नार्थ ईस्ट के सीमांचल में आज भी महाभारत काल के अवशेष चीख चीख कर अपने ऐतिहासिक प्रमाण का बखान करता है। क्षीर समुद्र मेला और किचक बध मेला।
द्रौपदी को परेशान किया तो भीम ने किया वध :स्थानीय किंवदंती के अनुसार के अनुसार जब पांडव अज्ञातवास के दौरान राजा विराट ने उनको शरण दी थी। वह यहां पर भेष बदल कर रहते थे। नगर के लोगों को भी नहीं पता था कि जो यहां पर रह रहे हैं वह पांडव है। ऐसे में राजा विराट जितने अच्छे थे उतना ही खराब उनका साला कीचक था। उसकी गंदी नजर द्रौपदी पर थी। वह अक्सर उसे परेशान किया करता था। जिसकी जानकारी उसने पांडवों को दी इस पर भीम को बहुत अधिक गुस्सा आया तो, भीम ने कीचक के वध करने की एक रणनीति बनाई। जिसके तहत द्रौपदी ने कीचक को पंच खंड पर्वत पर बुलाया। जैसे ही कीचक वहां पर पहुंचा तो भीम ने उस पर हमला कर दिया कुछ देर युद्ध चलने के बाद भीम ने कीचक का वध कर दिया। द्रोपती को लगी प्यास तो भीम ने लात मार कर बना दिया कुंड: इसके अलावा इस जगह से जुड़ी एक और किंवदंती है, बताया जाता है कि जब पांडव और द्रौपदी अज्ञात वास पर रह रहे थे तब द्रोपती को अचानक प्यास लगी आसपास पानी नहीं मिला तो भीम ने लात मार कर कुंड बना दिया। यह कुंड आज भी मौजूद है। बताया जाता है कि यह कुंड आज तक कभी सूखा नहीं है। अभी तक इसकी गहराई का अनुमान भी नहीं लगाया जा सका है। इसी में एक है आज माघी पूर्णिमा के मौके पर हर साल की तरह इस साल सीमांचल नेपाल के झापा जिले के महेशपुर गांव में ऐतिहासिक कीचक वध स्थल स्थित है। वहां माघी पूर्णिमा के दिन मेले का आयोजन किया जाता है। एसएसबी के जवान स्थानीय प्रशासन भी इस मेले को लेकर अपने अपने स्तर से तैयारी पूरी कर रही है। इस मेले में लाखों की संख्या में बिहार, बंगाल, असम, भूटान व सिक्किम व नेपाल के झापा, मोरंग, सप्तरी जिलों से श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना करने आते है।मान्यता है कि यहां पांडवों को एक वर्ष का अज्ञातवास गुजारना था। इसी दौरान मत्स्य देश के सेनापति कीचक का वध पांडव पुत्र भीम ने मल्य युद्ध के बाद इसी स्थान पर किया था। दोनों देशों के नागरिक हिन्दू रिति रिवाज से कीचक वध स्थली पर पहुंच कर पूजा अर्चना करते हैं। कहा जाता है कि सौ वर्ष पहले यह जगह स्थल घने जंगलों से घिरा हुआ था और साधू संत, ऋषि मुनियों का आगमन उक्त स्थान पर लगा रहता था। लोग बसंत पंचमी के दिन से माघ पूर्णिमा तक दस दिनों तक महाभारत कथा का पाठ किया जाता है।कीचक वध क्षेत्र में स्थित पातालगंगा का भी एक अलग महत्व है. चबूतरा नुमा पाताल गंगा के समीप शुद्ध मन व तन से किचक वध नाम, सत्यदेवी पातालगंगा धाम का जयकारा लगाने से पानी उबलने लगता है। उत्खनन में मिले ऐतिहासिक अवशेष समय के साथ सब कुछ बदलने के बाद भी ठाकुरगंज, महेशपुर में पौराणिक अवशेष आज भी सुरक्षित है।