- बांग्लादेश में चुनावी नतीजों के बीच PM मोदी ने तारिक रहमान को दी बधाई, जानें क्या कहा
बेगम खालिदा जिया के निधन और शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध के बाद यह चुनाव एक नए युग की शुरुआत माना जा रहा है। कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान के नेतृत्व में BNP की इस जीत पर दुनिया भर के नेताओं, जिनमें भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राजदूत शामिल हैं, ने बधाई संदेश भेजे हैं। BNP की ऐतिहासिक जीत और बहुमत
चुनाव आयोग की आधिकारिक घोषणा से पहले ही मीडिया रिपोर्ट्स ने BNP की जीत तय कर दी है। तारिक रहमान की पार्टी 212 सीटों पर जीत दर्ज कर चुकी है। वहीं, जमात 70 सीटों पर जीत दर्ज की है। ऐसे में तारिक रहमान का पीएम बनना तय है। बांग्लादेश में तारिक रहमान को मिली प्रंचड जीत के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें बधाई दी है।
पीएम मोदी ने कहा कि यह जीत बांग्लादेश के लोगों के उनके नेतृत्व में भरोसे को दिखाती है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश के समर्थन में हमेशा खड़ा रहेगा। प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि वह तारिक रहमान के साथ मिलकर भारत-बांग्लादेश के बहुआयामी संबंधों को और मजबूत करने और दोनों देशों के साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए काम करने के लिए उत्सुक हैं। यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि लंबे समय बाद देश में बिना 'दो बेगमों' (खालिदा जिया और शेख हसीना) की सीधी टक्कर के चुनाव हुए हैं, जिससे सत्ता की कमान अब तारिक रहमान के हाथों में जाती दिख रही है।
पीएम मोदी ने दी बधाई: नतीजों के शुरुआती रुझान आते ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बधाई देते हुए लिखा कि,'मैं बांग्लादेश के संसदीय चुनावों में बीएनपी (BNP) को निर्णायक जीत दिलाने के लिए श्री तारिक रहमान को हार्दिक बधाई देता हूं। यह जीत आपकी लीडरशिप में बांग्लादेश की जनता के भरोसे को दिखाती है। भारत एक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और समावेशी बांग्लादेश के समर्थन में खड़ा रहेगा। मैं हमारे बहुआयामी संबंधों को मजबूत करने और हमारे साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए आपके साथ मिलकर काम करने के लिए उत्सुक हूं।'यह जीत केवल एक पार्टी की नहीं, बल्कि उस जिया परिवार की है जिसने दशकों तक बांग्लादेश की सत्ता और संघर्ष को करीब से देखा है. तारिक रहमान का जन्म 1967 में हुआ था, जब आज का बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था. उनकी पहचान उनके माता-पिता से है. उनके पिता जियाउर रहमान सेना के बड़े कमांडर और बाद में राष्ट्रपति बने, और मां खालिदा जिया देश की पहली महिला प्रधानमंत्री रहीं.
जेल की कोठरी से सत्ता के शिखर तक
दिलचस्प बात यह है कि राजनीति तारिक के खून में जन्म से ही थी. 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान, जब वे मात्र 4 साल के थे, उन्हें कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया था. यही वजह है कि उनकी पार्टी उन्हें बांग्लादेश की आजादी की जंग का सबसे कम उम्र का बंदी कहकर सम्मानित करती है.
पारिवारिक विरासत और 'बेगमों की जंग'
तारिक का जीवन उस ऐतिहासिक दुश्मनी के साये में बीता जिसे दुनिया बेगमों की लड़ाई (शेख हसीना बनाम खालिदा जिया) के नाम से जानती है. 1975 में शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या हुई, जिसके बाद तारिक के पिता जियाउर रहमान सत्ता में आए. यहीं से दोनों परिवारों के बीच नफरत की दीवार खड़ी हो गई.
पिता का साया उठा
जब तारिक 15 साल के थे, तब उनके पिता जियाउर रहमान की भी हत्या कर दी गई. इसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी मां खालिदा जिया ने किया. ढाका यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पढ़ाई के दौरान ही वे 23 साल की उम्र में सक्रिय राजनीति में उतर आए.
'डार्क प्रिंस' से निर्वासन तक का दौर
2001 से 2006 के बीच, जब उनकी मां प्रधानमंत्री थीं, तारिक रहमान को राजनीति का 'डार्क प्रिंस' कहा जाने लगा. वे इतने शक्तिशाली थे कि सरकार के बड़े फैसले उनके प्रभाव में होते थे. लेकिन 2007 में वक्त बदला और सैन्य समर्थित सरकार ने उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार कर लिया.
