरी सदन है जिसके 59 सदस्य होते हैं।
दूसरा, प्रतिनिधि सभा, यह निचला सदन है, इसके 275 सदस्य होते है, और ये सरकार गठन में मुख्य भूमिका निभाता है, जिसमें से 165 सदस्यों का प्रत्यक्ष निर्वाचन होता है, इनके निर्वाचन के लिए देश को 165 निर्वाचन क्षेत्रों में बाँटा गया है। प्रत्येक क्षेत्र से एक प्रतिनिधि सीधे जनता द्वारा चुना जाता है। अन्य 110 सदस्यों को राजनीतिक दलों को मिले कुल मत प्रतिशत के आधार पर सीटें आवंटित की जाती हैं। इसमें महिलाओं, दलितों, जनजातियों, मधेसी, पिछड़े वर्ग और अन्य समूहों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाता है। प्रतिनिधि सभा का कार्यकाल सामान्यत 5 वर्ष का होता है।
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यह मिश्रित चुनाव प्रणाली राजनीतिक विविधता को स्थान देती है, लेकिन गठबंधन राजनीति को भी अनिवार्य बना देती है। किसी एक दल के लिए स्पष्ट बहुमत पाना कठिन हो जाता है। नेपाली कांग्रेस उदार लोकतांत्रिक विचारधारा के साथ, ऐतिहासिक रूप से भारत समर्थक रुख लोकतंत्र और बहुलतावाद पर जोर देती है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी, वामपंथी राष्ट्रवाद के साथ के.पी. शर्मा ओली के नेतृत्व में चीन के साथ घनिष्ठ संबंधों की समर्थक हैं।
माओवादी केंद्र पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ के नेतृत्व में जनयुद्ध से मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश के साथ सामाजिक न्याय और संघीयता पर जोर हैं।
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी अपेक्षाकृत नया दल है जो भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडा के साथ, शहरी युवाओं में लोकप्रिय हैं। नेपाल के तराई क्षेत्र के अधिकारों की मांग है कि संघीय ढांचे में अधिक स्वायत्तता मिले। इन दलों के बीच गठबंधन और टूट-फूट नेपाल की राजनीति का स्थायी चरित्र बन चुकी है।
हालिया संसदीय चुनावों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। नेपाली कांग्रेस और यूएमएल के बीच प्रतिस्पर्धा रही, जिसमें निर्णायक भूमिका छोटे दलों और गठबंधन सहयोगियों ने निभाई। मौजूदा हालात में मतदाताओं में पारंपरिक दलों के प्रति असंतोष, युवाओं का बढ़ता हस्तक्षेप, भ्रष्टाचार और महंगाई मुख्य मुद्दे हैं स्थिर सरकार की मांग, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी जैसी नई शक्तियों का उभार इस असंतोष का परिणाम है। नेपाल की जनसंख्या में युवाओं की बड़ी हिस्सेदारी है। बड़ी संख्या में युवा विदेशों (खाड़ी देशों, मलेशिया, दक्षिण कोरिया) में काम करते हैं। इन युवाओं की प्राथमिकता है रोजगार के अवसर, पारदर्शी शासन, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार। युवा मतदाता वैचारिक राजनीति से अधिक परिणाम-आधारित शासन चाहते हैं।
जानकारों की राय में, आज नेपाल की अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों से जूझ रही है, जैसे विदेशी रोजगार पर निर्भरता, रेमिटेंस आधारित अर्थव्यवस्था, व्यापार घाटा, पर्यटन में गिरावट चुनावों में आर्थिक स्थिरता बड़ा मुद्दा हैं। आज जनता चाहती है कि सरकार बुनियादी ढांचे, ऊर्जा, पर्यटन और कृषि क्षेत्र में सुधार करे।
नेपाल में, 2015 के संविधान के बाद संघीय ढांचा लागू हुआ, लेकिन प्रांतों को पर्याप्त वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार नहीं मिल पाए। इससे स्थानीय स्तर पर असंतोष है। चुनावों में यह सवाल प्रमुख रहा कि क्या संघीय व्यवस्था वास्तव में जनता तक शासन की शक्ति पहुंचा पाई है या यह केवल सत्ता के नए केंद्र बना रही है।
वही दूसरी ओर, तराई क्षेत्र (मधेश) में लंबे समय से राजनीतिक उपेक्षा का भाव रहा है। मधेशी दलों ने अधिक प्रतिनिधित्व और समान अधिकारों की मांग की है। चुनावों में मधेशी राजनीति निर्णायक बनती है, क्योंकि वहां के वोट कई बार केंद्र की सत्ता समीकरण बदल देते हैं।
