- घर घर में स्थापित की जाती है लख्खी की प्रतिमा
-व्यंजनों से महक उठता है पूरा वातावरण
अशोक झा/कोलकाता: विजया दशमी के छह दिनों बाद शरद पूर्णिमा की रात को हिंदू धर्म में बेहद खास माना जाता है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी चांदनी से अमृत की वर्षा होती है। यही वजह है कि शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की पूजा करने और रात में चांदनी के नीचे खीर रखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस दिन कई घरों में मां लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है। इस साल 25 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा का पावन पर्व है। शरद पूर्णिमा के दिन विशेष रूप से मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। वहीं बंगाली समुदाय के लोग आज का दिन कोजागरी लखी पूजा के नाम से मनाते हैं। बंगाल में लक्खी पूजा ( कोजागरी लक्ष्मी पूजा) एक अत्यंत महत्वपूर्ण और हर बंगाली घर में श्रद्धा से मनाया जाने वाला घरेलू त्योहार है। यह पूजा आश्विन मास की शरद पूर्णिमा (विजयादशमी के ठीक पांच दिन बाद) को मनाई जाती है। जहाँ पूरे भारत में दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा का विशेष विधान है, वहीं बंगाल में इस पूर्णिमा की रात को 'कोजागरी लोक्खी पूजो' के रूप में बेहद खास पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। 'कोजागरी' शब्द का अर्थ और महत्व
'कोजागरी' शब्द की उत्पत्ति बंगाली वाक्यांश "के जागो रे?" (अर्थात—कौन जाग रहा है?) से हुई है। बंगाली लोक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात को धन और समृद्धि की देवी माँ लक्खी (लक्ष्मी) पृथ्वी पर आती हैं और यह देखती हैं कि कौन जागकर उनकी भक्ति कर रहा है। जो लोग रात भर जागकर मां की आराधना करते हैं, देवी उन्हें सुख, शांति और अटूट धन-धान्य का आशीर्वाद देती हैं। बंगाल में लक्खी पूजा मुख्य रूप से घर की महिलाओं द्वारा संपन्न की जाती है, जो इस दिन निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं। अल्पना : पूजा के दिन पूरे घर की साफ-सफाई की जाती है। माँ लक्खी के स्वागत के लिए घर के मुख्य द्वार से लेकर पूजा स्थल तक चावल के पेस्ट से बेहद खूबसूरत 'अल्पना' (पारंपरिक रंगोली) बनाई जाती है। इस अल्पना में विशेष रूप से माँ लक्ष्मी के छोटे-छोटे पदचिह्न (पैरों के निशान) बनाए जाते हैं, जो घर के अंदर की ओर आते हुए दिखते हैं। पूजा सेटअप और घट स्थापना: पूजा स्थल पर माँ लक्खी की मिट्टी की मूर्ति या फिर 'लक्खी सरा' (मिट्टी की थाली जैसी गोल सतह पर बनी माँ की पेंटिंग) को स्थापित किया जाता है। इसके साथ ही पानी से भरा एक पारंपरिक 'घट' (कलश) और धान की बालियाँ रखी जाती हैं, जो अच्छी फसल और समृद्धि का प्रतीक हैं।रात्रि जागरण और पांचाली पाठ: पूजा मुख्य रूप से शाम और रात के समय होती है। पूजा के दौरान महिलाएँ 'लक्खीर पांचाली' व्रत कथा का पाठ करती हैं। शंख ध्वनि और ढाक की आवाज़ से पूरा घर भक्तिमय हो जाता है। विशेष भोग और पकवान :बंगाल में माँ लक्खी को चढ़ाए जाने वाले भोग की अपनी एक अनोखी परंपरा है, जिसमें मौसम की नई फसल और मिठाइयों का विशेष महत्व होता है।
भोग का प्रकार मुख्य व्यंजन और सामग्री नाडू और मोआ नारियल के लड्डू (नारकेल एर नाडू), तिल के लड्डू (तिल एर नाडू), और मुरमुरे व गुड़ से बने खोई एर मोआ।मुख्य अन्न भोगबिना प्याज-लहसुन की सात्विक खिचड़ी, लब्ड़ा (मिश्रित सब्जी), पाँच तरह के भज (तली हुई सब्जियां), और लूची-सूजी।फल और अन्यमौसमी फल, मखाना, बताशा, और चूड़ा को ठंडे दूध और नारियल के साथ अर्पित किया जाता है।
दिलचस्प तथ्य (घोटी बनाम बांगल परंपरा): विभाजन के बाद पश्चिम बंगाल में दो बंगाली समुदायों की अपनी-अपनी परंपराएं हैं। जहाँ 'घोटी' (मूल पश्चिम बंगाली निवासी) परिवारों में पूरी तरह से शाकाहारी भोग (जैसे खीर की मिठाई, पायेश) चढ़ाया जाता है, वहीं कई 'बांगल' (पूर्वी बंगाल/बांग्लादेश से आए) परिवारों में माँ लक्खी को इल्विश (इलीश) मछली का भोग लगाने की भी अनोखी परंपरा है।
कृषि संस्कृति से जुड़ाव: ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से, बंगाल की लक्खी पूजा यहाँ की समृद्ध कृषि प्रधान संस्कृति को दर्शाती है। शरद ऋतु का यह समय धान की कटाई की शुरुआत का होता है। इसीलिए माँ के हाथों में धान का पौधा होता है और पूजा में अन्न के बर्तनों (कौड़ी, धान) को रखकर प्रार्थना की जाती है कि पूरे साल घर में अन्न के भंडार भरे रहें। यह त्योहार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि बंगाली समाज में पारिवारिक एकजुटता, आपसी प्रेम और घर की समृद्धि का एक जीवंत उत्सव है। यदि आप बंगाली घरों में होने वाली पारंपरिक लक्खी पूजा की विधि को ज्यादा जानना चाहते है तो जाने शरद पूर्णिमा के दिन बंगाली समाज के लोग मंडप में मां की प्रतिमा स्थापित करते हैं और घर में विशेष पूजा की जाती है। कहा जाता है कि आज की रात मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक पर विचरण करती हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाओं को पूरा करती हैं। इस दिन पूजा करने से मां लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती। ऐसे में चलिए जानते हैं लखी पूजा के बारे में खास और जरूरी बातें..पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। इस तिथि को देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इसे कौमुदी उत्सव, कुमार उत्सव, शरदोत्सव, रास पूर्णिमा, कोजागरी पूर्णिमा और कमला पूर्णिमा भी कहते हैं। बंगाली समुदाय के लोग मनाते हैं लखी पूजा: शरद पूर्णिमा के दिन बंगाली समाज के लोग विधि-विधान से मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं, जिसे लखी पूजा भी कहा जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी के साथ-साथ नारायण की भी पूजा की जाती है। बंगाली समुदाय के लोग लखी पूजा को पूरे उत्साह के साथ मनाते हैं। घरों में पकवान बनाए जाते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा की जाती है। क्या है मान्यता?मान्यता है कि इस रात चंद्रमा कि किरणों से अमृत बरसता है, इसलिए खीर बनाते हैं और शाम को छत पर या खुले में खीर रखकर अगले दिन सुबह उसका सेवन करते हैं। कहा जाता है कि रातभर इसे चांदनी में रखने से इसकी तासीर बदलती है और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।
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