- यह यात्रा गोल पार्क से शुरू होकर धाकुरिया होते हुए जादवपुर विश्वविद्यालय के पास 8बी बस स्टैंड पहुंचकर होगी खत्म
- कार्यक्रम का उद्देश्य राष्ट्रवादी विचारों को बढ़ावा देना और विश्वविद्यालय परिसर की प्रशासनिक निगरानी बढ़ाना
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी आज 'गेरुआ सम्मान यात्रा' निकालने वाले हैं। उनकी इस यात्रा के पीछे की राजनीति और सोच के बारे में हम बता रहे असली कारण। उनकी यह यात्रा गोलपार्क से शुरू होकर जादवपुर विश्वविद्यालय तक जाएगी। मुख्यमंत्री की इस यात्रा के साथ जादवपुर विश्वविद्यालय एक बार फिर राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बनने जा रहा है. इससे पहले राखी पूर्णिमा के अवसर पर विश्वविद्यालय में 'वंदे मातरम्' कार्यक्रम आयोजित किया गया था.
कहां से कहां तक होगी 'गेरुआ सम्मान यात्रा'
यह यात्रा गोल पार्क से शुरू होकर धाकुरिया होते हुए जादवपुर विश्वविद्यालय के पास 8बी बस स्टैंड पहुंचकर खत्म होगी. बीजेपी के मुताबिक इस कार्यक्रम का उद्देश्य राष्ट्रवादी विचारों को बढ़ावा देना और विश्वविद्यालय परिसर की प्रशासनिक निगरानी बढ़ाने की जरूरत पर जोर देना है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि शुभेंदु अधिकारी लगातार इस तरह की राजनीति क्यों कर रहे हैं। आयोजकों के मुताबिक, यात्रा का मकसद केसरिया रंग केसरिया गुंडागर्दी' जैसे विवादों के बाद और महत्वपूर्ण हो गया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने हाल ही में वंदे मातरम् कार्यक्रम में वामपंथ और तृणमूल कांग्रेस पर राष्ट्रवाद को कमजोर करने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि विश्वविद्यालय में लंबे समय से साम्यवादी प्रभाव के कारण छात्रों का स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और भारतीय-बंगाली सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ाव कमजोर हुआ है। उनकी 'गेरुआ सम्मान यात्रा' के पीछे की रणनीति क्या है?
राखी पूर्णिमा के दिन जादवपुर विश्वविद्यालय से जादवपुर पुलिस स्टेशन तक सड़क के दोनों तरफ हजारों लोग एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे. इस कार्यक्रम का नाम था 'वंदे मातरम् इन टेन थाउजेंड वॉयसेज'। शुभेंदु अधिकारी भी इसमें शामिल हुए थे। इसके बाद विवाद खड़ा हो गया था
जादवपुर विश्वविद्यालय के अंदर माओवादी विचारधारा के समर्थन वाले कुछ पोस्टर मिलने के बाद 'माओवादी' या 'दिमागी नक्सल' का मुद्दा भी सामने आया। बीजेपी ने इसे प्रमुखता से उठाया। लेकिन सवाल फिर वही है कि शुभेंदु अधिकारी लगातार इसी मुद्दे को क्यों आगे बढ़ा रहे हैं?
आखिर इस कदम के पीछे की राजनीति क्या है : राजनीतिक तौर पर देखें तो शुभेंदु अधिकारी जो कुछ कर रहे हैं, वह पूरी तरह सोच-समझकर कर रहे हैं । यह कोई अचानक उठाया गया कदम या अनुभवहीन राजनीति नहीं है। इसके पीछे एक स्पष्ट विचारधारा और उसकी रणनीति है। मूल रूप से यह राष्ट्रवादी और सनातनी बीजेपी नैरेटिव है।
इसके पीछे आरएसएस के भीतर भी एक वैचारिक सोच है।आरएसएस के कई नेता मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक उनकी विचारधारा को पर्याप्त जगह नहीं मिली। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य भी इसी तरह की बात करते रहे हैं। आरएसएस से जुड़े नेताओं का तर्क है कि 30 साल से अधिक समय तक चले वामपंथी शासन के दौरान भारत की पुरानी, सनातनी और पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत की अनदेखी हुई। इसके बाद करीब 15 साल के टीएमसी शासन में भी पार्टी के भीतर एक तरह की अत्यधिक सांस्कृतिक वामपंथी सोच मजबूत हुई। आरएसएस के कुछ नेता इसे 'कल्चरल मार्क्सिज्म' यानी 'सांस्कृतिक मार्क्सवाद' कहते हैं। उनका मानना है कि यह सोच टीएमसी में गहराई तक चली गई और पार्टी के कई नेताओं ने इसे आगे बढ़ाया। बंगाल की संस्कृति में राष्ट्रवाद : आरएसएस की इस सोच के अनुसार, बंगाल की संस्कृति का राष्ट्रवादी पक्ष कमजोर हुआ है। शुभेंदु अधिकारी अब इसी राष्ट्रवादी चरित्र को फिर से उभारने की कोशिश कर रहे हैं। हो सकता है कि इस कोशिश में कभी-कभी जरूरत से ज्यादा जोर दिया जा रहा हो, लेकिन मूल विचार यह है कि बंगाल का बहुलतावादी और विविधतापूर्ण चरित्र बना रहे, लेकिन साथ ही भारतीय हिंदू राष्ट्रवाद और सनातन परंपरा का भी सम्मान हो यानी की हिंदुत्व को राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस के केंद्र में लाया जाए।
