- बांग्लादेश में ईसाई, हिंदू और बौद्ध जैसे अल्पसंख्यक समुदाय
महसूस कर रहे असुरक्षा
बांग्लादेश के चुनाव आयोग ने एक निर्देश जारी कर 12 फरवरी को मतदान केंद्रों के 400 गज के दायरे में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। इस निर्देश के विरोध में दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया है धमकी दी है कि अगर यह फैसला वापस नहीं लिया गया तो वे आयोग के कार्यालय का घेराव करेंगे। बांग्लादेश में ईसाई, हिंदू और बौद्ध जैसे अल्पसंख्यक समुदाय इस असुरक्षा को और अधिक गहराई से महसूस कर रहे हैं। रिपोर्ट में उनके हवाले से कहा गया, "कट्टरपंथी मुसलमान मौजूदा अराजकता से और अधिक सक्रिय हो रहे हैं। ऐसे में चर्च स्थापित करने वालों और उनकी मंडलियों को गंभीर खतरों का सामना करना पड़ रहा है।"
रिपोर्ट में एक पादरी 'मिंटू' का भी जिक्र किया गया है, जिनकी चर्च निर्माण की योजना को मुस्लिम पड़ोसियों के विरोध के कारण रोक दिया गया। बताया गया कि पिछले डेढ़ साल से चर्च निर्माण का काम पूरी तरह ठप पड़ा हुआ है। बांग्लादेश में कई ईसाई ऐसे भूखंडों पर रहते हैं, जिनका स्वामित्व उनके पास नहीं है, बल्कि वह जमीन सरकार या मुस्लिम पड़ोसियों की होती है, जिससे उन्हें कभी भी बेदखली का खतरा बना रहता है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम बहुसंख्यक समाज के पास सारी शक्ति होने के कारण ईसाई समुदाय का उनके साथ संबंध बेहद संवेदनशील है। बांग्लादेश में अब बस एक दिन बाकी हैं, 12 फरवरी को लोग संसद के लिए वोट डालेंगे, साथ ही एक रेफरेंडम भी होगा- जहां सिर्फ 'YES' या 'NO' चुनना है।ये रेफरेंडम 'जुलाई नेशनल चार्टर 2025' पर है, जो पिछले साल की छात्र क्रांति (मॉनसून रिवॉल्यूशन या जुलाई अपराइजिंग) के बाद बना। उस क्रांति ने शेख हसीना की 15 साल पुरानी सरकार गिराई और मुहम्मद यूनुस को अंतरिम चीफ बना दिया. रेफरेंडम के लिए अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने जनता से खुलकर 'YES' वोट देने की अपील की है।सरकार का कहना है कि इससे देश में बड़े सुधारों को जनसमर्थन मिलेगा, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दबाव मान रहा है। क्या है जनमत संग्रह का मुद्दा?: यह जनमत संग्रह 'जुलाई नेशनल चार्टर-2025' नाम के सुधार प्रस्तावों पर आधारित है।इस चार्टर में कुल 84 बिंदुओं के बदलाव शामिल हैं, जिन्हें चार बड़े क्षेत्रों राजनीतिक, प्रशासनिक, न्यायिक और आर्थिक में बांटा गया है. सरकार चाहती है कि जनता इन सुधारों पर 'YES' कहे, ताकि इन्हें आगे लागू किया जा सके।
रिफॉर्म पैकेज क्या है और क्यों है जरूरी?: यूनुस ने इसे 17 अक्टूबर को एक बड़े समारोह में लॉन्च किया था, जहां राजनीतिक पार्टियों और नेशनल कंसेंसस कमीशन के साथ लंबी चर्चा के बाद ये तैयार हुआ।उन्होंने कहा कि ये चार्टर "बर्बरता से सभ्य समाज की ओर कदम" है. रेफरेंडम में सिर्फ एक सवाल है, जो चार मुख्य रिफॉर्म एरिया को कवर करता है।वोटर्स को 'हां' या 'नहीं' चुनना है। अगर वो ज्यादा सहमत हैं तो 'हां', वरना 'नहीं'।लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये पैकेज इतना जटिल है कि आम वोटर के लिए समझना मुश्किल हो सकता है. कोई बदलाव पसंद आए तो कोई नहीं, लेकिन सबको एक साथ वोट करना पड़ेगा।
