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एक मां मारी गई। एक बेटी अगवा कर ली गई। और देश का एक हिस्सा… व्यू बढ़ाने के लिए लोगों की भावनाओं का कत्ल करने में जुट गए हैं। पीड़ित परिवार ओर उनकी बेटी के चरित्र पर ही तमाम आरोप लगाकर लोगों की नजरों में उन्हें ही गुनहगार साबित कर देंगे। देख लेना। यहां पड़ोसी इन यूट्यूब के सामने जज बने हुए है तमाम तरह के उल्टी सीधी आप पीड़ित परिवार पर ही लगा देते हैं।
मेरठ के कपसाढ़ गाँव की घटना कोई सामान्य अपराध नहीं है। यह उस समाज का आईना है, जहाँ लाश से पहले कैमरा पहुँचता है और इंसाफ़ से पहले फैसला सुनाया जाता है। मां की चिता अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि यूट्यूबर और कुछ मीडिया चैनल माइक्रोफोन लेकर गली-गली घूमने लग गए। आरोपी के पड़ोसी से पूछा रहे हैं।
“कैसा आदमी था?”
“पहले से शक था?”
जैसे पड़ोसी नहीं,
जैसे जज हों।
जैसे संविधान नहीं, बस कैमरा ही अदालत हो। और फिर शुरू होता है सबसे घिनौना खेल,पीड़ित पर शक।
मां क्यों गई? बेटी का अफेयर तो नहीं था? लड़के ने अपने बचाव में तो नहीं वार कर दिया। घर से बाहर निकलना ही क्यों अपराध हो गया? यह सवाल नहीं हैं,
यह चरित्र हत्या की गोलियाँ हैं।
दलित मां की हत्या और बेटी के अपहरण को कुछ लोग “कंटेंट” कहकर बेच रहे हैं। थंबनेल पर रोती तस्वीर, पीछे डरावना म्यूज़िक और ऊपर चिल्लाती हेडलाइन—
“चौंकाने वाला खुलासा!”पूरा सच!”
पूरा सच? किसने दिया इन्हें सच का ठेका? जब व्यूज़ के लिए दर्द पर सौदेबाज़ी होती है, तो मीडिया प्रहरी नहीं रहता, वह शिकारी बन जाता है।
आज अदालत की ज़रूरत नहीं,
चार यूट्यूब चैनल और दो वायरल वीडियो काफी हैं। आज सबको सब पता है—
बस सच्चाई को छोड़कर। सबसे खतरनाक बात यह नहीं कि अपराध हुआ, सबसे खतरनाक यह है कि हमने अपराध को तमाशा बनने दिया।
अगर आज इनका विरोध नहीं किया, तो कल यह कैमरा आपके दरवाज़े पर होगा।
आपके दुख पर सवाल करेगा।आपके चरित्र पर फैसला सुनाएगा।
( ग्रेटर नोएडा से सुजीत भाटी की कलम से, अच्छा लगे तो शेयर करें )
#सरधना
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