पुरातत्व विभाग द्वारा अब तक यहां सात चरण में उत्खनन हो चुका है, जिसमें तबेला जैसी दिखने वाली 22 मीटर लंबा व 17 मीटर चौड़ा एक मंजिला भवन पाया गया था. साथ ही मिट्टी के बर्तन, मिट्टी के ईंट जैसा प्लेट (टायल्स), घोड़ा व हाथी के गले में पहनने वाली कई वस्तु, मिसाइल के आकार के मिट्टी का सामान, पत्थर की थाली, मिट्टी की सुराही, बाण, नाग की मूर्ति एवं लोहे की चाकू इत्यादि पाया गया है. साथ ही खपरैल के टुकड़े और कुछ हड्डियां भी मिलने की जानकारी मिली है। कीचक के वध के बाद दुर्योधन को हुई शंका, अज्ञात वास में मत्स्य देश में छुपे पांडव: द्रौपदी की सुंदरता पर मोहित हुए कीचक मे भरी सभा में उसका अपमान किया और उसके साथ अभद्र व्यहवाहर करने का प्रयत्न किया। जिसके बाद द्रौपदी के कहने पर भीम ने कीचक को मौत के घाट उतार दिया। वहीं दुर्योधन को इस बात की शंका हो गई की कि अज्ञात वास में पांडव मत्स्य देश में छुपे है। कीचक का वध लेने की शपथ लेने वाली द्रौपदी का वचन भीम ने पूरा कर दिया। भरी सभा में द्रौपदी को स्पर्श करने का पाप करने के उपरांत भीम ने मध्य रात्रि में कीचक का वध कर दिया। जैसे ही ये खबर हस्तिनापुर में पहुंची। कर्ण हैरान रह गया उसने दुर्योधन को बताया कि कीचक जैसे महाबली को सिर्फ 6 ही योद्धा परास्त कर सकते हैं, मैं पितामह भीष्म, बलराम, गुरुद्रोण तुम दु्र्योधन और भीम। जिसके बाद शकुनि और दुर्योधन दिमाह लगाते हैं कि इसका मतलब पांडव अपने अज्ञात वास के दौरान मत्स्य देश में छुपे हैं। जिसके बाद वो मत्स्य देश पर हमला करने की योजना बनाता है।
वहीं इससे पहले द्रौपदी की सुंदरता पर कीचक का दिल आ जाता है वो द्रोपदी की सच्चाई जाने बिना उसको लुभाने का प्रयास कर रहा होता है। द्रौपदी उससे कहती है कि वो शादी शुदा है जिसके जवाब में कीचक कहता है कि वो किसी धर्म को नही मानता और उसे पाने के लिए किसी भी धर्म को तोड़ सकता है। द्रौपदी का क्रोध बढ़ जाता है और वो कहती है कि मैं यहां पर दासी जरूर हूं लेकिन मजबूर नही हूं। वहीं महारानी का भाई द्रौपदी को चेताते हुए कहता है कि तुमने मेरा प्रस्ताव ठुकराकर बहुत बड़ी गलती की है। इसकी सजा तुम्हें भुगतनी होगी।
कीचक द्रौपदी की शिकायत अपनी बहन से करता है। महारानी पहले तो अपने कीचक को समझाने की कोशिश करती हैं लेकिन आखिरकार धर्म और अधर्म का ज्ञान होने के बावजूद वो अपने भाई के साथ देने का फैसला करते हुए द्रौपदी को ये आदेश देती हैं कि वो उसके भाई के कमरे में जाकर मदिरा लाए जो वो उसके लिए लेकर आया है। द्रौपदी महारानी की बातों का आशय समझ जाती है और उनका हुक्म मानते हुए कहती है कि महारानी अब जो कुछ भी होगा उसकी जिम्मेदारी आप होंगी और परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें।
वहीं दूसरी ओर पांडवों को न तलाश कर पाने के चलते दुर्योधन काफी ज्यादा क्रोधित है। दुर्योधन अपने गुप्त चरों से कहता है कि अगर पांडवों को जल्द से जल्द न तलाशा गया तो फिर वो सबको उनके परिवार समेत मौत के घाट उतार देगा। दुर्योधन का गुस्सा काफी ज्यादा बढ़ता जाता है। गांधारी ने अपने पति को समझाते हुए कहा कि महाराज अभी भी वक्त है देर नही हुई है। आप पांडवों को बुलाकर इन्द्रप्रस्थ उनको सौंप दे और उन्हें सुनहरे भविष्य के लिए शुभकामनाएं दें। गांधारी की बात सुन महाराज व्याकुल हो उठते हैं और कहते हैं कि अब बहुत देर हो चुकी है। अब यह संभव नही है। ( अशोक झा की रिपोर्ट )
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