- शरद पूर्णिमा की चांदनी से धरती के कण-कण को नहलाकर करती है शीतल
- दही, बताशे के साथ पान और मखान भी इस खुशी में होंगे शामिल
- यह त्योहार नवविवाहित पुरुषों के लिए है, जिनकी शादी के बाद यह होता है पहला कोजागरा
अशोक झा/ सिलीगुड़ी:
भारत जैसे आस्थावान देश में, मिथिला में हर दिन कोई न कोई ऐसा अवसर आता है जिसे लोग बड़े उत्साह, उमंग और श्रद्धा के साथ मनाते हैं। इस पर्व को लेकर मिथलांचल वासियों में 25 अक्टूबर को ऐसी धूम रहेंगी जैसा मानो धरती पर स्वर्ग उतर आया हो।
आश्विन महीने की पूर्णिमा का चांद अपनी मुस्कान हर जगह बिखेरेगा। वह अपनी चांदनी से धरती के कण-कण को नहलाकर शीतल कर देगा। वह मानो अपने अमृत-कलश को उंडेल देगा। लोक-मान्यता के अनुसार, आश्विन पूर्णिमा की रात को चांद अमृत बरसाता है। इसी दौरान, धरती पर 'फोंका मखान' (मखाने) के साथ-साथ हंसी-खुशी का माहौल भी छा जाएगा। दही और बताशे भी इस खुशी में शामिल होंगे। यह सब मिथिला के प्रसिद्ध त्योहार 'कोजागरा' के अवसर पर होगा, जो विशेष रूप से नवविवाहित दूल्हों के लिए मनाया जाता है। यह त्योहार उन नवविवाहित पुरुषों के लिए है, जिनकी शादी के बाद यह पहला कोजागरा होता है। लेकिन, यह पूरा समाज को एक साथ लाता है, जहां सब पूर्णिमा के चांद, मखाने, दही और बताशे की खुशी में सराबोर होकर धरती पर ही स्वर्ग जैसा आनंद महसूस करते हैं। मिथिला की अपनी एक अनूठी पहचान है; यहाँ जनजीवन के लगभग हर पहलू को अपने ही दृष्टिकोण से देखा गया है और अपनी स्वतंत्र सोच को बनाए रखा गया है। संगीत और ज्योतिष जैसे कई क्षेत्रों में मिथिला की अपनी एक खास पहचान रही है। इसके अलावा, त्योहारों के मामले में भी मिथिला की अपनी एक अलग ही छाप है। मिथिला में कई तरह के त्योहार मनाए जाते हैं। नवविवाहित जोड़ों के लिए, जिनकी शादी को अभी कुछ ही समय हुआ है, दो प्रमुख त्योहार होते हैं। पहला है 'मधुश्रावणी', जो नवविवाहित वधू (दुल्हन) के लिए होता है, और दूसरा है 'कोजागरा', जो नवविवाहित वर (दूल्हे) के लिए होता है। ये दोनों त्योहार दूल्हा और दुल्हन अपने-अपने घरों में मनाते हैं। इन त्योहारों के दौरान, पूजा-सामग्री और उपहारों से भरी टोकरियों के साथ-साथ, घर-परिवार के लिए ढेर सारे नए कपड़े और मिठाइयां आती हैं। 'मधुश्रावणी' मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा मनाया जाता है, जबकि 'कोजागरा' में पुरुष, महिलाएं और बच्चे सभी शामिल होते हैं।घर पर 'दूभी-धान' से 'चुमावन' की रस्म निभाई जाएगी: कोजागरा के दौरान, दूल्हे के घर से 'चुमावन' के लिए एक टोकरी (डाला) आती है, जिसे 'दूभी-धान' और मिठाइयों से सजाया जाता है। इसमें तरह-तरह की मिठाइयों के साथ मखाना, मखाने की माला, घुनेश, चांदी के सिक्के, नारियल, केला, दही, पान, सुपारी, लौंग, इलायची आदि रखे जाते हैं। पहले, इसे सुपारी के पत्तों और जनेऊ आदि से भी सजाया जाता था, जो मैथिली युवतियों की हस्तकला और हुनर को दर्शाता था। अब यह चलन कुछ कम हो गया है। लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार