- यूं कहे कि भाजपा की प्राणवायु है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
- सार्वजनिक विमर्श राज्यसत्ता, राजनीतिक दलों और सरकारों के इर्द-गिर्द केंद्रित
अशोक झा/ कोलकाता: आज सार्वजनिक जीवन में जब 'संघ' की चर्चा होती है, तो प्रायः उसका संकेत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर होता है। देश में जब भी संघ और केंद्र सरकार के संबंधों को लेकर कोई बड़ा प्रसंग सामने आता है, राजनीतिक बहस तेज हो जाती है। संघ के पदाधिकारियों के समक्ष सरकार के मंत्रियों द्वारा अपने कामकाज का विवरण प्रस्तुत करने से लेकर भाजपा की नीतियों और नेतृत्व में संघ की भूमिका तक, अनेक प्रश्न बार-बार उठते रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में सरसंघचालक मोहन भागवत और अन्य प्रमुख स्वयंसेवकों के समक्ष मंत्रियों द्वारा कामकाज की प्रस्तुतियाँ दिए जाने के प्रसंग को भी विपक्ष ने सरकार पर संघ के प्रभाव के प्रमाण के रूप में देखा था। आलोचकों के लिए यह संवैधानिक सरकार पर एक वैचारिक संगठन का प्रभाव है, जबकि संघ और भाजपा से जुड़े लोग इसे समान वैचारिक पृष्ठभूमि वाले संगठनों के बीच स्वाभाविक संवाद बताते हैं। प्रश्न केवल इतना नहीं है कि संघ सरकार को प्रभावित करता है या सरकार संघ की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरती है। बड़ा प्रश्न यह है कि एक शताब्दी पहले नागपुर में कुछ युवाओं के साथ आरंभ हुआ संगठन भारतीय समाज, संस्कृति, राजनीति और सार्वजनिक चेतना में इतना प्रभावशाली कैसे हो गया कि उसके समर्थन और विरोध के बिना समकालीन भारत की राजनीतिक कथा अधूरी दिखाई देती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के बीच नाभि-नाल का संबंध है। दोनों का रिश्ता वैचारिक भी है और संगठनात्मक इतिहास से उपजा हुआ भी। किंतु दोनों को एक ही संस्था मान लेना संघ के स्वरूप को समझने में भूल होगी। संघ की अपनी मान्यता है कि चिंतन में संस्कृति, सामाजिक संगठन, चरित्र-निर्माण, राष्ट्रीय अस्मिता और सेवा को केंद्रीय स्थान प्राप्त है। इसीलिए संघ अपने राजनीतिक संबंधों की व्याख्या करते हुए प्रायः इस धारणा पर बल देता है कि राजनीति साधन है, साध्य नहीं। इसके विपरीत आलोचक मानते हैं कि संघ ने स्वयं को प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति से अलग रखते हुए भी राजनीतिक निर्णयों, सत्ता-संरचना और सार्वजनिक नीतियों पर प्रभाव डालने की असाधारण क्षमता विकसित की है। भारतीय लोकतंत्र में संघ की वास्तविक भूमिका को समझने के लिए इन दोनों दृष्टियों को देखना आवश्यक है। स्वतंत्रता के बाद देश का अधिकांश सार्वजनिक विमर्श राज्यसत्ता, राजनीतिक दलों और सरकारों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है। संघ का संगठनात्मक विस्तार इस सत्ता-केंद्रित दृष्टिकोण से अलग एक सामाजिक प्रयोग के रूप में आरंभ हुआ था। लेकिन समय के साथ उसका राजनीतिक प्रभाव भी लगातार बढ़ता गया। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिले व्यापक जनसमर्थन के संदर्भ में भी संघ के कुछ स्वयंसेवकों की भूमिका को लेकर चर्चाएँ होती रही हैं। इसे संघ द्वारा कांग्रेस के पक्ष में किसी औपचारिक निर्णय का निर्विवाद प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।1922 में जेल से लौटने के बाद हेडगेवार ने भारतीय समाज और स्वतंत्रता आंदोलन की दशा पर गंभीर चिंतन किया। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना आवश्यक है। लेकिन यदि समाज भीतर से विभाजित, अनुशासनहीन और आत्मविश्वास से वंचित रहा तो स्वतंत्रता की रक्षा कठिन होगी। वे हिंदू समाज के भीतर जातिगत विभाजन, सामाजिक दूरी, आपसी अविश्वास और सामूहिक संगठन के अभाव को राष्ट्रीय दुर्बलता का कारण मानते थे। उनका समाधान किसी नए राजनीतिक दल की स्थापना में नहीं बल्कि ऐसे नियमित संगठनात्मक अभ्यास में था जो सामान्य व्यक्तियों में नेतृत्व, आत्मसंयम, साहस, सामूहिकता और राष्ट्रभाव विकसित कर सके। इसी चिंतन का परिणाम 27 सितंबर, 1925, विजयादशमी के दिन नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के रूप में सामने आया। उस दिन कुछ सहयोगियों के साथ हेडगेवार ने अपने घर पर इस नए संगठनात्मक प्रयोग की शुरुआत की। बाद में 28 मई, 1926 को नागपुर के मोहिते बाड़ा में नियमित दैनिक शाखा आरंभ हुई। मोहिते बाड़ा का वह परिसर, जहाँ खेलकूद, व्यायाम, दंड-अभ्यास और सामूहिक प्रशिक्षण शुरू हुआ, संघ की स्मृति में उसके प्रारंभिक विस्तार का प्रतीक बन गया।
