जब केंद्र सरकार ने केरल का नाम बदलकर 'केरलम' करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई, तो इसकी गूंज सीधी कोलकाता तक सुनाई दी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने इसे बड़ा राजनीतिक कदम बताते हुए आरोप लगाया कि केंद्र सरकार को बंगाल की याद सिर्फ चुनाव के समय आती है।आखिर ममता बनर्जी अपने राज्य के लिए क्या नाम चाहती हैं और उन्होंने बीजेपी पर इतना तीखा हमला क्यों बोला है?
ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर 'बांग्ला' करना चाहती है। टीएमसी का तर्क है कि राज्य विधानसभा ने सालों पहले इसका प्रस्ताव पास करके केंद्र सरकार के पास भेज दिया था, लेकिन यह फाइल अभी भी दिल्ली में अटकी पड़ी है। ममता सरकार का साफ कहना है कि जब केरल की मांग झट से मानी जा सकती है, तो बंगाल का प्रस्ताव इतने सालों से क्यों दबाया गया है? ऐसा लगता है कि वामदलों के साथ बीजेपी का अलायंस हो गया है।
बीजेपी और केंद्र सरकार पर तीखा हमला: केरल के फैसले का संदर्भ देते हुए टीएमसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (X) पर एक लंबा और आक्रामक पोस्ट किया।इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर सीधे आरोप लगाए गए। टीएमसी ने बीजेपी को 'बांग्ला-विरोधी' करार दिया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार सिर्फ इसलिए बंगाल की इस जायज मांग को ठुकरा रही है क्योंकि राज्य ने बीजेपी आलाकमान के सामने झुकने से हमेशा इनकार किया है।
मुख्यमंत्री ने तंज कसते हुए कहा, हर चुनाव के वक्त पीएम मोदी और अमित शाह बंगाल आते हैं, मगरमच्छ के आंसू बहाते हैं और हमारी मिट्टी, संस्कृति व लोगों से प्यार का झूठा दिखावा करते हैं. यह ड्रामा अब बंद होना चाहिए।
विरासत का अपमान: टीएमसी ने आरोप लगाया कि इन 'बांग्ला विरोधियों' के मन में राज्य की विरासत, भाषा, महान हस्तियों और बंगाल की गरिमा के लिए रत्ती भर भी सम्मान नहीं है। ममता बनर्जी ने स्पष्ट किया कि जब कोई भी राज्य अपनी मातृभाषा और पहचान को मजबूत करता है (जैसे केरल), तो उन्हें बेहद खुशी होती है, लेकिन बंगाल के साथ किए जा रहे इस "बदले की भावना वाले भेदभाव" को वे कतई स्वीकार नहीं करेंगी। चुनावी टाइमिंग का खेल : इस पूरे राजनीतिक विवाद की टाइमिंग बेहद अहम है. इसी साल पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. ममता बनर्जी अपनी पार्टी टीएमसी को लगातार चौथी बार प्रचंड जीत दिलाने की कोशिश कर रही हैं, जबकि बीजेपी बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के लिए पूरा जोर लगा रही है। केरल का नाम 'केरलम' होने के ठीक बाद, ममता ने 'बंगाली अस्मिता' और 'भाषा' के मुद्दे को छेड़कर चुनावी बिसात बिछा दी है।उनका इशारा आने वाले केरल विधानसभा चुनावों की ओर था। केरल के नाम बदलने के इस फैसले ने ममता बनर्जी को नाराज कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि केरल के प्रस्ताव को इसलिए मंजूरी मिली क्योंकि बीजेपी और सीपीएम के बीच समझौता है। उनका कहना है कि बंगाल का नाम बदलने की मांग को सालों से नजरअंदाज किया जा रहा है। हालांकि केंद्र सरकार के सूत्र इन आरोपों को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि पश्चिम बंगाल का नाम बदलने का मामला सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि कई जटिल प्रशासनिक और कूटनीतिक पहलुओं से जुड़ा है।
'बांग्ला' नाम पर आपत्ति क्यों?
