- टोके गेको की तस्करी ज्यादातर कि जाती है चीन और मलेशिया जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में
- एक की कीमत एक करोड़ रुपए से अधिक, मर्दानी ताकत की दवा बनाने में आता है काम
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: 86 टोके गेको (छिपकली की एक खास प्रजाति) को जब्त किया है। इस छिपकली का इस्तेमाल मर्दानगी बढ़ाने वाली दवाओं में किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तस्कर इन्हें करोड़ो रुपए में बेचते है। वन्यजीवों के अवैध व्यापार के सौदे के बारे में मिली खास जानकारी के आधार पर, DRI ने असम के मारियानी में बड़ी कार्रवाई की। बंदर चालिया गांव ग्राउंड पर दो लोगों को रोका। उनकी तलाशी ली गई तो टीम के होश उड़ गए। तस्करों के पास से 86 जिंदा टोके गेको मिली।पिछले कुछ सालों में टोके की कीमत काफी बढ़ गई है। टोके गेको की तस्करी ज्यादातर चीन और मलेशिया जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में की जाती है। पश्चिम बंगाल में कोलकाता और सिलीगुड़ी ऐसे कुछ मुख्य केंद्र हैं जहां इस अवैध व्यापार के कुछ बड़े सरगना मौजूद हैं। टोके गेको एक छिपकली होती है। यह भारत के पूर्वोत्तर इलाकों में पाई जाती है। कई लुप्तप्राय जंगली जीवों की तस्करी की तरह ही टेको गेको की भी तस्करी होती है। चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के अवैध बाजारों में इसकी कीमत बहुत ज्यादा होती है।इस ऑपरेशन के दौरान डीआरआई ने तस्करों के पास से 86 जिंदा टोके गेको (एक लुप्तप्राय वन्यजीव प्रजाति) बरामद किए गए और उन्हें वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के तहत ज़ब्त कर लिया गया।
वन विभाग को सौंपे गए आरोपी और छिपकलियां: टोके गेको को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I और CITES के परिशिष्ट-II में शामिल किया गया है, जो इसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करता है। पकड़े गए दोनों व्यक्तियों को, बरामद जिंदा टोके गेको के साथ असम के मारियानी रेंज वन कार्यालय को सौंप दिया गया। उनके खिलाफ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के संबंधित प्रावधानों के तहत आगे की कार्रवाई की जा सके।
लुप्तप्राय श्रेणी में आती है टोके गेका: टोके गेको के निर्यात पर रोक है क्योंकि इसे 'वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972' के तहत गंभीर रूप से लुप्तप्राय श्रेणी में रखा गया है। 2018 में, असम सरकार ने भी इस प्रजाति और 'असमिया डे गेको' को खतरे में पड़ी प्रजातियों की नई सूची में शामिल किया था।
बंगाल और नॉर्थ ईस्ट इलाके में मिलती है टोके गेको
टोके गेको भारत में पाई जाने वाली गेको की सबसे बड़ी प्रजातियों में से एक है और दुनिया भर में दूसरी सबसे बड़ी प्रजाति है। अनुमान है कि दुनिया भर में छिपकलियों की लगभग 6,000 प्रजातियां हैं, जिनमें से 231 भारत में पाई जाती हैं। भारत में, यह केवल पूर्वोत्तर राज्यों और पश्चिम बंगाल में पाई जाती है। यह आमतौर पर शहरी और ग्रामीण इलाकों, प्राकृतिक आवासों और जंगलों, और घने पेड़ों पर देखी जाती है।
कैसी होती है टोके गेको: टोके गेको की त्वचा नीले-भूरे रंग की होती है जिस पर हल्के पीले से लेकर गहरे लाल रंग तक के धब्बे होते हैं। इनकी लंबाई 11 से 19 इंच के बीच और वजन लगभग 150-400 ग्राम होता है। पारंपरिक एशियाई दवाओं में इस्तेमाल के कारण इनकी बहुत ज्यादा मांग है।
टोके गेको का यूज: टोके गेको के अंदरूनी अंगों, मांस और जीभ का इस्तेमाल अस्थमा, कैंसर, मधुमेह (डायबिटीज), नपुंसकता और त्वचा रोगों सहित कई बीमारियों के इलाज में किया जाता है। कुछ रिपोर्टों से पता चलता है कि टोके गेको से निकाले जाने वाले खून जैसे दिखने वाले तरल पदार्थ की चीन में कैंसर के इलाज के लिए बहुत ज्यादा मांग है।
ब्लैक मार्केट में टोके गेको की कीमत: तस्कर और जंगली जानवरों का गैर-कानूनी व्यापार करने वाले लोग, टोके गेको के आकार, वजन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी मांग के अनुसार कीमत देते हैं। माना जाता है कि ग्रे-मार्केट में टोके गेको की कीमत 20,000 से शुरू होती है। कहा जाता है कि इसकी कीमत एक करोड़ प्रति टोके गेको तक होती है।
2009 के बाद से टोके गेको की तस्करी हुई तेज:
वाइल्डलाइफ ट्रेड मॉनिटरिंग नेटवर्क 'ट्रैफिक' के अनुसार, 2009 में टोके गेको के अवैध शिकार और व्यापार में तेजी आई। ऐसा तब हुआ जब इस सरीसृप (रेंगने वाले जीव) की जीभ और अंदरूनी अंगों को HIV और कैंसर के इलाज के लिए एक संभावित (लेकिन बिना साबित हुए) उपाय के तौर पर देखा जाने लगा।
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