अगर इसे चुनाव को भारत-नेपाल संबंध के नजरिए से देखे तो नेपाल की राजनीति में भारत का प्रभाव ऐतिहासिक रहा है। खुली सीमा, सांस्कृतिक संबंध, व्यापार और ऊर्जा सहयोग, इन सबके कारण भारत-नेपाल संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, 2015 के संविधान के बाद सीमा नाकेबंदी के आरोपों ने नेपाल में भारत-विरोधी भावना को भी जन्म दिया। इसने वामपंथी दलों को राष्ट्रवादी एजेंडा उठाने का अवसर दिया।
चुनावों में यह मुद्दा सीधे न सही, परंतु अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद रहता है, विशेषकर विदेश नीति के संदर्भ में। नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव के नजरिए से देखे तो, चीन ने नेपाल में बुनियादी ढांचे, सड़कों, ऊर्जा और डिजिटल परियोजनाओं में निवेश बढ़ाया है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत सहयोग बढ़ रहा है। कुछ राजनीतिक दल चीन के साथ निकटता को विकास का विकल्प मानते हैं, जबकि अन्य इसे संतुलन की नीति से जोड़ते हैं।
नेपाल की विदेश नीति अब "संतुलन की कूटनीति" पर आधारित दिखती है, भारत और चीन दोनों के साथ संबंध बनाए रखना।
नेपाल में गठबंधन सरकारें आम हो चुकी हैं। इसका सकारात्मक पहलू है, विविधता का प्रतिनिधित्व के साथ समावेशी शासन।
दूसरी ओर इसका नकारात्मक पहलू यह है कि
बार-बार सरकार का गिरना, नीति स्थिरता का अभाव, वही दूसरी ओर प्रधानमंत्री बदलने की प्रवृत्ति ने अस्थिरता के साथ प्रशासनिक दक्षता को प्रभावित किया है। आज नेपाल में, मौजूदा जनता के बीच सबसे बड़ा असंतोष भ्रष्टाचार को लेकर है। कई घोटालों ने राजनीतिक नेतृत्व की विश्वसनीयता को प्रभावित किया हैं, यहां राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी जैसे दलों का उभार इस बात का संकेत है कि जनता पारदर्शी शासन चाहती है।
समानुपातिक प्रणाली के कारण संसद में महिलाओं और अल्पसंख्यकों की भागीदारी बढ़ी है। नेपाल दक्षिण एशिया में महिला प्रतिनिधित्व के मामले में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है।
फिर भी, निर्णय-निर्माण स्तर पर प्रभाव सीमित है।
नेपाल का लोकतंत्र अभी संक्रमण काल में है। यहां, चुनाव नियमित रूप से हो रहे हैं, यह सकारात्मक संकेत है। लेकिन राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक सुधार और संस्थागत मजबूती आवश्यक है।
नेपाल के मौजूदा हालात का अध्ययन बताता है कि, आगामी वर्षों में नेपाल की राजनीति कई कारणों से प्रभावित होगी, जैसे युवा नेतृत्व का उभार, गठबंधन की स्थिरता, आर्थिक सुधार, भारत-चीन संतुलन और संघीय ढांचे का सुदृढ़ीकरण। यहां, राजनीतिक दल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दें, तो नेपाल स्थिरता की दिशा में बढ़ सकता है। नेपाल के चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना की परीक्षा हैं। जनता अब अधिक सजग है। वह वैचारिक नारों से अधिक ठोस परिणाम चाहती है।
खंडित जनादेश यह दर्शाता है कि मतदाता किसी एक दल को पूर्ण विश्वास नहीं दे रहे, बल्कि संतुलन और जवाबदेही चाहते हैं। यह लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत भी है और राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी भी।
अध्ययन बताता है कि, नेपाल आज परिवर्तन की दहलीज पर खड़ा है। यदि नेतृत्व दूरदर्शिता, पारदर्शिता और स्थिरता का परिचय देता है, तो हिमालय की यह धरती दक्षिण एशिया में लोकतांत्रिक स्थायित्व का उदाहरण बन सकती है। अन्यथा, अस्थिरता का चक्र जारी रहेगा।
नेपाल के चुनाव हमें यह भी सिखाते हैं कि लोकतंत्र केवल संविधान से नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति से मजबूत होता है। और राजनीतिक संस्कृति तब विकसित होती है, जब सत्ता सेवा में बदलती है।
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(शाश्वत तिवारी: लेखक यूपी के जाने - माने पत्रकार हैं और अपने विश्लेषण, निष्पक्ष स्वतंत्र टिप्पणी के लिए जाने जाते हैं)
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