यूनुस की खुली अपील से बढ़ा विवाद: ढाका में एक कार्यक्रम के दौरान यूनुस ने कहा कि अगर 'YES' वोट जीतता है, तो बांग्लादेश का भविष्य ज्यादा सकारात्मक दिशा में बढ़ेगा. चुनाव कानून के तहत प्रचार खत्म होने से ठीक पहले दी गई इस अपील को लेकर सवाल उठे कि क्या सरकार को जनमत संग्रह में तटस्थ नहीं रहना चाहिए था।
सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल का आरोप:विपक्ष का आरोप है कि 'YES' वोट के समर्थन में सरकारी मशीनरी का खुलकर इस्तेमाल हुआ। बांग्लादेश बैंक के निर्देश पर कई सरकारी दफ्तरों में 'YES' समर्थन वाले बैनर लगाए गए। बैंकों से CSR फंड के जरिए NGO अभियानों को सहयोग देने की बातें भी सामने आईं. चुनाव आयोग ने बाद में सरकारी अधिकारियों को ऐसे अभियानों से दूर रहने का आदेश दिया।
संविधान पर उठे सवाल, आलोचना और लीगल सवाल
कई जूरिस्ट्स ने रेफरेंडम की वैधता पर सवाल उठाए हैं।बांग्लादेश के संविधान में ऐसे रेफरेंडम का कोई प्रावधान नहीं है. लीडिंग जूरिस्ट स्वाधीन मलिक ने कहा, "जुलाई चार्टर के ज्यादातर फैसले मौजूदा संविधान के खिलाफ हैं। उन्होंने ये भी जोड़ा कि प्रेसिडेंट मोहम्मद शाहबुद्दीन ने इसे साइन किया और गजट जारी किया, लेकिन अगर संविधान निलंबित या मार्शल लॉ होता तो ठीक था।"चूंकि ऐसा कुछ नहीं हुआ, सबकुछ मौजूदा संविधान के मुताबिक होना चाहिए," मलिक ने बताया. आलोचक कहते हैं कि ये रेफरेंडम अगली सरकार को चार्टर लागू करने के लिए बाध्य करेगा और यूनुस रेजीम को वैधता देगा. याद दिला दें, यूनुस की सरकार अगस्त 5, 2026 को स्टूडेंट-लेड जुलाई अपराइजिंग के बाद बनी, जब शेख हसीना की अवामी लीग सरकार गिर गई।आम मतदाता की उलझन:
आलोचकों का कहना है कि बैलेट में एक ही सवाल है, लेकिन उसमें कई जटिल सुधार शामिल हैं. कोई मतदाता कुछ सुधारों से सहमत हो सकता है और कुछ से नहीं ऐसे में सिर्फ 'YES' या 'NO' का विकल्प भ्रम पैदा करता है।
आगे की तस्वीर: अगर 'YES' जीतता है, तो यूनुस सरकार इसे जनता की मंजूरी बताएगी। लेकिन 'NO' की स्थिति में अंतरिम सरकार की साख पर सवाल और गहरे हो सकते हैं।चुनावी दिन रेफरेंडम का फैसला आने वाले दिनों में बांग्लादेश की राजनीति की दिशा तय करेगा।जमात को लेकर लोगों में भ्रम की स्थिति : जमात पर एक पुराना आरोप यह भी रहा है कि उसे बांग्लादेश के मुक्ति आंदोलन का विरोधी माना गया था। मोईउद्दीन अहमद का कहना है, "मुद्दा यह है कि ज़्यादातर मतदाताओं को '71 के बारे में न तो जानकारी है और न ही उन्होंने वह दौर देखा है।उनके अंदर 1971 को लेकर वह भावनात्मक जुड़ाव नहीं है।
''उन्होंने अवामी लीग को देखा, बीएनपी को देखा और वे इनसे खुश नहीं हैं।इसलिए वे कह रहे हैं, चलिए किसी और पार्टी को आज़माते हैं.'' मोईउद्दीन अहमद की नज़र में ''... और वह पार्टी है- जमात। मोईउद्दीन अहमद का भी मानना है कि जमात अपनी छवि 'उदारवादी' बनाने की कोशिश में जुटी है। उनके मुताबिक़, ''वे अब अपनी रणनीति बदल रहे हैं. उनके शीर्ष नेता कह रहे हैं कि वे शरीयत क़ानून लागू नहीं करेंगे।वे ख़ुद को एक उदार मुस्लिम चेहरे के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.''