राज्य सरकार ने हाल के वर्षों में बांग्ला'' नाम का प्रस्ताव रखा था। लेकिन केंद्र का तर्क है कि यह नाम पड़ोसी देश बांग्लादेश से मिलता-जुलता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। सूत्रों के मुताबिक, विदेश मंत्रालय ने भी इस पर अपनी चिंता जताई है। उनका मानना है कि किसी बड़े भारतीय राज्य का नाम ऐसा नहीं होना चाहिए जो वैश्विक मंच पर भ्रम पैदा करे।तीन भाषाओं में तीन नाम, यहीं अटका मामला
2016 में राज्य सरकार ने एक अनोखा प्रस्ताव भेजा था-बंगाली में 'Bangla', अंग्रेजी में 'Bengal' और हिंदी में 'Bangal'। केंद्र ने यह कहकर इसे खारिज कर दिया कि एक ही राज्य के अलग-अलग भाषाओं में अलग नाम नहीं हो सकते। नाम हर भाषा में एक जैसा होना चाहिए।इससे पहले 2011 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने 'Paschim Banga' या 'Paschim Bango' नाम का सुझाव दिया था। लेकिन इसे भी मामूली बदलाव बताते हुए मंजूरी नहीं मिली।
2025 में तृणमूल सांसद रिताब्रत बनर्जी ने राज्यसभा में यह मुद्दा उठाया, लेकिन केंद्र ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि इसके लिए संवैधानिक संशोधन की जरूरत पड़ेगी।
इतिहास की परछाईं अब भी साथ: पश्चिम बंगाल के नाम के पीछे इतिहास की लंबी कहानी है। ब्रिटिश दौर में वायसराय लॉर्ड कर्जन ने प्रशासनिक सुविधा के नाम पर बंगाल को पूर्व और पश्चिम में बांट दिया था। भारी विरोध के बाद यह फैसला वापस लेना पड़ा।1947 में देश विभाजन के समय पूर्वी हिस्सा पाकिस्तान में चला गया और 'ईस्ट पाकिस्तान' कहलाया। 1971 के युद्ध के बाद वही इलाका आज का बांग्लादेश बना। भारत में जो हिस्सा रहा, उसने वेस्ट बंगाल' नाम बरकरार रखा-एक तरह से इतिहास की निशानी के रूप में।
ममता बनर्जी का तर्क: वेस्ट' क्यों रहे?
ममता बनर्जी का कहना है कि जब अब 'East Bengal' नाम का कोई राज्य नहीं है, तो 'West' शब्द रखने का क्या मतलब। उनका एक और तर्क भी है-'W' से शुरू होने के कारण राज्य का नाम अक्सर आधिकारिक कार्यक्रमों और सम्मेलनों में सूची के आखिर में आता है। उनका कहना है कि इससे राज्य के प्रतिनिधियों और बच्चों को प्रतियोगिताओं में भी अंत में मौका मिलता है।
उन्होंने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा कि हर मुलाकात में यह मुद्दा उठाया, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उनका आरोप है कि 'Bangla' शब्द का इस्तेमाल सिर्फ चुनावी फायदे के लिए किया जाता है।
सिर्फ राजनीति नहीं, लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया भी
केंद्र सरकार का कहना है कि किसी बड़े राज्य का नाम बदलना आसान नहीं। रेलवे, डाक विभाग, नागरिक उड्डयन मंत्रालय सहित कई विभागों के रिकॉर्ड बदलने पड़ते हैं। संसद में साधारण बहुमत से विधेयक पारित करना भी जरूरी है। यानी मामला भावनाओं और पहचान का जरूर है, लेकिन प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक और जटिल है।
केरल को मिली मंजूरी ने बंगाल में नाम बदलने की बहस को फिर जिंदा कर दिया है। ममता बनर्जी का कहना है कि मौजूदा सरकार स्थायी नहीं है और एक दिन बंगाल को उसकी पसंद का नाम जरूर मिलेगा।
ममता बनर्जी ने उम्मीद जताई है कि भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियां बदलने पर राज्य का नाम बदलेगा। लेकिन फिलहाल साफ है कि 'West Bengal' से सिर्फ 'Bangla' बनने का सफर लंबा और पेचीदा है।
केरल के उदाहरण ने बहस जरूर तेज कर दी है, मगर बंगाल के मामले में इतिहास, कूटनीति और राजनीति-तीनों एक साथ खड़े हैं। यही वजह है कि नाम बदलना उतना आसान नहीं, जितना पहली नजर में लगता है। ( बंगाल से अशोक झा की रिपोर्ट )
#बंगाल #नरेद्रमोदी #ममताबनर्जी #BJP
दुनियाभर के घुमक्कड़ पत्रकारों का एक मंच है,आप विश्व की तमाम घटनाओं को कवरेज करने वाले खबरनवीसों के अनुभव को पढ़ सकेंगे
https://www.roamingjournalist.com/