- राज्य सरकार ने 5 करोड़ का अनुदान देकर सुरक्षा में लगाए है 4000 अतिरिक्त सुरक्षाकर्मी
- भक्तों की सुव्यवस्था राज्य सरकार की पहली चुनौती, अतिरिक्त ट्रेनों के परिचालन
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: भाद्रपद महीने की अमावस्या यूं तो स्नान, दान और पितरों की पूजा के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इस रात का एक अलग ही रूप दिखाई देता है।तारापीठ में इसे कौशिकी अमावस्या या 'तारा रात्रि' कहा जाता है। मंदिर में मां तारा के दर्शन के लिए भक्तों की लंबी कतार लगती है। वहीं साधक पूरी रात मंत्र जप, ध्यान और विशेष साधना करते हैं।
सुरक्षा व्यवस्था के तहत 4,000 पुलिसकर्मी, 27 सहायता बूथ, 400 सीसीटीवी कैमरे, 11 वाच टावर, ड्रोन निगरानी और फेस रिकग्निशन सिस्टम लगाए गए हैं। रेलवे ने हावड़ा-रामपुरहाट विशेष ट्रेन चलाने की भी व्यवस्था की है, जबकि कई ट्रेनों में अतिरिक्त कोच जोड़े गए हैं। इस साल 2026 में कौशिकी अमावस्या की तारीख को लेकर थोड़ा भ्रम हो रहा है। दरअसल, अमावस्या तिथि 10 सितंबर 2026 की सुबह शुरू होकर 11 सितंबर 2026 की सुबह समाप्त होगी। हालांकि, मां तारा की विशेष पूजा और रात्रि साधना 10 सितंबर की रात की जाएगी। कौशिकी अमावस्या 2026 कब है: अमावस की रात्रि के आधार पर देखें तो कौशिकी अमावस्या 10 सितंबर 2026, गुरुवार को मनाई जाएगी। इस दिन अमावस्या तिथि सुबह 10 बजकर 33 मिनट पर शुरू हो जाएगी। तिथि का समापन अगले दिन यानी 11 सितंबर को सुबह 8 बजकर 56 मिनट पर होगा।तिथि 11 सितंबर की सुबह तक रहने के कारण कुछ लोग इसे 11 सितंबर की अमावस्या मान सकते हैं। लेकिन कौशिकी अमावस्या का विशेष महत्व इसकी रात से जुड़ा है। इसलिए मां तारा और मां काली की रात्रि पूजा 10 सितंबर 2026 को की जाएगी।स्नान, दान अथवा पारिवारिक पूजा करने वाले लोग अपने शहर के सूर्योदय और स्थानीय परंपरा के अनुसार निर्णय ले सकते हैं। तारापीठ जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए 10 सितंबर की रात सबसे महत्वपूर्ण रहेगी।
मां तारापीठ कहा और क्या है विशेषता: तारापीठ मंदिर पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू तीर्थ स्थल है। यह मंदिर माँ तारा को समर्पित है, जिन्हें देवी दुर्गा का एक उग्र रूप माना जाता है। तारापीठ तंत्र साधना के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र है और दूर-दूर से साधक यहाँ सिद्धि प्राप्त करने आते हैं। मंदिर अपनी तांत्रिक परंपराओं और श्मशान घाट के निकट होने के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जहाँ भक्त मुक्ति और शक्ति की तलाश में आते हैं। इस मंदिर में दर्शन करने से भक्तों को आध्यात्मिक शांति और मनोकामना पूर्ति का अनुभव होता है। हर साल लाखों श्रद्धालु माँ तारा के दर्शन के लिए तारापीठ आते हैं, खासकर अमावस्या और पूर्णिमा के दिनों में यहाँ भारी भीड़ होती है। भक्तों का मानना है कि माँ तारा उनकी सभी बाधाओं को दूर करती हैं और उन्हें सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं। यहाँ आने वाले श्रद्धालु एक विशेष प्रकार की दैवीय ऊर्जा का अनुभव करते हैं, जो उन्हें अपनी आंतरिक शक्ति से जोड़ती है।
तारापीठ मंदिर की अनूठी विशेषता यह है कि यहाँ माँ तारा की मूर्ति एक शिशु को स्तनपान कराते हुए दर्शाई गई है, जो मातृत्व और पोषण का प्रतीक है। यह मूर्ति अन्य मंदिरों में पाई जाने वाली मूर्तियों से अलग है और इसे अत्यधिक शक्तिशाली माना जाता है। इसके अतिरिक्त, मंदिर के पास स्थित श्मशान घाट, जहाँ वामाखेपा जैसे महान तांत्रिकों ने साधना की थी, इसे एक विशेष आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है। यह श्मशान घाट मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र का प्रतीक है, जो भक्तों को जीवन की नश्वरता का बोध कराता है।इतिहास और पौराणिक कथा:
तारापीठ मंदिर का उल्लेख कई प्राचीन तांत्रिक ग्रंथों में मिलता है, जिनमें 'तंत्र चूड़ामणि' प्रमुख है। माना जाता है कि यह मंदिर सदियों पुराना है, और इसकी स्थापना काल के बारे में निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है। प्राचीन काल में यहाँ ऋषि वशिष्ठ ने माँ तारा की आराधना की थी और उन्हें यहाँ सिद्धि प्राप्त हुई थी। यह स्थान प्राचीन काल से ही तांत्रिकों और साधकों के लिए एक महत्वपूर्ण साधना केंद्र रहा है।।पौराणिक कथा के अनुसार, दक्ष यज्ञ के बाद जब भगवान शिव सती के जले हुए शरीर को लेकर घूम रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया था। तारापीठ वह स्थान है जहाँ सती की तीसरी नेत्र (तारा) गिरी थी, इसलिए इस स्थान का नाम तारापीठ पड़ा। इस घटना के बाद से यह स्थान एक पवित्र शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हो गया। यह कथा शक्ति और भक्ति के संगम को दर्शाती है। मध्यकाल में यह मंदिर कई बार आक्रमणों से प्रभावित हुआ, लेकिन स्थानीय शासकों और भक्तों ने इसे पुनर्निर्मित कराया। वर्तमान स्वरूप 19वीं शताब्दी में बना, जब एक धनी जमींदार, जगन्नाथ राय ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। इस पुनर्निर्माण के बाद मंदिर को एक नया रूप मिला और यह भक्तों के लिए और भी आकर्षक बन गया। आधुनिक समय में भी मंदिर का प्रबंधन भक्तों और ट्रस्टों द्वारा किया जाता है।
कौशिकी अमावस्या को क्यों कहते हैं तारा रात्रि:
कौशिकी अमावस्या का नाम आते ही तारापीठ का ध्यान आता है। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित यह शक्तिपीठ मां तारा की साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि अमावस्या की इस रात मां तारा की उपासना करने से भक्तों को भय, संकट और नकारात्मकता से लड़ने की शक्ति मिलती है।
तारापीठ में कौशिकी अमावस्या का महत्व: कौशिकी अमावस्या के अवसर पर तारापीठ मंदिर में विशेष पूजा और आरती होती है। दूर-दूर से श्रद्धालु मां तारा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर के आसपास पूरी रात धार्मिक गतिविधियां चलती रहती हैं।मां तारा अथवा मां काली की पूजा
दीपक जलाकर मंत्र जप,जरूरतमंदों को भोजन और वस्त्र दान
पितरों के लिए तर्पण, ध्यान और आध्यात्मिक साधना
नकारात्मक आदतों को छोड़ने का संकल्प। ध्यान रहे कि तंत्र साधना जैसी विशेष क्रियाएं बिना योग्य गुरु के मार्गदर्शन के नहीं करनी चाहिए। घर पर श्रद्धालु सामान्य पूजा, दीपदान और मंत्र जप कर सकते हैं। कौशिकी अमावस्या के दूसरे नाम
कौशिकी अमावस्या भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अमावस्या है। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इसे कई नामों से जाना जाता है।भाद्रपद अमावस्या, पिठोरी अमावस्या, कुशग्रहणी अमावस्या, कुशोत्पाटिनी अमावस्या, आलोक अमावस्या, तारा रात्रि। हालांकि, सभी नामों की पूजा परंपरा एक जैसी नहीं होती। तारापीठ की कौशिकी अमावस्या मुख्य रूप से मां तारा की रात्रि उपासना से जुड़ी है। वहीं पिठोरी अमावस्या में संतान की सुख-समृद्धि और कुशग्रहणी अमावस्या पर धार्मिक कार्यों के लिए कुश एकत्र करने की परंपरा मिलती है।
कौशिकी अमावस्या पर घर में कैसे करें पूजा: शाम को स्नान करके पूजा स्थान साफ करें। मां तारा या मां काली के चित्र के सामने दीपक जलाएं। लाल फूल, फल और मिठाई अर्पित करें। इसके बाद अपनी परंपरा के अनुसार मां का मंत्र जप या नाम स्मरण करें। पूजा में दिखावे से अधिक मन की स्थिरता जरूरी मानी जाती है। अंत में परिवार की सुख-शांति और संकटों से रक्षा की प्रार्थना करें।
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