टोकरी में अन्य चीजें भी सजाते हैं। परिवार के बड़े-बुजुर्ग इन टोकरियों को देखते हैं। टोकरी जितनी बड़ी और सुंदर सजी होती है, उतनी ही अधिक तारीफ होती है। दूल्हे के घर की महिलाएं इस टोकरी में रखे 'दूभी-धान' से उसे प्यार से चूमती हैं (चुमावन करती हैं) और 'पुरहर-पाटिल' (विशेष दीपक) से उसके गालों को सहलाती हैं। परिवार और समाज के बड़े-बुजुर्ग 'दुर्वाक्षत मंत्र' के साथ उसे लंबी और खुशहाल जिंदगी का आशीर्वाद देते हैं। यह रस्म एक खास तरीके से पूरी की जाती है। इसके लिए आंगन में आठ पंखुड़ियों वाला 'अरिपन' (रंगोली) बनाया जाता है, जिस पर यह टोकरी रखी जाती है। साथ ही, 'पुरहर-पाटिल' और कलश के लिए भी अरिपन बनाया जाता है। आम के पत्तों वाले एक कलश के नीचे धान रखा जाता है। इस कलश के पास दीपक जलता रहता है। मिथिला का कोई भी त्योहार गीतों के बिना कैसे पूरा हो सकता है? इस तरह, मैथिली युवतियों के मधुर गीतों के बीच यह 'चुमावन' की रस्म पूरी होती है।सर महोदय बनता कन्या: 'सर' (पत्नी का भाई) शब्द सुनते ही होंठों पर मुस्कान आ जाती है। और जब उसे दुल्हन बनाकर दूल्हे के बगल में बिठाने की बात आती है, तो वह मुस्कान खिलखिलाहट में बदल जाती है। कोजागरा की रात को, जब नया दूल्हा आंगन पार करता है, तो मैथिली महिलाओं की हंसी पूरे माहौल में गूंज उठती है। कोजागरा पर्व तक दुल्हन का विवाह पूरी तरह संपन्न नहीं माना जाता। हालांकि शादी के चौथे दिन ही विवाह संपन्न होने की परंपरा है, लेकिन कई जगहों पर ऐसा तुरंत नहीं होता। उस समय तक लड़की अपने मायके में ही रहती है। ऐसे में दूल्हा अकेला कैसे रह सकता है? इसलिए कई जगहों पर दुल्हन की जगह एक कलश रखा जाता है, तो कहीं दुल्हन की जगह उसके भाई (साले) को बिठा दिया जाता है। अक्सर यह देखा जाता है कि यह भाई दुल्हन से उम्र में छोटा होता है। उन्हें तौलिये से ढक दिया जाता है और घर-आंगन का कोना-कोना खुशी से भर जाता है।
पान, मखाना और बताशा बांटे जाएंगे: आंगन में रस्म पूरी होने और लक्ष्मी पूजा के बाद, घर में चहल-पहल और बढ़ जाती है। दूल्हे के घर से लाए गए मखाने, पान और बताशे लोगों के बीच बांटे जाते हैं। एक-एक करके सबको ये चीजें दी जाती हैं। बच्चों में तो कुछ ज्यादा ही उत्साह होता है। वे दूल्हे के सामने अपने हाथ फैला देते हैं, और दूल्हा उनके हाथों में मखाने और बताशे रख देता है। साथ ही, वह पान भी देता है। शाम को गांव वालों को निमंत्रण दिया जाता है। लोग बारी-बारी से उन सभी घरों में जाते हैं जहां कोजागरा मनाया जा रहा होता है। वहां लोग मखाने और बताशे खाने लगते हैं; उनके खाने से आने वाली 'कुरकुर-कुरकुर' की आवाज और पान से रंगे होंठ व दांत देखकर मेजबान को तसल्ली मिलती है। लोग कई जगहों से मखाने और बताशे इकट्ठा करके उनकी छोटी-छोटी टोकरियां बना लेते हैं। टोकरियां बनाते समय, वे बच्चों पर भी मखाने और बताशे लुटाते हैं, जो अगली सुबह तक मुस्कुराते हुए आने-जाने वालों का स्वागत करते रहते हैं। लक्ष्मी पूजन और रात्रि जागरण:
दीपावली की रात तो हर जगह लक्ष्मी और गणेश की पूजा होती ही है। मिथिला में भी 'दियाबती' (दीपावली) की रात लक्ष्मी-गणेश की पूजा की जाती है, लेकिन यहाँ 'कोजागरा' की रात लक्ष्मी पूजा का विशेष महत्व है। इसके लिए घर के मुख्य द्वार से लेकर 'भगवती घर' (पूजा स्थल) तक 'अरिपन' (अल्पना/रंगोली) बनाए जाते हैं। 'चिनुआर' (घर का एक विशेष स्थान) पर भी अरिपन बनाया जाता है। वहाँ पानी से भरी एक बाल्टी या पात्र में आम के पत्ते रखे जाते हैं, और परिवार की सबसे बुजुर्ग महिला देवी के लिए घर बनाने की रस्म पूरी करती हैं। मान्यता है कि कोजागरा की रात, देवी लक्ष्मी घरों में जाकर देखती हैं कि कौन जाग रहा है।
रात के समय, वरदान देने वाली देवी लक्ष्मी 'कोजागर्ती' (जागने वाली) के रूप में कहती हैं:
"जो पासा (द्यूत) खेलता है, मैं उसे धन प्रदान करूँगी।"
इसी मान्यता के चलते, बहुत से लोग पूरी रात जागते हैं। जिन घरों में यह उत्सव मनाया जाता है, वहाँ लोग मखाने, बताशे और पान देकर मेहमानों का स्वागत करते हैं। वहीं, जिन घरों में उत्सव नहीं होता, वहाँ लोग पचीसी (एक प्रकार का पासा खेल) आदि खेलकर रात बिताते हैं और माता लक्ष्मी के स्वागत के लिए जागते रहते हैं।
ससुराल पक्ष के बीच पचीसी: कोजागरा की रात ससुराल पक्ष के लोगों के बीच 'पचीसी' खेलने की परंपरा रही है। वे पूरी रात इसी खेल में बिताते थे। इस दौरान उनकी हँसी-ठिठोली से माहौल गूँज उठता था, लेकिन अब ऐसा कम ही देखने को मिलता है। मिथिला के गाँव अब अपने लोगों के बिना उदास हैं। घर की बहुएँ अपने पति और बच्चों के साथ बड़े शहरों में रह रही हैं, जबकि पुरुष रोज़गार की तलाश में बाहर गए हुए हैं। यही कारण है कि कोजागरा की रात ससुराल पक्ष के बीच पचीसी खेलने की परंपरा अब केवल उन्हीं घरों तक सीमित रह गई है जहाँ यह उत्सव मनाया जाता है, और वह भी अब केवल एक रस्म के तौर पर ही निभाई जाती है।
कौमुदी उत्सव का आयोजन: नवविवाहित जोड़ों के घरों में मनाए जाने वाले कोजागरा के अलावा, कई संस्थाएँ और संगठन भी इसे 'कौमुदी उत्सव' के रूप में मनाते हैं। कई साहित्यिक संस्थाएँ इस अवसर पर कवि-सम्मेलन आयोजित करती हैं, जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) इस मौके पर सामूहिक भोज का आयोजन करता है। कोजागरा की रात को, खुले आसमान के नीचे 'मखान-खीर' बनाई जाती है। इसके पीछे यह मान्यता है कि चांदनी के साथ अमृत की वर्षा होगी। इसे बिना ढके रखा जाता है और सब लोग मिलकर इसे खाते हैं। इस त्योहार के मौके पर लोग अपने घरों में भी खीर बनाते हैं। आइए, मिथिला के इस प्रसिद्ध त्योहार में शामिल हों। आइए, देवी लक्ष्मी से प्रार्थना करें कि वे अपनी कृपा-दृष्टि से पूरे मिथिला को आशीर्वाद दें। आइए, चंद्रमा से विनती करें कि वे मिथिला की भूमि पर अमृत बरसाएं और यहां की मिट्टी को इतना उपजाऊ बनाएं कि सभी फसलें खूब लहलहाएं। आइए, नवविवाहितों के कक्ष में 'फोन्का मखान' (फूल मखाने), बताशे और पान का आनंद लें।
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