- सरगी से लेकर पूजा तक भद्रा का साया नहीं, 29 अक्टूबर को किस समय दिखेगा चांद? नोट करें सही टाइम
पंडित अशोक झा/ सिलीगुड़ी: करवा चौथ पर भद्रा की टेंशन खत्म! 29 अक्टूबर को शाम 05:38 से शुरू होगा पूजा मुहूर्त; जानिए रात को कब दिखेगा चांद और क्या है व्रत पारण की सही विधि हम बताने जा रहे है। हिंदू धर्म में करवा चौथ व्रत का विशेष और अत्यंत पावन महत्व माना गया है. सुहागिन महिलाएं यह व्रत अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी दांपत्य जीवन के लिए रखती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, करवा चौथ का व्रत पूरी तरह से निर्जला रखा जाता है।
पंडित अभय झा के अनुसार, इस वर्ष करवा चौथ का पावन पर्व गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा. पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की कामना से महिलाएं सूर्योदय से लेकर चंद्र दर्शन तक अन्न और जल का पूरी तरह त्याग करती हैं। बंगाल ,उत्तर भारत विशेषकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार में इस पर्व की विशेष धूम रहती है। इस दिन माता पार्वती, भगवान शिव, श्रीगणेश और कार्तिकेय के साथ-साथ विशेष रूप से करवा माता की पूजा की जाती है।
इस बार नहीं रहेगा भद्रा का साया
पंडित झा ने बताया कि इस वर्ष करवा चौथ के दिन पूजा और सरगी के समय भद्रा का कोई प्रभाव नहीं रहेगा:
भद्रा आरंभ: 28 अक्टूबर 2026, सुबह 05:31 बजे
भद्रा समाप्ति: 29 अक्टूबर 2026, सुबह 04:27 बजे
पंचांग के अनुसार, 29 अक्टूबर की सुबह 04:27 बजे ही भद्रा समाप्त हो जाएगी। इसके चलते सुबह सरगी ग्रहण करने और दिनभर के मांगलिक कार्यों में भद्रा का कोई व्यवधान नहीं पड़ेगा। शाम के पूजन के समय भी भद्रा मुक्त वातावरण रहेगा। धार्मिक मान्यताओं में भद्रा काल को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है, इसलिए भद्रा का न होना व्रतियों के लिए अत्यंत शुभ संकेत है। करवाचौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के जीवन में विशेष महत्व रखता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के साथ निर्जला व्रत रखती हैं। व्रत की शुरुआत सुबह सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करने के साथ होती है. इसके बाद महिलाएं दिनभर बिना अन्न और जल के रहकर व्रत का पालन करती हैं।शाम को विधि-विधान से करवा माता की पूजा की जाती है और चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।फिर पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत खोला जाता है. उज्जैन के ज्योतिषाचार्य आनंद भारद्वाज के अनुसार, करवाचौथ की पूजा में पूजन थाली का विशेष महत्व है।इस साल करवा चौथ का त्योहार 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को मनाया जाएगा। इस अवसर पर महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, जिसमें चूड़ियों का विशेष स्थान होता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, करवा चौथ पर अपनी राशि के अनुकूल रंग की चूड़ियां पहनना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे वैवाहिक जीवन में प्रेम, सौहार्द और सकारात्मकता बढ़ती है।
करवा चौथ 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार, करवा चौथ का व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। इस साल चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर को सुबह लगभग 1:06 बजे शुरू होगी और उसी रात 10:09 बजे समाप्त होगी।
नई दिल्ली के लिए पूजा का अनुमानित शुभ मुहूर्त शाम 5:38 बजे से 6:56 बजे तक है। चंद्रोदय रात करीब 8:17 बजे होने की संभावना है। अलग-अलग शहरों में चंद्रोदय और पूजा के समय में अंतर हो सकता है।करवा चौथ पर चूड़ियों का धार्मिक महत्व: हिंदू परंपरा में चूड़ियों को सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। करवा चौथ पर महिलाएं लाल, हरी, गुलाबी और सुनहरे रंग की चूड़ियां पहनना पसंद करती हैं। ज्योतिष में शुक्र ग्रह को प्रेम, सौंदर्य और वैवाहिक सुख से जोड़ा जाता है। करवा चौथ सनातन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहार है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और खुशहाल दांपत्य जीवन के लिए रखती हैं। यह पर्व हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।इस पावन पर्व पर एक विस्तृत रिपोर्ट नीचे दी गई है। अखंड सौभाग्य का प्रतीक: यह व्रत मुख्य रूप से उत्तर और मध्य भारत में बेहद लोकप्रिय है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पूरे नियम से व्रत रखने से वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है।करवा और चतुर्थी का योग: 'करवा' का अर्थ होता है मिट्टी का पात्र (बर्तन) और 'चौथ' का अर्थ है चतुर्थी तिथि। इस दिन मिट्टी के करवे से भगवान गणेश, शिव-पार्वती और कार्तिकेय की पूजा की जाती है। पौराणिक कथा: महाभारत काल में द्रौपदी ने पांडवों के संकट दूर करने के लिए भगवान कृष्ण के कहने पर यह व्रत रखा था। इसके अलावा माता करवा की कथा भी प्रचलित है, जिन्होंने अपने तपोबल से अपने पति को यमराज के चंगुल से बचा लिया था।
व्रत की मुख्य रस्में और विधि: सरगी की परंपरा: व्रत की शुरुआत तड़के सुबह (सूर्योदय से पहले) होती है। इस समय सास अपनी बहू को 'सरगी' देती है, जिसमें मिठाई, फल, ड्राई फ्रूट्स और सुहाग की सामग्री होती है। महिलाएं इसे खाकर व्रत का संकल्प लेती हैं।निर्जला उपवास: सरगी खाने के बाद पूरे दिन महिलाएं बिना अन्न और जल ग्रहण किए (निर्जला) कठिन उपवास रखती हैं। शाम की पूजा: शाम के समय सभी सुहागिन महिलाएं एक साथ एकत्रित होकर सुंदर पारंपरिक वस्त्रों (जैसे लाल या सुनहरी साड़ी/लेहंगा) और सोलह श्रृंगार में सजती हैं। इसके बाद करवा चौथ की कथा सुनी जाती है और करवे फेरे (बदले) जाते हैं। चंद्र दर्शन और व्रत का पारण
छलनी से देखने की परंपरा: रात को चंद्रमा निकलने के बाद महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य (जल) देती हैं। इसके बाद छलनी के माध्यम से पहले दीपक की लौ में चंद्रमा को और फिर अपने पति के चेहरे को देखती हैं। पति के हाथों जल ग्रहण: चंद्रमा की पूजा पूरी होने के बाद पति अपनी पत्नी को पानी पिलाकर और मिठाई खिलाकर उनका उपवास पूरा करवाते हैं। इसके बाद बहू अपनी सास का आशीर्वाद लेकर उन्हें 'बाया' (उपहार और मिठाई) भेंट करती है।आधुनिक संदर्भ में बदलाव
आज के समय में करवा चौथ का स्वरूप और व्यापक हो गया है। अब यह त्योहार केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि आपसी प्रेम को दर्शाने का माध्यम बन गया है। आजकल कई पुरुष भी अपनी पत्नी के प्रति सम्मान और प्रेम जताने के लिए उनके साथ यह व्रत रखते हैं। इसके साथ ही, बाजारों में इस दौरान मेंहदी लगवाने, कपड़ों और ज्वेलरी की खरीदारी की भारी धूम रहती है।
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