बांग्लादेश में 35 साल बाद कोई पुरुष प्रधानमंत्री बनेगा। 1988 में काजी जफर अहमद प्रधानमंत्री बने थे। इसके बाद 1991 से 2024 तक देश की राजनीति में पूर्व पीएम शेख हसीना और खालिदा जिया का दबदबा रहा। ये दोनों ही प्रधानमंत्री बनती रहीं। बांग्लादेश के आम चुनाव में तारिक रहमान की BNP को बंपर जीत मिली है। BNP को कुल 299 में से 212 से ज़्यादा सीटों के साथ जीत मिली है। BNP नेता तारिक रहमान, जो साफ़ बहुमत के साथ सरकार बनाएंगे, प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। बीएनपी अब बांग्लादेश में सरकार बनाने जा रही है और तारिक रहमान बांग्लादेश के अगले प्रधानमंत्री होंगे, लेकिन शफीकुर रहमान की अगुवाई वाला जमात ए इस्लामी गठबंधन बहुत पीछे रह गया है। ऐसे में BNP के लिए मुकाबला आसान माना जा रहा था, लेकिन यह भी कहा जा रहा था कि कट्टरपंथी विचारधारा वाली जमात-ए-इस्लामी पार्टी की अगुवाई वाला गठबंधन कड़ी टक्कर दे सकता है। पाक परस्त है जमात ए इस्लामी जमात ए इस्लामी वही पार्टी है, जिस पर शेख हसीना कई बार कट्टरता फैलाने के आरोप में प्रतिबंध लगा चुकी हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि आख़िरकार 90% मुस्लिम आबादी वाले बांग्लादेश में आख़िरकार जमात कैसे हार गई? वो भी तब जब इस्लामी शासन ही जमात का प्रमुख चुनावी एजेंडा रहा है। बांग्लादेश के चुनाव नतीजों में जमात की हार से यह बात साफ है कि बांग्लादेश की आवाम ने पाकिस्तान परस्त सोच को नकार दिया है। बांग्लादेश की जनता एक बार फिर से पाकिस्तान के प्रभाव को देश में स्थापित नहीं होने देना चाहती थी इसीलिए जमात को चुनाव हरा दिया।भारत को करीब देखना चाहती है बांग्लादेशी आवाम: बांग्लादेशी जनता हमेशा से भारत को अपने करीब देखना चाहती है, न कि पाकिस्तान को। इसीलिए पाकिस्तान परस्त जमात को जनता ने सत्ता तक नहीं पहुंचने दिया। बांग्लादेश की जनता यह भी जानती है कि जमात पाकिस्तान के एजेंडा को हमेशा आगे बढ़ाती है। यह कहा जा सकता है कि बांग्लादेश के चुनाव नतीजों ने पाकिस्तान के छिपे एजेंडे को भी करारी शिकस्त दी है।बांग्लादेशी युवा और महिला दोनों ही जमात के नियम कायदे और क़ानून से डरे हुए नज़र आ रहे थे। उनके मन में यह डर था कि अगर जमात बांग्लादेश में सरकार बनाने में सफल हुई तो यहां इस्लामिक क़ानून लागू हो जाएंगे।कुछ महिलाओं ने बताया कि उन्हें भय है कि अगर जमात आती तो उनकी आज़ादी पर कई तरह के प्रतिबंध लग जाते।युवा इस बात से चिंतित था कि जमात उनके विकास को प्रभावित कर सकती है और देश में कट्टरता को और ज़्यादा बढ़ा सकती है। इसीलिए बड़ी संख्या में युवा और महिलाओं ने जमात के ख़िलाफ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को वोट किया।
हिंदू मतदाताओं ने किसे किया वोट: बांग्लादेश के अल्पसंख्यक यानि हिंदू मतदाताओं ने बड़ी संख्या में बीएनपी को वोट किया और जमात को नकार दिया. जमात के कई नेता हिंदूओं की पूजा पाठ पद्धति पर ही सवाल उठाते दिखाई दे रहे थे. ऐसे हालात में हिंदू मतदाताओं में भी जमात को लेकर एक अजीब सा डर देखने को मिल रहा था. यही वजह है कि हिंदू मतदाताओं ने एकजुट होकर तारिक रहमान पर भरोसा जताया. बांग्लादेश में हिंदू आबादी लगभग 9 फ़ीसदी है।मतगणना के दौरान जब शुरुआती रुझान आने शुरू हुए तब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने बढ़त बनानी शुरू की और यह पूर्ण बहुमत के साथ लगातार बनी रही।लेकिन चुनाव में जमात गठबंधन को जोर का झटका लगा. जमात को उम्मीद थी कि वह इस चुनाव में बड़ा उलटफेर करने में कामयाब रहेगा, लेकिन परिणाम उसके पक्ष में नहीं आया। फिलहाल चुनाव आयोग (ईसी) ने चुनाव परिणाम को लेकर अभी कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है।बांग्लादेश के नेशनल पार्लियामेंट्री चुनावों के लिए चल रही वोटों की गिनती में, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की लीडरशिप वाले अलायंस ने 212 सीटों पर जीत हासिल करके अच्छी बढ़त हासिल की है।
जमात-ए-इस्लामी मुख्य विपक्षी पार्टी बनकर उभरी है। पार्टी के नेता डॉक्टर शफीक़ुर रहमान को विपक्ष की भूमिका निभानी होगी. उनका गठबंधन 70 से भी कम सीटों पर सिमटता दिख रहा है. जमात की अगुवाई वाला गठबंधन को इस समय महज 61 सीटों पर जीत मिली. जबकि छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटिजन पार्टी का दावा है कि पार्टी के खाते में 6 सीटें आई हैं। जमात गठबंधन को 61 सीटों पर तो इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश को 1 सीट पर और 6 सीटों पर अन्य दलों को जीत मिली। अभी 50 सीटों पर परिणाम आना बाकी है।एक सीट पर प्रत्याशी के निधन की वजह से चुनाव टाल दिया गया।बांग्लादेश में चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी ने देशभर में अपने पक्ष में काफी माहौल बनाया था. लेकिन यह माहौल पार्टी के पक्ष में नहीं आया. जमात-ए-इस्लामी कभी बीएनपी की सबसे करीबी सहयोगी हुआ करती थी, लेकिन इस बार मुख्य मुकाबला दोनों की अगुवाई वाले गठबंधनों के बीच ही रहा।
कब बना था जमात का गठबंधन:: जमात-ए-इस्लामी ने बांग्लादेश चुनाव में 11 दलों के साथ गठबंधन किया था। यह गठबंधन पिछले साल अक्टूबर में तब अस्तित्व में आया जब देश की इस्लामिस्ट पार्टियों को एक बैनर के तहत लाने की कोशिश की गई, इस गठबंधन को लाइक-माइंडेड 8 पार्टीज़ के तौर पर बनाया गया था। फिर दिसंबर में 3 अन्य पार्टियां (नेशनल सिटीजन पार्टी, लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी और अमर बांग्लादेश पार्टी) भी इस गठबंधन में शामिल हो गईं। इससे यह संख्या बढ़कर 11 हो गई। लेकिन जनवरी में एक पार्टी गठबंधन से दूर हो गई, हालांकि एक अन्य पार्टी गठबंधन में शामिल हो गई जिससे संख्या 11 ही बनी रही। ( बांग्लादेश बोर्डर से अशोक झा की रिपोर्ट )
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