पीएम नरेंद्र मोदी की हर प्रकार की सतर्कता के बाद भी आतंकवाद अपना फन फैलाने की कोशिश कर रही है। इसका उदाहरण पड़ोसी मुल्क से होने वाले हमले और फिर दिल्ली धमाका। दिल्ली एक बार फिर कांप उठी। डर और आतंक की वह लहर, जिसके लिए 1990 और 2000-10 के दशक याद किए जाते हैं, एक बार फिर भारत के हृदय कहे जाने वाले इस शहर की रगों में दौड़ गई। दिल्ली की नसों में एक बार फिर वही अशांति और अनिश्चितता छाई हुई है, जो अतीत की याद बनकर रह गई थी, जिसकी तबाही को शहर भुलाने की कोशिश कर रहा था। हर किसी का दिल और दिमाग इस बात से बेहाल है कि अगर 10 नवंबर को लाल किला मेट्रो स्टेशन पर हुआ धमाका उन सभी जगहों पर हुआ होता, जिन्हें निशाना बनाया गया था, तो क्या होता। जांच एजेंसियों और मीडिया के लिए यह बेहद भयावह और सनसनीखेज खबर है कि राष्ट्रीय राजधानी के एक हाई-अलर्ट इलाके में एक पुरानी कार के विस्फोट में एक दर्जन से अधिक लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। इस घटना के पीछे चार शहरों में कई जगहों पर इसी तरह के घातक हमलों की योजना बनाने वाले सरगना थे। इसके लिए विस्फोटकों से भरी 32 गाड़ियों का इस्तेमाल किया जाना था। लेकिन इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि विस्फोट में अपनी कार समेत मारे गए युवक एक डॉक्टर थे। इसके अलावा, कई डॉक्टरों, विस्फोटक बनाने के विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, पेशेवरों और उच्च शिक्षित युवाओं ने मिलकर यह योजना बनाई थी। इन रिपोर्टों और दावों पर विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा हो सकती है और इस अभिशाप के पीछे की असली साजिश पर बातचीत हो सकती है। लेकिन इस बात पर कभी बहस नहीं हो सकती कि आतंकवाद मानव शरीर का कैंसर है। यह एक ऐसा अभिशाप है जो पहले मानवता की आत्मा को मारता है और फिर लोगों की जान लेता है। लेकिन असली सवाल यह है: यह कैंसर कब तक रिसता रहेगा और क्या इसका कोई इलाज है? सवाल यह भी है: इस अभिशाप को इस्लाम से जोड़ने और उसे बदनाम करने की साजिशें क्यों रची जा रही हैं और क्या इस्लाम में इसकी कोई गुंजाइश है?इसमें कोई संदेह नहीं है कि हितों के टकराव ने मानव समाज में हिंसा की प्रवृत्तियों को जन्म दिया। हर युग में, मानव स्वभाव की यही विशेषता व्यक्तिगत या सामूहिक लड़ाई, झगड़े और रक्तपात को जन्म देती है। संसाधनों, धन और सत्ता पर कब्जा करने की लालसा मनुष्य को बल और हिंसा के प्रयोग की ओर प्रेरित करती है। हालांकि, इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि धर्मों और धार्मिक भावनाओं का भी इस उद्देश्य के लिए उपयोग किया गया है। इस्लामी शिक्षाओं के संदर्भ में, पवित्र कुरान इस बारे में कहता है: "मनुष्य धर्म से भटकने से पहले एक ही धर्म का था; फिर अल्लाह ने पैगंबरों को शुभ समाचार और चेतावनी देने वाले के रूप में भेजा और उनके साथ सत्य शास्त्र उतारा ताकि लोगों के बीच मतभेदों के विषय में न्याय किया जा सके। और शास्त्र पर मतभेद करने वाले केवल वे ही थे जिन्हें स्पष्ट रूप से यह दिया गया था।" विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि संकट के समय भारत अपने पड़ोसी देशों के लिए बीमा की तरह काम करता है।उन्होंने कहा कि चाहे कोविड महामारी का समय हो या भी किसी भी तरह का आर्थिक संकट, भारत हमेशा अपने पड़ोसियों के साथ खड़ा रहा. पाकिस्तान सीमा पर आतंकी गतिविधियों का समर्थन करता है और ये राजनीतिक परिदृश्य को कैंसर की तरह निगल रहा है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद, पाकिस्तान के राजनीतिक परिदृश्य को कैंसर की तरह निगल रहा है। विदेश मंत्री ने भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के बीच चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों में सुधार इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि ये सीमा पर आतंकी गतिविधियों को लगातार समर्थन देता रहा है।।जयशंकर ने श्रीलंका का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत की पूरी कोशिश होती है कि वो पड़ोसी देशों के साथ उदार रहे, साथ ही उनके सहयोग के लिए हमेशा तत्पर रहे. इसी उद्देश्य के साथ भारत ने आर्थिक संकट के समय श्रीलंका को भारत की ओर से सहायता पैकेज दिए गए।भारत कैसे करता है पड़ोसियों की मदद?
उन्होंने कहा विभाजन के बाद भारत के सामने बड़ी चुनौतियों में से एक ये भी रही है कि वो अपने अच्छे पड़ोसियों को बनाए. भारत का नजरिया उदार और गैर-पारस्परिक है. गैर पारस्परिक से तात्पर्य है कि भारत की कोशिश होती है कि वो दूसरे देशों की मदद करे लेकिन जरूरी नहीं है और देशों से भी वैसे ही मदद की उम्मीद करता है। गैर-पारस्परिक दृष्टिकोण में भारत ऊर्जा, रेल और सड़क संपर्क में आर्थिक मदद और समर्थन, व्यापार और निवेश का विस्तार और आदान-प्रदान और संपर्कों में तेजी लाने लाकर ऐसा कर रहा है।
संकट के समय की पड़ोसियों की मदद
एस जयशंकर ने कहा कि जब भी पड़ोसियों पर संकट का समय आया है, चाहे वह कोविड महामारी का दौर हो या फिर आर्थिक मंदी की स्थिति हो. भारत ने वास्तव में अपने पड़ोसियों के लिए मुश्किस समय में मदद करने वाले एक बीमा की तरह काम किया है.
इनमें बहुत सारे छोटे पड़ोसी शामिल हैं. 2023 में जब दुनिया में श्रीलंका की आर्थिक स्थिति बुरी हालत में तो भारत ने 4 बिलियन अमरीकी डालर से ज्यादा का पैकेज अपने पड़ोसी के लिए तैयार किया. जबकि, बाकी दुनिया ने कहीं भी ऐसा नहीं किया गया. उन्होंने कहा कि ये यह भी बिल्कुल सही है कि राजनीतिक घटनाक्रम बहुत सी मुश्किल भरी परिस्थितियों को जन्म दे सकते हैं. इसका मौजूदा समय में उदाहरण बांग्लादेश है. उन्होंने म्यांमार और अफगानिस्तान के साथ चले आ रहे लंबे समय के संपर्क के बारे में भी चर्चा की।( अशोक झा की रिपोर्ट )
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