- सर्वे में आ रही मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और उसके पूर्व सहयोगी जमात-ए-इस्लामी के बीच
पड़ोसी राष्ट्र बांग्लादेश में अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन और उनकी पार्टी आवामी लीग पर प्रतिबंध के बाद से नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार देश चला रही है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि चुनाव के बाद बांग्लादेश की कमान किसके हाथ में जाएगी।निर्वाचन आयुक्त ने क्या कहा?निर्वाचन आयुक्त अबुल फजल मोहम्मद सनाउल्लाह ने मंगलवार देर रात संवाददाता सम्मेलन में कहा, ''स्थानीय स्तर पर संवेदनशीलता के आकलन के आधार पर सुरक्षा व्यवस्था की जा रही है।''निर्वाचन आयोग के अधिकारियों ने कहा कि इन चुनाव में देश के चुनावी इतिहास में कानून प्रवर्तन कर्मियों की अब तक की सबसे बड़ी तैनाती और प्रौद्योगिकी का सबसे व्यापक उपयोग देखने को मिलेगा। सनाउल्लाह ने कहा कि निर्वाचन आयोग को उम्मीद है कि कानून प्रवर्तन एजेंसी मतदान के दौरान और चुनाव के बाद मतदाताओं के लिए शांतिपूर्ण माहौल सुनिश्चित करेंगी।
उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग कानून-व्यवस्था की मौजूदा स्थिति से काफी हद तक संतुष्ट है और ''पहले की तुलना में हम अब बेहतर स्थिति में हैं''। संवेदनशील मतदान केंद्रों की संख्या
उनकी यह टिप्पणी पुलिस महानिरीक्षक बहारुल आलम के उस बयान के कुछ देर बाद आई है जिसमें उन्होंने कहा था कि देश भर में लगभग 43,000 मतदान केंद्रों में से 24,000 मतदान केंद्र ''उच्च'' या ''मध्यम'' जोखिम वाले मतदान केंद्र पाए गए हैं।
पुलिस ने बताया कि उन्होंने निर्वाचन आयोग को संवेदनशील मतदान केंद्रों की सूची सौंपी है, जिससे पता चलता है कि ढाका के 2,131 मतदान केंद्रों में से 1,614 जोखिम वाले हैं।
हालांकि, सेना ने इससे पहले संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि उन्होंने ढाका शहर में दो केंद्रों को ''संवेदनशील'' के रूप में चिह्नित किया है। इन दो दलों के बीच मुख्य मुकाबला
बांग्लादेश में एक जटिल 84 सूत्री सुधार पैकेज पर जनमत संग्रह के साथ-साथ आम चुनाव हो रहे हैं। मुख्य मुकाबला बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और उसके पूर्व सहयोगी जमात-ए-इस्लामी के बीच है।मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग को पिछले साल भंग कर दिया था और पार्टी के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी।बांग्लादेश में बृहस्पतिवार को संसदीय चुनाव होंगे। यह अगस्त 2024 में देशव्यापी व्यापक विरोध प्रदर्शनों में प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद पहला आम चुनाव होगा।सर्वे में BNP को स्पष्ट बढ़त: बांग्लादेश के प्रमुख अखबार प्रथोम आलो द्वारा कराए गए चुनाव पूर्व सर्वे में BNP को भारी बढ़त मिलती दिख रही है।सर्वे के अनुसार BNP को 200 से अधिक सीटें मिलने का अनुमान है। इससे तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने की संभावना मजबूत बताई जा रही है।
जमात-ए-इस्लामी को लगभग 50 सीटों तक सीमित रहने का अनुमान है, जिससे उसकी भूमिका विपक्ष तक सिमट सकती है।
जातीय पार्टी को करीब 3 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। शेष सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों के खाते में जा सकती हैं।
