- आज सर्व पितृ अमावस्या,पितरों के निमित्त पूजा-पाठ, दान-पुण्य और तर्पण
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पितरों के निमित्त पूजा-पाठ, दान-पुण्य और तर्पण करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। सर्वपितृ अमावस्या की एक पौराणिक कथा भी है, जिसका संबंध अग्निष्वात्त पितरों, उनकी मानस कन्या अक्षोदा और पितर अमावसु से जुड़ा है। आइए जानते हैं सर्वपितृ अमावस्या की पौराणिक कथा और इस दिन का धार्मिक महत्व।
सर्वपितृ अमावस्या 2026 शुभ मुहूर्त:
हिंदू पंचांग के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को मनाई जा रही है। अमावस्या तिथि की शुरुआत 9 अक्टूबर की रात 9 बजकर 35 मिनट पर हुई है और इसका समापन 10 अक्टूबर की रात 9 बजकर 19 मिनट पर होगा।
कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक
रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:31 बजे से दोपहर 1:18 बजे तक
अपराह्न काल: दोपहर 1:18 बजे से दोपहर 3:37 बजे तक
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप और रौहिण मुहूर्त के साथ अपराह्न काल को भी विशेष महत्व दिया जाता है।
सर्वपितृ अमावस्या की कथा: पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन के शुरू होने के पीछे पितरों की मानसी कन्या अच्छोदा की एक अनजानी भूल और उनकी ज़िद की बेहद रोचक कथा है। आइए जानते हैं मतस्य पुराण में वर्णित इस अनोखी पौराणिक कहानी को।
कौन थीं अच्छोदा? :पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पितृलोक में 'अग्निष्वात्त' नाम के पितर रहते हैं. अच्छोदा इन्हीं पितरों की मानसी कन्या (मन से उत्पन्न पुत्री) थीं। अच्छोदा बहुत रूपवान, तपस्वी और गुणी थीं, लेकिन उनके भीतर एक कमी थी कि उन्हें शारीरिक रूप से माता-पिता का सुख नहीं मिला था, क्योंकि वे केवल मन की कल्पना से उत्पन्न हुई थीं। इसी कारण उनके मन में हमेशा एक सच्चे परिवार और माता-पिता के प्रेम की तीव्र इच्छा रहती थी। पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में अग्निष्वात्त और बर्हिषपद नाम के पितृ देव थे। उनकी एक मानस कन्या थीं, जिनका नाम अक्षोदा था। अक्षोदा ने पितरों को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आश्विन मास की अमावस्या तिथि पर कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से जुड़ी यह कथा सर्वपितृ अमावस्या के धार्मिक महत्व को समझाती है।
अक्षोदा की तपस्या से प्रसन्न हुए पितर: कहा जाता है कि अक्षोदा ने लगातार एक हजार वर्षों तक तपस्या की। उनकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर सभी पितर गण उनके सामने प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। उस समय वहां पितर अमावसु भी मौजूद थे, जो अपने तेज और संयम के लिए जाने जाते थे. अक्षोदा का ध्यान पितर अमावसु की ओर आकर्षित हो गया और उन्होंने वरदान में उनका साथ मांग लिया। अक्षोदा की यह इच्छा सुनकर पितर गण नाराज हो गए. उन्हें लगा कि अक्षोदा ने अपनी तपस्या के उद्देश्य से भटककर अनुचित इच्छा व्यक्त की है।
पितरों ने अक्षोदा को दिया श्राप: अक्षोदा की इच्छा से क्रोधित होकर पितरों ने उन्हें श्राप दिया कि वह पितृ लोक से भ्रष्ट होकर पृथ्वी लोक पर जन्म लेंगी। अपने इस अपराध का अहसास होने पर अक्षोदा को पछतावा हुआ और उन्होंने पितरों से क्षमा मांगी। अक्षोदा की प्रार्थना सुनकर पितरों का हृदय पिघल गया।उन्होंने अपने श्राप को कुछ इस तरह बदला कि अक्षोदा पृथ्वी पर मत्स्य कन्या के रूप में जन्म लेंगी। आगे चलकर महर्षि पाराशर उनके पति बनेंगे और उनके गर्भ से भगवान वेद व्यास का जन्म होगा। इस तरह वह अपने श्राप से मुक्त होकर दोबारा पितृ लोक लौट सकेंगी।
पितर अमावसु के नाम पर पड़ा अमावस्या का नाम:
कथा के अनुसार, पितर अमावसु ने अक्षोदा के आकर्षण के बावजूद अपने मन पर संयम बनाए रखा। उनके धैर्य और ब्रह्मचर्य से प्रसन्न होकर पितरों ने उनकी प्रशंसा की। इसके बाद आश्विन मास की इस अमावस्या तिथि को पितर अमावसु के नाम से जोड़कर देखा जाने लगा। धार्मिक परंपरा में इसी कथा को सर्वपितृ अमावस्या के महत्व से जोड़कर बताया जाता है।
सर्वपितृ अमावस्या का क्या है महत्व?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या पितरों को याद करने और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष दिन है। अगर किसी व्यक्ति को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि याद नहीं है या वो पितृ पक्ष के दौरान किसी कारणवश श्राद्ध नहीं कर पाया है, तो इस दिन सभी पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कर सकता है।
मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से श्राद्ध कर्म करने से पितरों को तृप्ति मिलती है और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसके अलावा, जरूरतमंदों को भोजन कराना, ब्राह्मण भोज, वस्त्र दान और अन्य दान-पुण्य के कार्य करना भी शुभ माना जाता है। पितृ दोष से मुक्ति के उपायों में भी इस दिन किए जाने वाले तर्पण और दान-पुण्य को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक विश्वास है कि पितरों के प्रति श्रद्धा और उनके निमित्त किए गए शुभ कर्मों से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है और जीवन की परेशानियों से राहत मिलने की कामना की जाती है। ( पंडित अशोक झा की कलम से )
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