मेरे लिए इस अखबार का बंद होना किसी व्यक्तिगत आघात से कम नहीं, क्योंकि इस संस्थान के साथ मेरी ढेर सारी यादें जुड़ी हैं। लखनऊ के राष्ट्रीय सहारा की तो डमी निकालने से लेकर कभी इस अखबार के नंबर वन की दौड़ में शामिल होने तक के सफर में मेरा भी कुछ अंश शामिल था। पत्रकारिता के सफर में दैनिक जागरण और दैनिक आज के बाद यह मेरा तीसरा अखबार था। पहली जनवरी 1992 को टेलीग्राम के जरिए मुझे दिल्ली ज्वाइन करने को कहा गया था। दिल्ली में लांचिंग हो चुकी थी और कमलेश्वर जी प्रबंध तंत्र से अनबन के चलते अखबार छोड़ने की या तो तैयारी में थे या छोड़ चुके थे, ठीक से याद नहीं।
दिल्ली के लिए चुने जाने के बावजूद 15 दिन काम करने के बाद लखनऊ के लिए रवाना होना पड़ा। दरअसल सुनील दुबे सर ने जीएम दिनेश चन्द्र श्रीवास्तव जी से खेल संवाददाता के लिए मेरी डिमांड कर दी थी। दुबे जी जागरण से मुझे जानते थे और पसंद करते थे। हालांकि उनके साथ मुझे यह आश्वासन देकर रवाना किया गया कि बड़े साहब (स्व. सुब्रत राय जी को तब बड़े साहब ही कहा जाता था) की खेल में विशेष रुचि है इसलिए खेल पेज सेट हो जाने तक आपको 45 दिन लखनऊ में ही रहना होगा फिर वापस दिल्ली बुला लिया जाएगा। लेकिन बाद में सुनील दुबे सर ने दिल्ली के लिए रिलीव करने से इन्कार कर दिया। तब से अगस्त 1996 तक कपूरथला स्थिति राष्ट्रीय सहारा में रहा। यह समय लखनऊ में इस अखबार के लिए तेजाबी दौर था। दरअसल जब इस अखबार को छोड़ा था उस समय इसके पतन की कहानी के लेखक अखबार में जुट चुके थे। अखबार संचालन में जिस पेशेवराना नजरिए की जरूरत होती है वह तो शुरू से ही गायब था। कभी इस कमी को सुधारने की कोशिश भी नहीं की गई। हालांकि सहारा श्री ने अपने अखबार कर्मियों से धन, सम्मान, प्यार, सुरक्षा देने का वादा कर उन्हें उस चमकदार और ग्लैमरस माहौल में काम करने का मौका जरूर दिया जो उससे पहले सोचा भी नहीं जा सकता था।
पत्रकारों को वेतन भले ही कम मिलता था लेकिन सहारा में बड़ी पार्टियों और आए दिन फिल्मी सितारों और बड़े-बड़े इंटरनेशनल खिलाड़ियों से रूबरू होने का मौका खूब मिलता था। दिन भर फील्ड में रहने के बाद जब शाम को सहारा टावर में दमकते दफ्तर के रिसेप्शन में प्रवेश करता तो मन खुश हो उठता। काफी पीता उसके बाद कलम कागज ले जुट जाता। हां, सहारा में रेस्टोरेंट की तरह कैंटीन और उसमें ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर सब कुछ सब्सिडाइज्ड था, इसलिए कम वेतन से भी अपना काम चल जाता था। लेकिन इस चमक-दमक के बावजूद अखबार में काम करने के माहौल का न होना एक टीस पैदा करता था। इस दफ्तर में सबकुछ था बस अखबार की आत्मा नहीं थी। यह तो सुनील दुबे सर का करिश्मा ही था कि प्रबंधन के हस्तक्षेप के बावजूद जब तक वे रहे अखबार चढ़ता गया। एक समय ऐसा भी आया जब जागरण से नेक टू नेक फाइट हुई। लेकिन दुबे सर के हिन्दुस्तान पटना जाते ही जैसे अखबार को नजर लग गई।