यही नहीं, बक़ौल मोईउद्दीन अहमद, ''जमात अब 'इंडिया कार्ड' भी नहीं खेल रही क्योंकि उन्हें समझ आ गया है कि अगर भारत से रिश्ते अच्छे नहीं रहे तो यहाँ टिके रहना मुश्किल होगा।"
जमात के बारे में ढाका के लोगों का क्या कहना है
ढाका में लोगों की राय बँटी हुई है।ढाका की रहने वाली नज़ीफ़ा जन्नत कहती हैं, "यह शर्मनाक है कि जमात ने एक भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारा है।" दूसरी ओर ढाका के ही रहने वाले रियादुल सलाहुद्दीन कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि जमात के सत्ता में आने से बांग्लादेश सांप्रदायिक देश बन जाएगा।"
वे कहते हैं, "अगर जमात सत्ता में आ भी गई तब भी वह इस देश की जड़ में शामिल उदारवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ बहुत कुछ नहीं कर पाएगी।।लेकिन ढाका की ही ज़ैबा तज़ीन इतनी आशावादी नहीं हैं।वे दावा करती हैं, "मैं साल 2024 में मासूम लोगों की हत्या करने वालों के ख़िलाफ़ भी बोलती हूँ।जैसे, अवामी लीग... और मैं साल 1971 के आज़ादी के आंदोलन के ख़िलाफ़ खड़े लोगों, जैसे जमात के ख़िलाफ़ भी बोलूँगी. उन्होंने आज तक इसके लिए माफ़ी नहीं माँगी है।उनका कहना है, "अगर जमात सत्ता में आई तो बांग्लादेश में उदारवादी राजनीतिक दायरा सिकुड़ जाएगा।
भारत की चिंता क्या है?: भारत में चिंता का बड़ा कारण अल्पसंख्यक समुदाय हैं। दिल्ली में विदेश नीति के विशेषज्ञ ज़ाकिर हुसैन कहते हैं कि अल्पसंख्यक समुदायों को शेख़ हसीना का समर्थक माना जाता है। भारत को डर है कि इस वजह से वे कट्टरपंथी समूहों के निशाने पर आ सकते हैं।
वे कहते हैं, "अगर बांग्लादेश में कुछ भी होता है, तो उसका सीधा असर भारत की सियासत पर भी पड़ेगा।
बढ़ती असहिष्णुता और हिंसा का साया: कुछ ख़बरों के मुताबिक़, हाल के दिनों बांग्लादेश में कट्टरपंथी विचार और असहिष्णुता बढ़ी है. कुछ लोगों में इसका डर भी साफ़ दिखता है।यह माहौल सिर्फ़ अल्पसंख्यकों पर ही नहीं, बहुसंख्यक मुसलमानों पर भी असर डाल रहा है।हमने इसकी एक झलक शातखीरा में स्थानीय अख़बार 'दैनिक पत्रदूत' के दफ़्तर में देखी.
अख़बार के संपादक अबुल कलाम आज़ाद ने बताया, ''प्रधानमंत्री (हसीना) के जाने के बाद यहाँ भी देश के बाकी हिस्सों की तरह हिंसा हुई।उसी दिन शाम को एक बड़ी भीड़ दफ़्तर में घुस आई और हमारा सारा सामान लूट लिया. उन्होंने इन कमरों में पेट्रोल डालकर आग लगा दी। अबुल कलाम आज़ाद ने कहा, ''एक अख़बार के तौर पर हमारा रुख़ हमेशा साफ़ रहा है- हम उन पार्टियों का समर्थन करते हैं जिन्होंने 1971 के स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया था।' उनका दावा है, ''हम पर हमारी विचारधारा की वजह से हमला किया गया। ( बांग्लादेश बोर्डर से अशोक झा की रिपोर्ट )
#बांग्लादेशचुनाव #बांग्लादेश
दुनियाभर के घुमक्कड़ पत्रकारों का एक मंच है,आप विश्व की तमाम घटनाओं को कवरेज करने वाले खबरनवीसों के अनुभव को पढ़ सकेंगे
https://www.roamingjournalist.com/