- या फिर से थ्री एम के ध्रुवीकरण की चलेगी कोई चाल, बेरोजगारी भत्ता से युवा क्या होंगे प्रभावित
- ममता बनर्जी तोड़ेंगी शीला दीक्षित का रिकार्ड? हुमायू कबीर से मुस्लिम वोटों की ठेकेदारी खत्म होने का खतरा।
बंगाल विधानसभा चुनाव मई माह से पहले इसी साल होना है। चुनाव को ध्यान में रखते हुए अंतरिम बजट में ममता बनर्जी ने महिलाओं और युवाओं पर अपनी ममता लुटाई है। सवाल उठता है कि क्या ममता बनर्जी महिला मतदाताओं के बल पर राजनीति सत्ता पर बैठने का चौका लगा पाएगी? या फिर थ्री एम यानि मुस्लिम, महिला और मतुआ वोट बैंक के ध्रुवीकरण का ताना बाना बुनने की कोशिश करेगी। बंगाल में कुल 7.18 करोड़ वोटर हैं। इनमें से 3.59 करोड़ महिलाएं हैं। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार ने खास महिला वोटर्स के लिए लक्ष्मी भंडार, रूपश्री और कन्याश्री जैसी कई योजनाएं चला रही हैं।
महिला वोटरों को लुभाने के लिए तृणमूल कांग्रेस सरकार ने अंतरिम बजट में लक्खी भंडार (लक्ष्मीर भंडार) योजना की राशि बढ़ाने की घोषणा की है. राज्य सरकार ने लक्खी भंडार के अनुदान की राशि में 500 रुपए की बढ़ोतरी की है।
महिलाओं को अब मिलेंगे 1500 रुपए: बजट घोषणा के अनुसार, सामान्य श्रेणी की महिलाओं को 1000 रुपए की वित्तीय सहायता दी जाती थी। उन्हें अब 1500 रुपए मिलेंगे. इसके साथ ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग की महिलाओं को इस परियोजना के तहत 1700 रुपए मिलेंगे।फरवरी से ही महिलाओं को बढ़ी हुई राशि मिलने लगेगी।इस योजना के लिए ममता बनर्जी की सरकार ने वर्ष 2026-27 में 15 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त फंड अलॉट किया है। 2021 में ममता बनर्जी ने की थी योजना की शुरुआत : वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों के ठीक पहले ममता बनर्जी ने लक्खी भंडार योजना की घोषणा की थी. विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ही उन्होंने महिलाओं के खाते में 500 रुपए भेजने शुरू कर दिये थे। फिर 2024 में लोकसभा चुनाव में इस राशि को बढ़ाकर 1000 रुपए कर दिया।
2.21 करोड़ महिलाओं को अभी मिल रहा योजना का लाभ : अब 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले इसमें फिर 500 रुपए की वृद्धि की गयी है। फिलहाल राज्य की 2 करोड़ 21 लाख महिलाओं को योजना का लाभ मिल रहा है। 20.62 लाख नये आवेदन स्वीकार किये गये हैं. इसके बाद अब योजना की लाभुकों की संख्या बढ़कर 2.42 करोड़ हो जायेगी।
शीला दीक्षित 15 साल 25 दिन तक सीएम रहीं। बंगाल में फिलवक्त ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) एकमात्र पार्टी है, जो दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन चुकी भाजपा से लोहा लेती रही हैं। उन्होंने अपने दम पर साढ़े 3 दशक से अधिक समय तक बंगाल में शासन करने वाले वामपंथी दलों के ग्रुप- लेफ्ट फ्रंट को सत्ताच्यूत करने में पहली बार 2011 में सफलता पाई थी. तब से वे बंगाल पर निष्कंटक राज कर रही हैं. देश में भाजपा के उभार और नरेंद्र मोदी की लहर के बावजूद ममता ने टीएमसी को अभी तक मजजबूत बनाए रखा है।
2021 में फेल रहा था भाजपा का जादू: बंगाल के पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस बार की तरह ही पूरी ताकत झोंक दी थी. प्रधाननमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर भाजपा के तमाम छोटे-बड़े नेताओं ने बंगाल के तूफानी दौरे किए. हवा का रुख भी बदलता नजर आ रहा था. नतीजों में इसकी झलक तो दिखी। भाजपा की सीटें विधानसभा में 2 से बढ़ कर 77 हो गईं. टीएमसी की सीटें भी घटीं, लेकिन ममता तीसरी बार सरकार बनाने में सफल हो गईं। विश्लेषकों ने इसे उनका करिश्मा नहीं, बल्कि मुस्लिम वोटों का ममता के पक्ष में इकतरफा ध्रुवीकरण माना। बंगाल में तकरीबन 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। टीएमसी को 2021 में 49 प्रतिशत वोट मिले थे. भाजपा टीएमसी से 10 प्रतिशत वोट लाकर दूसरे नंबर पर रही। भाजपा के प्रबल विरोध के बावजूद अपनी जीत से उत्साहित ममता ने प्रधानमंत्री बनने के सपने भी देखने शुरू कर दिए थे।
सबसे लंबा कार्यकाल शीला दीक्षित का:
शीला दीक्षित सबसे लंबे समय तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं।वे 3 दिसंबर 1998 से 28 दिसंबर 2013 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। उनका कुल कार्यकाल 15 वर्ष 25 दिन का रहा. उनके नाम एक और रिकार्ड है। दिल्ली में पुरुष और महिला मुख्यमंत्रियों में उनका नाम सर्वाधिक समय तक सीएम रहने वालों में सबसे ऊपर है. सीएम के रूप में उन्होंने दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। शीला दीक्षित के बाद महिला मुख्यमंत्रियों में सर्वाधिक समय का रिकार्ड ममता बनर्जी ने बना लिया है. ममता बनर्जी ने लगभग 14 वर्ष से अधिक (मई 2011 से अब तक) का रिकार्ड बना लिया है, जो शीला दीक्षित से कुछ ही महीने कम है. लंबे समय तक सीएम रहने वाली तीसरी सीएम रहीं जे जयललिता. वे 14 वर्ष और 124 दिन तक तमिलनाडु की सीएम रहीं।
देश में अब तक 18 महिला मुख्यमंत्री
देश में अब तक कुल 18 महिला मुख्यमंत्री बनी हैं। पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में सुचेता कृपलानी का नाम आता है। वे 1963 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। दूसरी सीएम रहीं शीला दीक्षित। वे दिल्ली, 15 वर्ष से अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहीं। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी 2011 से अब तक सीएम पद पर हैं। अन्य महिला मुख्यमंत्रियों में सुसुचेता कृपलानी, नंदिनी सत्पथी (ओडिशा), शशिकला काकोडकर (गोवा), सैयदा अनवरा तैमूर (असम), वीए जानकी रामचंद्रन (तमिलनाडु), जे जयललिता (तमिलनाडु), मायावती (उत्तर प्रदेश), राजिंदर कौर भट्टल (पंजाब), राबड़ी देवी (बिहार), सुषमा स्वराज (दिल्ली), उमा भारती (मध्य प्रदेश), वसुंधरा राजे (राजस्थान), आनंदीबेन पटेल (गुजरात), मेहबूबा मुफ्ती (जम्मू-कश्मीर), आतिशी (दिल्ली) और रेखा गुप्ता (दिल्ली)।
बंगाल में ममता बनर्जी अजेय क्यों हैं?
ममता बनर्जी की मूल पार्टी कांग्रेस रही है। बाद में उन्होंने अपनी पार्टी- टीएमसी बनाई. वामपंथी शासन से लगातार लडती-झगड़ती रहीं। आखिरकार उन्हें 2011 में वामपंथी शासन को खत्म करने में सफलता मिली। तब से उन्होंने दो महत्वपूर्ण काम किए हैं।आधी आबादी के रूप में ख्यात महिला शक्ति को अपने साथ जोड़े रखने के लिए उन्होंने उनके लिए गर्भावस्था से लेकर बुढ़ापे तक के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाईं।उनकी लक्खी भंडार योजना बमाल की महिलाओं में सबसे पापुलर है। इसके अलावा भी उन्होंने कई योजनाएं युवाओं के लिए भी चलाई हैं। नतीजा यह कि मौजूदा विधानसभा में भाजपा को छोड़ कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के साथ दूसरी विरोधी भी शून्य पर हैं।BJP से मुकाबले की रणनीति जानिए: ममता बनर्जी को अपने काम पर जितना भरोसा है, उतना ही वे बंगाल की भावनाओं को भी समझती हैं। वामपंथियों पर अपने साथ मार-पीट के आरोप लगाते-लगाते उन्होंने 2011 में सत्ता हासिल कर ली। पिछले चुनाव में भाजपा पर उन्होंने आरोप लगाया कि उसके समर्थकों ने उनका पैर जख्मी कर दिया। बाhरी-भीतरी का नुस्खा आजमाया. इस तरह भावनात्मक रूप से भी उन्होंने भापा के खिलाफ लड़ाई लड़ी. इस बार SIR को मुद्दा बना कर वे भाजपा को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं. सुप्रीम कोर्ट में इस मसले पर खुद बहस कर रही हैं. वे चुनाव आयोग के बहाने भाजपा का खेल बिगाड़ना चाहती हैं.
ममता बनर्जी के सामने खतरा क्या है
ममता बनर्जी यह भी समझ रही हैं कि भाजपा से मुकाबला इस बार पहले के मुकाबले थोड़ा कठिन है. इसकी वजह यह है कि पिछली बार उन्हें जो 49 प्रतिशत वोट मिले थे, उसमें 30 प्रतिशत तो अकेले मुसलमानों के थे. भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए मुसलमानों ने कांग्रेस और वामपंथियों का मोह त्याग कर एकमुश्त टीएमसी को वोट किया था. यानी 70 प्रतिशत हिन्दुओं में सिर्फ 19 प्रतिशत वोट ही उन्हें प्राप्त हुए थे. इस बार टीएमसी से निष्कासित नेता हुमायू कबीर के अलग पार्टी बना लेने और मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति वाली मस्जिद बनाने की घोषणा से मुस्लिम वोटों में विभाजन का खतरा पैदा हो गया है. AIMIM के ओवैसी ने भी हुमायू कबीर से हाथ मिला लिया है. यह मुस्लिम मतों में विभाजन का स्पष्ट संकेत है. बांग्लादेश में हिन्दुओं की हत्या से बंगाल का हिन्दू समाज नाराज है. मुस्लिम तष्टिकरण के लिए मशहूर ममता के लिए हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण दूसरा बड़ा खतरा है. तीसरा खतरा बन कर उभरी हैं ईडी और सीबीआई जैसी केंद्री जांच एजेंसियां. उनसे ममता लगातार पंगा लेती रही हैं, लेकिन आई-पैक रेड मामले में उनकी परेशानी बढ़ सकती है। ( बंगाल से अशोक झा की रिपोर्ट )
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