बाद के संपादकों पर प्रबंध तंत्र हावी हो गया, जिसका सीधा असर अखबार के तेवर पर पड़ा। बड़ा अजीब सा माहौल हो गया। आप जिनके बारे में सोच भी नहीं सकते थे वे प्रबंधक और संपादक बनने लगे। प्रबंधक का खबरों में दखल शुरू हो गया। स्तरहीन खबरें छापने के दबाव डाले जाने लगे। ऐसे संपादक भी झेले जो इंटरनेशनल मैच के पहले मीटिंग में हिदायत देते कि मैन ऑफ द मैच की फोटो सुबह ही करवा लेना! क्या रिपोर्टर और क्या डेस्क सभी के आत्म-सम्मान को रोज ठेस लगती। बहुत जूनियर साथी अचानक प्रबंधक या संपादक बन जाता और आपको दिन में दो-तीन बार उसके चैम्बर से आदेश लेके आना पड़ता। लखनऊ में राष्ट्रीय सहारा के पतन की शुरुआत हो चुकी थी। अगस्त 1996 में अखबार को तब बड़ा झटका लगा जब संपादकीय की क्रीम को हिन्दुस्तान ने ले लिया। इसके बाद सहारा कभी संभला ही नहीं। उस दौर के वे सहयोगी जो सारे तूफान झेलने के बावजूद इसी अखबार से रिटायर हुए या उन्हें मजबूरन छोड़ना पड़ा, इस सत्य से वाकिफ हैं कि सुनील दुबे सर के कार्यकाल वाले राष्ट्रीय सहारा के शुरुआती लगभग साढ़े तीन सालों जैसा स्वर्णिम दौर फिर नहीं लौटा। पिछले महीने यानि 16 दिसंबर को जब सहारा गया तो अपने पुराने दफ्तर का हाल देखकर मैं सिहर उठा। जिस दफ्तर में कभी सुबह से रौनक हुआ करती थी, वहां समय के साथ हालात बदल जाने की भयावह तस्वीर नजर आ रही थी। जो भी लोग दिखे उनके चेहरे मुरझाए हुए थे। सुबह 11 बजे किसी भी अखबार में मीटिंग का समय होता है लेकिन सहारा में सन्नाटा था। मैं समझ नहीं सका लेकिन यह हजारों कर्मचारियों की अथक मेहनत से खड़े किए गए एक अखबार की अकाल मौत की आहट थी।
अब अपने इस अखबार से जुड़ने की कहानी भी बता दूं। राष्ट्रीय सहारा एक रचनात्मक आंदोलन, हां इसी टैग लाइन ने बहुत प्रभावित किया था मुझे। साल 1991 के अंत में आज अखबार से अग्रज दिलीप शुक्ला जी ने आज अखबार की टेबल पर टेक लगाते हुए अचानक कहा कि तुम दिल्ली में पत्रकारिता करने के लायक हो। उन्होंने मेरे दिल की पुरानी ख्वाहिश के शांत तार अचानक झनझना दिए थे। मुझे हमेशा से लगता था कि दिल्ली में खेल पर मैं रोज कम से कम दो ब्रेकिंग दे सकने में सक्षम हूं। दिलीप भाई ने दिल्ली चलने को कहा और मैं अगले ही दिन संभावनाओं की तलाश के लिए राजधानी जा पहुंचा। दिलीप भाई को पहले ही दिल्ली पहुंचना था, इसलिए उन्होंने मुझसे दो दिन बाद अपने अनुज राजीव शुक्ला के 100 एशियाड विलेज स्थित घर पर मिलने को कहा। दिल्ली में काम करने को उतावला सा मैं सुबह 100 नंबर एशियाड विलेज जा धमका। लेकिन राजीव भाई वसंत साठे के घर पर चली पार्टी से देर रात लौटने की वजह से सो रहे थे। इंतजार का एक-एक मिनट मुझे भारी लग रहा