जेल में बिताए समय के दौरान उन्होंने गंभीर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए। 2008 में वे एक गुप्त समझौते के तहत इलाज के लिए लंदन चले गए और फिर 17 साल तक वापस नहीं आए।
लंदन में जीवन और वापसी की रणनीति:
लंदन में रहकर भी तारिक शांत नहीं बैठे। वहां वे अपनी पत्नी, जो एक डॉक्टर हैं, और बेटी के साथ रहे, लेकिन इंटरनेट के जरिए अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से जुड़े रहे। इस दौरान शेख हसीना की सरकार ने उन पर 2004 के ग्रेनेड हमले की साजिश रचने का आरोप लगाया और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई। BNP ने इसे हमेशा राजनीति से प्रेरित बताया।
तारिक रहमान ने की भावुक अपील: अपनी मां और पूर्व पीएम खालिदा जिया के निधन के बाद यह तारिक रहमान के लिए एक बड़ी राजनीतिक और व्यक्तिगत परीक्षा थी। बोगुरा-6 सीट से भारी मतों से जीतने के बाद उन्होंने कार्यकर्ताओं से एक विशेष अपील की है। रहमान ने जीत का जश्न मनाने के बजाय अपनी दिवंगत मां के सम्मान में सादगी बरतने को कहा है। उन्होंने समर्थकों से शुक्रवार की नमाज के बाद खालिदा जिया की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करने का अनुरोध किया है, जो उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
बांग्लादेश की राजनीति में नया मोड़: इस चुनाव ने बांग्लादेश की पुरानी राजनीतिक रंजिशों को पीछे छोड़ते हुए एक नई दिशा दी है। अवामी लीग की अनुपस्थिति में जमात-ए-इस्लामी अब मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरती दिख रही है, जिसे करीब 43 सीटें मिलने का अनुमान है। सालों से चली आ रही 'बैटल ऑफ बेगम्स' के खत्म होने के बाद अब देश की जनता को उम्मीद है कि नई सरकार विकास, लोकतंत्र और स्थिरता पर ध्यान देगी। चुनाव आयोग आज शुक्रवार को अंतिम आधिकारिक परिणाम घोषित कर सकता है।BNP प्रमुख तारिक रहमान ने अपनी दोनों संसदीय सीटों ढाका-17 और बोगुरा-6 से बहुत बड़े अंतर से ऐतिहासिक जीत हासिल की है। बोगुरा उनके परिवार का पुश्तैनी गढ़ माना जाता है जबकि ढाका-17 सीट को राजधानी का दिल कहा जाता है। इन दो सीटों पर मिली बड़ी जीत ने उनके राजनीतिक कद और प्रभाव को जनता के बीच काफी मजबूत कर दिया है।
निर्वासन का लंबा सफर: तारिक रहमान की यह सफलता आसान नहीं थी क्योंकि उन्हें लंदन में 17 साल तक स्वयं-निर्धारित निर्वासन के दौर से गुजरना पड़ा था। वह देश से दूर रहकर भी वीडियो कॉल और सोशल मीडिया के जरिए अपनी पार्टी का नेतृत्व एक विपक्षी नेता के रूप में करते रहे। उनके खिलाफ दर्जनों भ्रष्टाचार के मामले दर्ज थे जिन्हें उन्होंने हमेशा अवामी लीग सरकार का राजनीतिक दबाव बताया था।
कानूनी राहत और वापसी : साल 2024 में हुए विशाल छात्र आंदोलन के बाद ही तारिक रहमान के लिए देश वापसी की नई राजनीतिक जमीन तैयार हुई थी। इसके बाद 2026 की शुरुआत तक ग्रेनेड हमले समेत कई बड़े कानूनी मामलों में उन्हें अदालत द्वारा पूरी तरह बरी कर दिया गया। दिसंबर 2025 में उनकी वतन वापसी हुई जिससे पूरी पार्टी में नई जान आ गई और कार्यकर्ताओं में उत्साह भर गया।
नई व्यवस्था का वादा: चुनाव प्रचार के दौरान तारिक रहमान ने केवल सत्ता हासिल करने के बजाय देश की पूरी व्यवस्था में बड़े सुधार लाने का वादा किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए दो कार्यकाल की सीमा तय करने और संसद में एक नया ऊपरी सदन बनाने का प्रस्ताव पेश किया है। उन्होंने अपने समर्थकों से बार-बार अपील की है कि वे किसी भी तरह के राजनीतिक बदले की भावना से दूर रहें।
भविष्य की चुनौतियां: प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद तारिक रहमान के सामने देश की महंगाई से जूझती अर्थव्यवस्था को संभालना सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी। उन्हें सेना के साथ बेहतर संतुलन बनाना होगा और यह साबित करना होगा कि उनका लोकतंत्र समाज के हर वर्ग के लिए है। युवाओं और अल्पसंख्यकों का भरोसा जीतना भी उनकी भावी सरकार के लिए एक अत्यंत कठिन और महत्वपूर्ण परीक्षा होगी।
जनमत का संदेश: यह चुनाव परिणाम स्पष्ट संदेश देते हैं कि बांग्लादेश की जनता अब एक नई शुरुआत और मजबूत लोकतांत्रिक मूल्यों की बहाली की इच्छा रखती है। 17 साल के लंबे इंतजार के बाद BNP की सत्ता में वापसी ने पूरे देश के समर्थकों के बीच जश्न का माहौल बना दिया है। अब दुनिया की नजरें इस पर होंगी कि तारिक रहमान की यह विरासत नए दौर की उम्मीदों पर कैसे खरी उतरती है।
संघर्ष का परिणाम: अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस के साथ उनकी मुलाकातों ने पहले ही देश में आने वाले इस बड़े राजनीतिक बदलाव का स्पष्ट संकेत दे दिया था। देश के नागरिक अब एक ऐसी स्थिर सरकार की उम्मीद कर रही है जो पारदर्शिता, न्याय और आर्थिक विकास को अपनी प्राथमिकता बनाएगी। BNP की यह भारी जीत केवल एक चुनावी कामयाबी नहीं बल्कि उनके वर्षों के लंबे राजनीतिक संघर्ष का एक बड़ा परिणाम है। ( बांग्लादेश बोर्डर से अशोक झा की रिपोर्ट )
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