जमात-ए-इस्लामी इस चुनाव में शफीकुर्रहमान के नेतृत्व में मैदान में है।350 सीटों वाली संसद का गणितबांग्लादेश की संसद में कुल 350 सीटें हैं-300 सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं, जबकि 50 सीटों का निर्वाचन विशेष व्यवस्था के तहत होता है।भारत की तरह यहां भी सांसदों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है।चुनाव के साथ जनमत संग्रह भी: अंतरिम सरकार प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव के साथ प्रस्तावित जनमत संग्रह में भी भाग लेने की अपील की है। उन्होंने नागरिकों से सुधारों के पक्ष में मतदान करने का आग्रह करते हुए कहा कि यदि जनमत संग्रह में "हां" को बहुमत मिलता है तो देश के भविष्य को अधिक सकारात्मक दिशा दी जा सकेगी।यूनुस सरकार पिछले कई सप्ताह से अपने 84-सूत्रीय सुधार पैकेज के समर्थन में अभियान चला रही है। उनका कहना है कि ये सुधार देश से कुशासन दूर करने और संस्थागत ढांचे को मजबूत करने के लिए जरूरी हैं।
राजनीतिक संक्रमण के दौर में चुनाव अहम: शेख हसीना युग के अंत और अंतरिम प्रशासन के बाद हो रहे इस चुनाव को बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा तय करने वाला माना जा रहा है। परिणाम न केवल सत्ता परिवर्तन तय करेंगे, बल्कि देश की विदेश नीति, आंतरिक स्थिरता और क्षेत्रीय समीकरणों पर भी असर डाल सकते हैं। भारत सहित पड़ोसी देशों की नजरें इन चुनावों पर लगी हुई हैं। भले ही इन चुनावों को मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार लोकतांत्रिक चुनाव करार दें लेकिन शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। यह प्रतिबंध शेख हसीना को सत्ता से हटाने और पार्टी के 15 वर्ष के शासन को समाप्त करने वाले जन विद्रोह के बाद हुई कार्रवाई के कारण लगाया गया है। अवामी लीग की अनुपस्थिति में बांग्लादेश के चुनाव एक नौटंकी आैर धोखा ही हैं। यह चुनाव अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय की आंखों में धूल झोंकने वाले हैं। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी समेत कई पार्टियां मैदान में हैं। मुख्य मुकाबला बीएनपी और जमात के बीच ही है। शेख हसीना की सरकार गिराने वाले जेन-जी यानि छात्र आंदोलन से जन्मी नेशनल सिटिजन पार्टी भी चुनाव मैदान में है।
चुनावों के साथ प्रधानमंत्री पद की शक्ति को सीमित करने के उद्देश्य से जनमत संग्रह भी कराया जा रहा है। यह जनमत संग्रह शेख हसीना शासन के तख्तापलट के बाद संवैधानिक सुधार के िलए गठित राष्ट्रीय सर्वसम्मति आयोग द्वारा तैयार किए गए दस्तावेज, जुलाई चार्टर में की गई सिफारिशों को लागू करने के उद्देश्य से किया जा रहा है। चार्टर की कई सिफारिशों में से एक बांग्लादेश के राष्ट्रपति की शक्ति को बढ़ाना है। इसमें वर्तमान संविधान के अनुच्छेद से बंगाली शब्द को हटाकर उसके स्थान पर बांग्लादेशी शब्द का इस्तेमाल करने की सिफारिश की गई है। यद्यपि चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में बीएनपी के 200 से ज्यादा सीटों पर जीत की भविष्यवाणियां की जा रही हैं। यानि तारिक रहमान देश के नए प्रधानमंत्री बन सकते हैं। तो दूसरी तरफ जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 पार्टियों के गठबंधन की हालत कमजोर मानी जा रही है लेकिन कुछ चुनाव विशेषज्ञों का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी चौंकाने वाले परिणाम दे सकती है। चुनावों में राजनीतिक दल भारत विरोधी भावनाओं का जबरदस्त फायदा उठाने की कोिशश कर रहे हैं। सोशल मीडिया एआई जनरेटड कंटेंट से भरा हुआ है। चुनावी माहौल में क्रिकेट को लेकर जमकर सियासत की जा रही है। सियासी पार्टियां बांग्लादेश की टी-20 वर्ल्ड कप की निराशा को राष्ट्रीय गरिमा और विदेशी हस्तक्षेप पर सवाल खड़े कर रही है। जमात-ए-इस्लामी ने भारत विरोध को मुद्दा बनाया हुआ है। छात्रों की एनसीपी ने भी भारत विरोध को मुद्दा बनाया है, जिसमें सीमा पर हुई हत्याओं, सीमापार नदियों पर विवाद और बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में भारत के कथित हस्तक्षेप शामिल हैं।
