- सबको फ्री सुविधाएं बांटना गलत, फ्री खाना मिलेगा तो लोग काम क्यों करेंगे
सुप्रीम कोर्ट ने लोगों को मुफ्त सुविधाएं देने की संस्कृति की कड़ी आलोचना करते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि देश के आर्थिक विकास में बाधा डालने वाली ऐसी नीतियों पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है। इस निर्देश के बाद बंगाल में टीएमसी की बेरोजगारी भत्ता के नाम पर चुनावी खेल पर लगाम लग सकता है। अदालत ने कहा कि मुफ्त योजनाओं और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) से लोगों में काम के प्रति उदासीनता बढ़ सकती है, जो राष्ट्र निर्माण के लिए घातक साबित हो सकती है. प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान कहा कि राज्यों को मुफ्त सुविधाएं बांटने के बजाय क्वालिटी स्कूल, अस्पताल, ट्रेनिंग सेंटर्स और रोजगार का अवसर पैदा करने से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर निवेश करना चाहिए, ताकि नागरिकों को सम्मानजनक आजीविका मिल सके. सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से पश्चिम बंगाल की राजनीतिक पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि प्रदेश की ममता बनर्जी सरकार ने बेरोजगार युवाओं को अप्रैल से 1500 रुपये बतौर बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणा की है। अदालत की यह टिप्पणी तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉरपोरेशन की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें बिजली (संशोधन) अधिनियम, 2024 के नियम 23 को चुनौती दी गई है. इस नियम में बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) पर वित्तीय अनुशासन लागू करने का प्रावधान है, जिससे तमिलनाडु सरकार की मुफ्त या रियायती बिजली योजनाओं पर असर पड़ सकता है. सुनवाई के दौरान CJI जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि अदालत केवल तमिलनाडु की बात नहीं कर रही है, बल्कि यह पूरे देश की समस्या बन चुकी है. उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि राजनीतिक नेता, दल और सामाजिक कार्यकर्ता अपनी विचारधारा से ऊपर उठकर ऐसी योजनाओं की समीक्षा करें।संसाधनों का दुरुपयोग: रिपोर्ट के अनुसार, CJI जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यदि किसी वस्तु को पूरी तरह मुफ्त कर दिया जाए तो उसके उपयोग में अनुशासन खत्म हो जाता है. अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर बिजली मुफ्त होगी तो अमीर और गरीब दोनों ही बिना जरूरत मशीनें, पानी के पंप और लाइटें लगातार चालू रखेंगे, क्योंकि उन्हें भुगतान नहीं करना पड़ेगा. इससे मूल्यवान संसाधनों का दुरुपयोग होगा. हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि राज्य यदि चाहें तो बिजली वितरण में लाभ का हिस्सा छोड़ सकते हैं, लेकिन कम से कम उत्पादन लागत उपभोक्ताओं से वसूल करनी चाहिए। फ्रीबी के लिए कहां से आ रहा पैसा?
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से सवाल किया कि मुफ्त योजनाओं के लिए धन आखिर कहां से आता है।अदालत ने कहा कि यह पैसा टैक्स-पेयर्स से ही आता है और करदाता बदले में बेहतर अस्पताल, स्कूल, सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे की अपेक्षा रखते हैं. यदि सरकारें लगातार मुफ्त योजनाएं बांटती रहेंगी तो देश के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. पीठ ने तमिलनाडु सरकार से हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने को कहा कि मुफ्त बिजली योजना के लिए धन कहां से जुटाया जा रहा है और किस मद से इसे ट्रांसफर किया जा रहा है. अदालत ने कहा कि राज्यों का प्रयास ऐसा होना चाहिए जिससे लोगों के लिए सम्मानजनक रोजगार के अवसर पैदा हों और वे आत्मसम्मान के साथ आजीविका कमा सकें. यदि सरकारें लगातार मुफ्त अनाज, गैस, केरोसिन, साइकिल, स्कूटी या बिजली जैसी सुविधाएं देती रहेंगी और सीधे बैंक खातों में नकद राशि भेजेंगी, तो लोगों में काम करने की प्रेरणा कम हो सकती है।
फिस्कल ट्रांसपेरेंसी जरूरी: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई राजस्व घाटे से जूझ रहे राज्य भी प्रतिस्पर्धा में मुफ्त योजनाएं घोषित कर रहे हैं, जिससे उनके पास विकास कार्यों के लिए संसाधन नहीं बचते. अदालत ने टिप्पणी की कि कई राज्यों की कर आय का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों के वेतन और मुफ्त योजनाओं पर खर्च हो रहा है. सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम ने तमिलनाडु सरकार की ओर से कहा कि राज्य में राजस्व और खर्च के बीच अंतर लगभग 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जिसे सरकार वहन कर रही है. वहीं, सीनियर एडवोकेट पी. विल्सन ने संविधान के नीति निदेशक तत्वों के अनुच्छेद 39(बी) का हवाला देते हुए संसाधनों के समान वितरण का तर्क दिया. इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यदि कोई कल्याणकारी योजना लागू करनी है तो उसे बजटीय प्रस्ताव का हिस्सा बनाना चाहिए. बिना स्पष्ट वित्तीय प्रावधान के योजनाएं लागू करना राजकोषीय प्रशासन में मनमानी का संकेत देता है।
क्या है ममता बनर्जी सरकार की योजना?: साल 2026 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बेरोजगार युवाओं के लिए राज्य के मासिक ₹1,500 भत्ते की शुरुआत 15 अगस्त से आगे बढ़ाकर 1 अप्रैल कर दी है. ममता बनर्जी ने 10 फरवरी 2026 को कहा था, 'पहले हमने इस योजना (युवा साथी) को 15 अगस्त से शुरू करने का निर्णय लिया था. हालांकि, चूंकि वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से शुरू होता है, इसलिए हमने इस योजना को 1 अप्रैल से लागू करने का निर्णय लिया है.' राज्य के अंतरिम बजट के दौरान योजना की घोषणा के बाद उन्हें विपक्षी दलों के नेताओं की आलोचना का सामना करना पड़ा, क्योंकि उन्होंने ऐसी योजनाओं की शुरुआत की थी जिन्हें वे मुख्यमंत्री के रूप में अपने वर्तमान कार्यकाल में लागू नहीं करेंगी. सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद अब सवाल उठने लगा है कि क्या ममता सरकार की इस योजना पर भी कैंची चलेगी?
फ्रीबी पर पहले से लंबित याचिका: गौरतलब है कि चुनाव से पहले राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त योजनाओं के वादों और उनके वित्तीय स्रोतों की जानकारी न देने के खिलाफ अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की एक जनहित याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में पहले से लंबित है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि देश के समग्र विकास के लिए दीर्घकालिक आर्थिक योजना आवश्यक है. अदालत ने चेतावनी दी कि यदि सरकारें अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए मुफ्त योजनाओं पर निर्भर रहेंगी तो इससे आर्थिक अनुशासन और विकास दोनों प्रभावित होंगे. अदालत की इस टिप्पणी को देश में बढ़ती चुनावी प्रतिस्पर्धा और कल्याणकारी योजनाओं की राजनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में सरकारों की वित्तीय नीतियों और चुनावी वादों पर व्यापक बहस को जन्म दे सकती है। ( बंगाल से अशोक झा की रिपोर्ट )
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