गयी ठंड जड़ जंगम अब,
जीव-जंतु जगत निहाल।
बीत रही जनवरी आगमन,
देख बसंत धमका बेहाल।।
चिड़िया चहक महक पा,
भौंरे पा पुष्प पराग मगन।
नील गगन विशाल विस्तृत,
मनो धरा सुंदरी प्रिय आंगन।।
'अटल' मुदित मन निरख,
प्रकृति सजी-धजी लख।
धर्म-कर्म निरत साधु संत,
त्रिवेणी संगम स्नान मख।।
धर्म गुरु अहं ले अड़े मां,
आरूढ़ हो रथ जनसमूह।
सद्भावना रख प्रशासन भी,
धैर्य साहस दिखा मोड़ मुंह।।
माघ मास अति पावन पर्व,
कर स्नान होवें स्फूर्तिवान।
सर्वे भवन्तु सुखिन: हो भाव,
मां भारत की हो जय बलवान।।
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रामाधार पाण्डेय, 'अटल'
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