तारिक रहमान की बीएनपी ने अपने घोषणापत्र में भारत का नाम तो नहीं लिया लेकिन तारिक रहमान के भाषणों में तथाकथित 'मौत का जाल' फरक्का बांध के विकल्प के रूप में पद्मा बैराज के निर्माण का प्रस्ताव कठोर रुख का संकेत दे रहा है। सबसे अहम सवाल यह है कि बांग्लादेश की अगली संसद अल्लाह के कानून से चलेगी या अपना नफा-नुक्सान सोच कर। इस समय बांग्लादेश भारत के अहसानों को भुलाकर पाकिस्तान की गोद में बैठ चुका है। यह चुनाव तय कर देगा कि आखिर बांग्लादेश भारत से संतुलन बनाकर चलेगा या पाकिस्तान और चीन की तरफ जाएगा। इस चुनाव से दक्षिण एशिया शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है। शेख हसीना के तख्तापलट के बाद जिस तरह से अल्पसंख्यक हिन्दुओं की हत्याएं हुईं, उनके घर और धर्मस्थान जलाए गए। वह भारत के लिए चिंता का विषय है। शेख हसीना जब से सत्ता से बेदखल होकर भारत में रह रही हैं, तब से भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। भारत और बांग्लादेश की क्रिकेट को लेकर भी विवाद हुआ। बांग्लादेश का पाकिस्तान के साथ संबंध हाल के समय में बेहतर हुए हैं जबकि 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश जब एक नया देश बना था, उसके बाद से दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण ही रहे थे। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में बांग्लादेश के चीन के साथ रणनीतिक रिश्ते और मजबूत हुए हैं। ऐसे में बांग्लादेश में होने जा रहे चुनाव पर भारत, पाकिस्तान और चीन नजर बनाए हुए हैं।
भारत चाहता है कि इस चुनाव के बाद बांग्लादेश में ऐसी सरकार बने जो भारत के साथ रिश्ते सुधार सके। राजनीति के जानकारों का कहना है कि भारत चाहता है कि अवामी लीग के चुनाव नहीं लड़ने पर बांग्लादेश में बीएनपी की सरकार बने। जमात-ए-इस्लामी पार्टी की जीत होने पर भारत की चिंता बढ़ सकती है। जमात-ए-इस्लामी के सत्ता में आने पर सुरक्षा और कट्टरपंथ को लेकर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि भारत दोनों पार्टियों से संपर्क बनाए हुए है। उधर, चीन भी बांग्लादेश में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ा रहा है। उसने मोहम्मद यूनुस की सरकार में काफी निवेश किया है। उधर, पाकिस्तान भी बांग्लादेश को अपने पक्ष में करने में लगा है। पाकिस्तान ने बांग्लादेश से वीजा के नियम आसान करने पर बात की है। अन्तर्राष्ट्रीय बैठकों में पाकिस्तान खुलकर बांग्लादेश का साथ दे रहा है। दक्षिण एशिया के पाॅवर बैलेंस के लिए बांग्लादेश इसलिए अहम है क्योंकि यह देश भूगोल, राजनीति, अर्थव्यवस्था और रणनीतिक हितों चारों मोर्चों पर एक साथ असर डालता है। दक्षिण एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते बांग्लादेश की स्थिरता दक्षिण एशिया की कूटनीतिक तस्वीर को महत्वपूर्ण रूप से आकार दे सकती है। विशेषज्ञों ने जनमत संग्रह के औचित्य पर भी सवाल उठाने शुरू कर िदए हैं। उनका मानना है कि जनमत संग्रह के िवचार और उद्देश्यों के बारे में जनता में बहुत कम समझ है और यह प्रक्रिया तनाव को जन्म दे सकती है, जिससे देश में राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ सकती है। बांग्लादेश का राजनीतिक चरित्र फिलहाल बदला हुआ नजर आ रहा है। अवामी लीग के शासन से भी वहां के लोग खुश नहीं थे लेिकन अवामी लीग की सहभागिता के बिना होने वाले चुनाव में मतदान का प्रतिशत घट सकता है। जातीय आैर धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच आतंक का ऐसा माहौल है कि वे वोट डालने नहीं जा सकते। ऐसे में इन चुनावों को निष्पक्ष और ईमानदार कैसे माना जा सकता है। ( बांग्लादेश बोर्डर से अशोक झा की रिपोर्ट )
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