नेताजी की यह सीख आज के 'शॉर्टकट' वाले युग में बहुत जरूरी है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी भी महान उद्देश्य के लिए 'कीमत' चुकानी ही पड़ती है। चाहे वह राष्ट्र की आजादी हो या आपके करियर की सफलता, आपका संघर्ष ही आपकी जीत का आधार...
नेताजी की यह सीख आज के 'शॉर्टकट' वाले युग में बहुत जरूरी है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी भी महान उद्देश्य के लिए 'कीमत' चुकानी ही पड़ती है। चाहे वह राष्ट्र की आजादी हो या आपके करियर की सफलता, आपका संघर्ष ही आपकी जीत का आधार बनेगा।'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा!' यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि उस फौलादी संकल्प की आवाज है जिसने सोए हुए हिंदुस्तान को जगा दिया था। आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ये शब्द आज भी रगों में बिजली दौड़ा देते हैं। आइए, 'आज के विचार' में समझते हैं कि नेताजी के इस आह्वान का आज के दौर में हमारे जीवन के लिए क्या संदेश है।अस विचार का अर्थ क्या है?जब नेताजी ने 'खून' मांगा, तो उनका मतलब सिर्फ युद्ध नहीं था। वे 'बलिदान' की बात कर रहे थे। उनका मानना था कि आजादी कोई खैरात में मिलने वाली चीज नहीं है, जिसे कोई आपको तोहफे में दे दे। इसे अपनी मेहनत, त्याग और अटूट संघर्ष से कमाना पड़ता है। यह कोट हमें सिखाता है कि अगर आपको जीवन में कुछ बड़ा हासिल करना है, तो आपको अपनी सुख-सुविधाओं यानी कंफर्ट जोन की आहुति देनी ही होगी।आज के दौर में कैसे प्रासंगिक हैं नेताजी के विचार?आज हम एक प्रतिस्पर्धी दुनिया में जी रहे हैं। यहां 'आजादी' का मतलब है - वित्तीय स्वतंत्रता, मानसिक शांति और अपने सपनों को जीने का हक। नेताजी का यह नारा आज के युवाओं को याद दिलाता है कि बिना 'पसीना बहाए' सफलता की मंजिल नहीं मिल सकती। सोशल मीडिया और शॉर्टकट के इस युग में, नेताजी के शब्द हमें धैर्य और कड़ी मेहनत की बुनियादी जड़ों की ओर वापस ले जाते हैं।रोजमर्रा की जिंदगी में कैसे अपनाएं? बलिदान की आदत डालें: अगर आपको करियर में ऊंचाइयां छूनी हैं, तो आज की नींद और आलस्य का बलिदान देना होगा। अनुशासन ही शक्ति है: नेताजी की तरह अपने लक्ष्यों के प्रति अनुशासित रहें। बिना डिसिप्लिन के कोई भी करियर में सफलता नहीं पाई जा सकती! निडर बनें: विपरीत परिस्थितियों में घबराने के बजाय, उनका सामना करने का हौसला रखें। याद रखें, 'आजादी' संघर्ष मांगती है।कौन थे सुभाष चंद्र बोस?सुभाष चंद्र बोस एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने आईसीएस जैसी प्रतिष्ठित नौकरी को लात मार दी क्योंकि उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था। वे एक दूरदर्शी नेता थे जिन्होंने वैश्विक स्तर पर भारत की आजादी के लिए समर्थन जुटाया। उनका व्यक्तित्व अनुशासन, साहस और 'कभी न हार मानने' वाली जिजीविषा का मिश्रण था। वे मानते थे कि विचार तभी जीवित रहते हैं जब उनके पीछे कर्म की शक्ति हो। ( अशोक झा की रिपोर्ट )
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