हिंदुत्व को राजनीतिक और सांस्कृतिक आरएसएस की प्रमुख विचारधारात्मक सोच में से एक है। शुभेंदु अधिकारी बंगाल में इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए दिखाई दे रहे हैं.वो यह संदेश देना चाहते हैं कि यह विचार किसी के खिलाफ नहीं है। उनका कहना है कि किसी समुदाय या व्यक्ति के खिलाफ बोलना उद्देश्य नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य लोगों में राष्ट्रवादी भावना को मजबूत करना है।जादवपुर विश्वविद्यालय को ही क्यों चुना है :
शुभेंदु अधिकारी का कहना है कि कम्युनिस्ट शासन के दौरान जादवपुर विश्वविद्यालय में रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय और ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे बंगाल के महान लोगों के चित्रों को वह स्थान नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था। इनकी जगह चे ग्वेरा और माओत्से तुंग जैसे कम्युनिस्ट नेताओं को प्रमुखता मिली। इसलिए उनका तर्क है कि विश्वविद्यालय और बंगाल के सार्वजनिक जीवन में इस तरह के सांस्कृतिक नैरेटिव को बदले जाने की जरूरत है।
रानाघाट के एक छात्र के साथ हुई कार्रवाई (माथे से तिलक हटाने) जैसी स्थिति का सामना आम छात्रों को भी करना पड़ सकता है, इस तरह के संदेशों से भी एक खास राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है. इन तमाम मुद्दों के बीच धीरे-धीरे एक हिंदू नैरेटिव मजबूत होता दिखाई दे रहा है।
बंगाल का बहुलतावाद :बीजेपी का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि इस तरह की राजनीति से बंगाल की विविधता, बहुलतावाद और सभी धर्मों को साथ लेकर चलने वाली संस्कृति को नुकसान पहुंच सकता है। इस बहस में बंगाल के खान-पान का मुद्दा भी शामिल हो गया है। कुछ दिन पहले बागेश्वर महाराज ने कहा था कि बंगाली दुर्गा पूजा के पंडालों के पीछे मांस और मछली खाते हैं, यह धार्मिक नजरिए से सही नहीं है।इसके बाद बंगाल के खान-पान और धार्मिक पहचान को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई। हालांकि, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने लंदन में कहा था कि खान-पान को लेकर किसी तरह की नकारात्मक सोच नहीं होनी चाहिए। उनका संदेश था,'मैं नहीं, हम'। यहीं से एक तरह का भ्रम भी पैदा होता है।
क्या बंगाल की पहचान बदल रही है: बंगाल की विविधतापूर्ण संस्कृति पर लंबे समय से चर्चा होती रही है. क्षितिमोहन सेन से लेकर अमर्त्य सेन तक कई विद्वानों ने बंगाल की इस विविध संस्कृति को समझाया है. रवींद्रनाथ टैगोर को भी इस सांस्कृतिक समझ के केंद्र में रखा गया है।
अब सवाल यह है कि क्या बंगाल की यह संस्कृति बदल रही है? क्या हिंदुत्व के इस नए नैरेटिव के भीतर बहुसंख्यकवाद की जगह बन रही है? अगर ऐसा है तो क्या बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और उसका मूल चरित्र बदल रहा है?
असल में इस पूरी बहस में दो बिल्कुल अलग ध्रुव दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ बेहद सनातनी और हिंदू समर्थक विचारधारा है।और दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं जो धर्म से दूरी रखते हैं और ज्यादा वामपंथी या अति-वामपंथी विचार रखते हैं। बीजेपी ऐसे लोगों के लिए 'दिमागी नक्सल' शब्द का इस्तेमाल करती है। प्रधानमंत्री भी इस शब्द का इस्तेमाल कर चुके हैं।
इस पूरी बहस में एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि हिंदू परंपरा और उसकी भावनाओं का अपमान नहीं होना चाहिए। इसका मतलब यह भी है कि किसी व्यक्ति को यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि वह नास्तिक नहीं है, बल्कि आस्तिक है। अगर कोई व्यक्ति पूजा करता है तो इसमें कुछ गलत नहीं है।
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