- अनंत चतुर्दशी-व्रत के प्रभाव से पांडव सब संकटों से हो गए थे मुक्त
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: हिंदू धर्म में अनंत चतुर्दशी का पर्व बेहद खास होता है. भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा की जाती है। इस वजह से इस तिथि का अनंत चतुर्दशी के नाम से जानते हैं। 10 दिनों के गणेश उत्सव का समापन भी अनंत चतुर्दशी पर होता है। अनंत चतुर्दशी का व्रत करने से अनंत सुख की प्राप्ति होती है और पापों के नाश होता है।
अनंत चतुर्दशी 2026 की सही तिथि और समय
अनंत चतुर्दशी तिथि: 25 सितंबर 2026, शुक्रवार
पूजा का शुभ मुहूर्त: सुबह 06:11 बजे से रात 11:06 बजे तक
पूजा की कुल अवधि: 16 घंटे 55 मिनट
चतुर्दशी तिथि प्रारंभ: 24 सितंबर 2026 को रात 11:18 बजे
चतुर्दशी तिथि समाप्त: 25 सितंबर 2026 को रात 11:06 बजे। अनंत चतुर्दशी पर भगवान अनंत की पूजा के बाद 14 गांठों वाला अनंत सूत्र बांधते हैं। अनंत भगवान विष्णु ने आदि में चौदह लोकों की रचना की- 'तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पाताल, भू, भुवः, स्वः, जन, तप, सत्य, मह'। ये सभी लोक 14 वेलों के रूप में प्रकट होते हैं, जहाँ ये अनंत प्रतीत होते हैं। इसलिए अनंत पूजा के दिन एक बर्तन में दूध, शहद, दही, घी और गंगाजल मिलाकर क्षीर सागर बनाना चाहिए। फिर कच्ची भांग को चौदह गीठों वाला अनंत सूत्र भगवान अनंतके रूप में क्षीर सागर में विसर्जित कर देना चाहिए। पूजा के बाद इसे अनंत भगवान का रूप माना जाता है और पुरुष इसे अपने दाहिने हाथ में और महिला इसे अपने बाएं हाथ में धारण करती है। इसी परंपरा से अनंत चतुर्दशी के व्रत को भी जोड़ा जाता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु अनंत रूप में प्रकट हुए और भक्तों की रक्षा की. इसी कारण सदियों से इस दिन अनंत चतुर्दशी का व्रत और पूजा करने की परंपरा चली आ रही है.
अनंत चतुर्दशी की पूजा में विशेष डोरी को 'अनंत' कहा जाता है, जिसमें 14 गांठें लगाई जाती हैं. इन गांठों को भगवान विष्णु के 14 रूपों का प्रतीक माना जाता है. पूजा के दौरान भगवान विष्णु के नामों का उच्चारण करते हुए अनंत को बांह पर धारण किया जाता है. पुरुष दाहिने बांह में जबकि महिलाएं बाईं बांह पर अनंत बांधती हैं. 14 गांठों वाला यह सूत्र रक्षा कवच की तरह काम करता है और संकटों से रक्षा करता है. इन 14 नामों का संबंध 14 लोकों से भी माना गया है. भगवान विष्णु के बताए गए 14 नाम हैं. अनंत, ऋषिकेश, पद्मनाभ, माधव, वैकुंठ, श्रीधर, मधुसूदन, वामन, त्रिविक्रम, केशव, नारायण, दामोदर, गोविंद और ऋषिकेश। ऐसी मान्यता है कि पूजा से युधिष्ठिर का सिंहासन पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता। चौदह गीठों में से प्रत्येक भगवान विष्णु द्वारा निर्मित एक लोक का प्रतीक है। इनमें से हर गीत में भगवान के चौदह रूपक निवास चौदह लोगों में माने गए हैं। शास्त्रों के अनुसार, उपनयन संस्कार के बाद 14 गीत, अनंत कोनो पुरुषके करबक धारण करना चाहिए। स्त्री की शादी के बाद 14 गाँठ वाला अनंत धारण करने को कहा जाता है।
अनंत बंधबक मंत्र :-अनंतसागरमहासमुद्रे मगनं संभ्युधर वासुदेवा।अनंतरूपा विनयाज्ञातमा ह्यंतरूपाय नमो नमस्ते ॥
ऊपर दिया गया मंत्र पढ़ें मंत्र अपना दाहिना आ स्त्री अपना बाम हाथ में धारण करती है।
अनंत चतुर्दशी का महत्व:
कहा जाता है, जब पांडव द्यूत क्रीड़ा में अपना सारा राज-पाट हारकर वन में कष्ट भोग रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी का व्रत करने की सलाह दी थी। धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों तथा द्रौपदी के साथ पूरे विधि-विधान से यह व्रत किया तथा अनंत सूत्र धारण किया। अनंत चतुर्दशी-व्रत के प्रभाव से पांडव सब संकटों से मुक्त हो गए थे।
गणेश उत्सव का समापन:अनंत चतुर्दशी पर गणेश चतुर्थी से शुरू होने वाले 10 दिवसीय गणेश उत्सव का समापन भी होता है। घरों और पंडालों में स्थापित गणपति प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है।
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