"ये आकाशवाणी है... अब आप देवकी नंदन पांडे से समाचार सुनिए" अगर भारतीय रेडियो के इतिहास में किसी एक आवाज़ को 'दहाड़' (The Roar) कहा जा सकता है, तो वो आवाज़ थी देवकी नंदन पांडे की।
वे सिर्फ एक न्यूज़रीडर नहीं थे, वे उस दौर में भारत सरकार की सबसे 'आधिकारिक आवाज़' (Official Voice) थे।
क्यों उन्हें 'भीष्म पितामह' कहा जाता है?
गंभीर और वजनदार आवाज़:
उनकी आवाज़ में एक ऐसा गुरुत्वाकर्षण (Gravity) था कि जब वे बोलते थे, तो लगता था कि कोई बहुत महत्वपूर्ण बात कही जा रही है। 1948 से लेकर दशकों तक, देश की हर बड़ी खबर—चाहे वो गांधी जी की हत्या हो, नेहरू जी का निधन, या युद्ध की घोषणा—देश ने सबसे पहले उन्हीं की आवाज़ में सुनी।
घड़ी मिलाने वाली आवाज़:
कहा जाता है कि सुबह 8 बजे जब उनका बुलेटिन शुरू होता था, तो लोग अपनी घड़ियाँ मिलाते थे। उनकी पाबन्दी और उच्चारण (Pronunciation) इतना सटीक था कि उसमें एक सेकंड या एक मात्रा की भी गलती की गुंजाइश नहीं होती थी।
एक अनोखा किस्सा:
वे इतने विश्वसनीय थे कि संजय गांधी के निधन (1980) के समय, देवकी नंदन पांडे जी रिटायर हो चुके थे। लेकिन प्रशासन ने विशेष रूप से उन्हें घर से बुल्वाया, क्योंकि उनका मानना था कि इतनी बड़ी और दुखद खबर अगर पांडे जी की भारी आवाज़ में नहीं जाएगी, तो शायद लोगों को यकीन नहीं होगा।
आज की तेज़-तर्रार मीडिया के दौर में, देवकी नंदन पांडे की वो 'ठहरी हुई' और 'दमदार' आवाज़ एक सुनहरी याद बनकर रह गई है।
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