था। मैं एक दिन पहले बगैर रिजर्वेशन गोमती एक्सप्रेस से निकला और पश्चिम बिहार के न्यू मुल्तान नगर स्थित अपने दोस्त के घर रुक गया। अपने सीबी के साथ जागरण व आज में छपी बाईलाइन खबरों की एक फाइल लेकर सुबह डीटीसी की बस पकड़ 8 बजे तक एशियाड विलेज भी जा पहुंचा था। लेकिन यह देखकर मन दुःखी हुआ कि इतनी सुबह उठकर भागा लेकिन यहां तो बड़ा भाई अभी तक सो ही रहा है। राजीव भाई 11 बजे सोकर उठे (आज भी उनका वही ढर्रा है)। खैर, तब तक दिलीप भाई नाश्ता करवा चुके थे।
आंखें मिचमिचाते राजीव भाई आए तो दिलीप भाई ने उनसे कहा कि संजीव दिल्ली में जर्नलिज्म करना चाहता है, इसकी मदद करो। राजीव भाई ने मुझे विनोद दुआ जी से मिलने भेज दिया। विनोद जी ने लखनऊ में एडजस्ट करने को कहा लेकिन साथ ही शर्त रख दी कि खेल ही नहीं अन्य खबरें भी करनी होंगी। एक तो खेल नहीं दूसरा लखनऊ भेज रहे थे। मैं क्लीयर था कि खेल और दिल्ली दोनों चाहिए, इसलिए फैसला लेने में दो मिनट नहीं लगाया। हाथ जोड़ वहीं मना करके चला आया। अगले दिन राजीव भाई को बताया तो उन्होंने कहा हमारी कंपनी बीएजी फिल्म्स में कर लो। मैंने वहां के लिए भी मना कर दिया, क्योंकि उसमें भी स्पोर्ट्स की गुंजाइश न के बराबर थी। तब दिलीप भाई ने कहा कि तुम राष्ट्रीय सहारा चलो। वे मुझे सहारा के दफ्तर ले गए। दिनेश चन्द्र श्रीवास्तव जी ने आज अखबार छोड़कर यहां प्रबंधक के पद पर सहारा ज्वाइन किया था। उस समय दिल्ली और लखनऊ के लिए टेस्ट लिये जा रहे थे। उन्होंने मुझको उसी दिन टेस्ट में बैठने को कहा। मुझे तभी लग गया था कि रचनात्मक आंदोलन में शामिल होने का समय आ गया है। हालांकि मैं इस स्थिति के लिए कतई तैयार नहीं था लेकिन दिलीप भाई ने हौसला बढ़ाते हुए कहा कि तुम आराम से पास हो जाओगे। हुआ भी वही।
कुछ दिन इंतजार के बाद 1 जनवरी 1992 को टेलीग्राम के जरिए तीन दिन के अंदर ज्वाइन करने को कहा गया। लखनऊ जाने से मना करने पर दिनेश जी ने ही कहा था कि अभी चले जाओ कुछ दिन बाद तुम्हें दिल्ली में ही काम करना है। बाकी बता चुके हैं कि फिर क्या हुआ था और कैसे मुझे उसी शहर में काम करना पड़ा जिस शहर के लिए विनोद दुआ जी से मना कर आया था। सहारा ने साढ़े चार साल के कार्यकाल के दौरान ढेर सारे प्यारे दोस्त दिए। ऐसा नहीं कि पहली बार कोई अखबार बंद हुआ है। लेकिन जब भी ऐसा हुआ है उसमें काम करने वाले तमाम कर्मचारियों का परिवार अचानक किस हालात में पहुंच जाता है बताने की जरूरत नहीं। अपने सहारियन दोस्तों से बस यही कहेंगे कि यह दुनिया की आखिरी नौकरी नहीं थी। जिंदगी की रेस वहीं जीतते हैं जो गिरने के बाद धूल झाड़कर फिर दौड़ पड़ते हैं। तो दोस्तों तुम भी रुक मत जाना। ( देश के प्रसिद्ध खेल पत्रकार संजीव मिश्र की कलम से )
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