हेडगेवार ने संघ को प्रत्यक्ष धार्मिक अनुष्ठानों अथवा चुनावी राजनीति पर केंद्रित संस्था के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक स्वयंसेवक संगठन के रूप में विकसित करने का प्रयास किया। संघ का घोषित उद्देश्य हिंदू समाज में संगठन, अनुशासन, राष्ट्रीय चेतना, आत्मबल और सामाजिक एकता विकसित करना था। शाखा इसका आधार बनी। यहाँ नियमित उपस्थिति, खेल, व्यायाम, दंड-अभ्यास, पथ-संचलन, प्रार्थना, बौद्धिक चर्चा और सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण का प्रयास किया गया। 'एकशः संपत्' जैसी आज्ञाएँ पंक्तिबद्ध अनुशासन का अभ्यास कराती थीं। शाखा में मुख्य शिक्षक की आज्ञा का पालन सामूहिक व्यवस्था का अंग माना गया। पद, धन और सामाजिक प्रतिष्ठा की अपेक्षा नियमितता तथा कार्यनिष्ठा पर बल देने की परंपरा विकसित हुई। हेडगेवार के दृष्टिकोण को संस्कृत के 'वादानवलम्ब्य' और 'सर्वेषाम् अविरोधेन' जैसे सूत्रों से भी व्यक्त किया गया-अर्थात अनावश्यक वाद-विवाद से बचकर तथा यथासंभव किसी के प्रति विरोध का भाव रखे बिना सामाजिक संगठन का कार्य करना।
संघ का एक महत्वपूर्ण वैचारिक आग्रह राष्ट्र और राज्य के बीच अंतर को लेकर रहा। पश्चिम के आधुनिक राष्ट्र-राज्य की अवधारणा में राजनीतिक सीमाओं, राजसत्ता और नागरिकता को केंद्रीय स्थान प्राप्त है, जबकि संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में भारत की प्राचीन सभ्यता, साझा सांस्कृतिक स्मृति, परंपराएँ और मातृभूमि के प्रति भावनात्मक संबंध महत्वपूर्ण माने जाते हैं। संघ भारत को केवल भूगोल या उपभोग की भूमि नहीं, बल्कि मातृभूमि और सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखता है। 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी' और 'वंदे मातरम्' के भाव इसी दृष्टि के आधार हैं। संघ के समर्थक इसे भारतीय राष्ट्रचेतना की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति मानते हैं, जबकि आलोचकों का प्रश्न है कि धार्मिक और सांस्कृतिक विविधताओं वाले आधुनिक भारत में इस अवधारणा के भीतर सभी समुदायों की समान भागीदारी कैसे सुनिश्चित होगी।
संघ की स्थापना के बाद आरंभिक महीनों में संगठन का कोई औपचारिक नाम निर्धारित नहीं था। डॉ. हेडगेवार ने 17 अप्रैल, 1926 को अपने निवास पर एक बैठक बुलाई, जिसमें छब्बीस स्वयंसेवकों के उपस्थित होने का उल्लेख मिलता है। बैठक में संगठन के नाम पर विचार किया गया। 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ', 'ज़री पटका मंडल' और 'भारतोद्धार मंडल' प्रमुख प्रस्ताव थे। 'हिंदू स्वयंसेवक संघ', 'शिवाजी संघ' और 'महाराष्ट्र सेवक संघ' जैसे नाम भी चर्चा में आए। संघ की परंपरा में वर्णित विवरण के अनुसार बीस स्वयंसेवकों ने 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' नाम का समर्थन किया और पाँच ने 'ज़री पटका मंडल' को पसंद किया। 'ज़री पटका' नाम का संबंध मराठा और पेशवाई परंपरा से था तथा इसे प्रथम वर्ष के एक छात्र द्वारा सुझाया गया बताया जाता है। अंततः 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' नाम स्वीकार किया गया। इस नाम में राष्ट्र को उद्देश्य, स्वयंसेवा को कार्यपद्धति और संघ को संगठनात्मक स्वरूप के रूप में समाहित माना गया।
संघ की शाखा-पद्धति की विशेषता यह थी कि उसने संगठन निर्माण को किसी असाधारण अवसर, आंदोलन अथवा बड़े सम्मेलन पर निर्भर नहीं रहने दिया। दैनिक शाखा ने संगठन को निरंतरता प्रदान की। सामान्य व्यक्ति रोज कुछ समय एक निश्चित स्थान पर पहुँचकर सामूहिक अभ्यास करे, अपने से भिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि वाले लोगों से मिले और धीरे-धीरे सार्वजनिक कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त करे-यह देखने में साधारण लेकिन संगठनशास्त्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रयोग था। ऐसे प्रयोग की शक्ति उसकी पुनरावृत्ति में छिपी होती है। वही कार्य जो एक दिन में मामूली दिखाई देता है, दशकों के अभ्यास से स्थायी सामाजिक नेटवर्क का रूप ले सकता है।
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