- शिवभक्तों पूछ रहे कौन है इसके पीछे, सावन में शिवभक्तों मे दिख रही नाराजगी
- हरगौरी मंदिर ऐतिहासिक और पौराणिक धरोहरों में एक
- विधायक गोपाल अग्रवाल ने चुनाव पूर्व किया था प्रयास, बन चुके है अब विधायक से उठाए इसकी मांग
अशोक झा, पटना: सावन माह में ठाकुरगंज हर गौरी धाम में भक्तों का तांता लगता है। क्योंकि इसे बिहार का देवघर कहा जाता है। सावन के दूसरे सोमवार को ठाकुरगंज हर गौरी धाम में बाबा मंदिर को भव्य और दिव्य तरीके से सजाया जा रहा है। सोमवार को दीदी मां साध्वी ऋतम्भरा भी जलाभिषेक के लिए पहुंच रही है। इतना ही नहीं यहां देश विदेश से शिवभक्त यह जलाभिषेक के लिए पहुंच रहे है। ठाकुरगंज से 14 किलोमीटर दूर मेची नदी ओर 7 किलोमीटर दूर महानंदा नदी से शिव भक्त काँवर लेकर आते है। शिव भक्तों को सावन में बाबा की भक्ति के साथ बिहार सरकार से पीड़ा भी है। वह पीड़ा है ठाकुरगंज हर गौरी धाम को शिव सर्किट में शामिल नहीं किया जाना।सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इसके पीछे कौन? क्या विधायक गोपाल अग्रवाल की पहल से उनके विरोधी नहीं चाहते कि यह शव सर्किट में शामिल हो या कुछ और है कारण? इसे सरकार और पर्यटन मंत्रालय को स्पष्ट करना चाहिए।
बिहार सरकार के पर्यटन विभाग ने सूबे में शिव सर्किट बनाने पर काम कर रही है। इसमें चिकननेक के किशनगंज जिले का ठाकुरगंज हर गौरी धाम का नाम शामिल नहीं है। जबकि इस मंदिर को बिहार का देवघर कहा जाता है। यहां का शिवलिंग महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। राज्य के मंत्री से संत्री तक यहां पूजा अर्चना कर चुके है। इस मंदिर और मूर्ति की विशेषताएं फिल्मी हस्तियों के भी ध्यान में है। पर्यटन विभाग की ओर से राज्य में "विकास भी, विरासत भी" की संकल्पना के तहत भगवान शिव से संबंधित सभी प्रमुख स्थलों को चरणबद्ध तरीके से विकसित करने पर विचार किया जा रहा है। इस योजना के तहत ऐतिहासिक और पौराणिक धरोहरों के संरक्षण और उनके विकास के लिए कार्ययोजना तैयार की जा रही है, जिससे इन स्थानों को पर्यटन की दृष्टि से और अधिक आकर्षक बनाया जा सके। इस बात को राज्य सरकार के राजस्व मंत्री दिलीप जायसवाल भी जानते है। बिहार के 12 जिलों में इन शिव मंदिर का हो रहा है विकास :वैशाली - हरिहरनाथ मंदिर, दरभंगा - कुशेश्वरनाथ शिव मंदिर, मधेपुरा - सिंघेश्वर महादेव मंदिर, कटिहार - गोरखनाथ शिव मंदिर, गया - कोचेश्वर शिव मंदिर (कोंच), पटना - खुसरूपुर में बैकटपुर धाम, पूर्वी चम्पारण - सोमेश्वरनाथ महादेव मंदिर, सीवान - सिसवन स्थित महेन्द्रनाथ शिव मंदिर, अररिया - कुर्साकांटा स्थित सुन्दरनाथ महादेव मंदिर, मुजफ्फरपुर - औराई प्रखंड स्थित भैरव स्थान शिव मंदिर, भागलपुर - सुल्तानगंज स्थित अजगैबीनाथ मंदिर और कहलगांव स्थित बाबा बटेश्वरनाथ मंदिर, मधुबनी - राजनगर प्रखंड में एकादश रुद्र मंदिर, रहिका प्रखंड में कपिलेश्वर स्थान शिव मंदिर और बाबूबरही प्रखंड में मदनेश्वर स्थान शिव मंदिर को चयनित किया है।
क्या है हरगौरी धाम और मंदिर का इतिहास : सिलीगुड़ी से मात्र 58 किलोमीटर दूर किशनगंज जिले के ठाकुरगंज में हरगौरी धाम का इतिहास बेहद रोचक है, जहां आस पास पांडवों के कई स्थल आज भी मौजूद हैं। यहीं 125 वर्ष पूर्व रविन्द्र नाथ ठाकुर के वंशजों ने हरगौरी मंदिर की स्थापना की थी। यह बिहार के अलावा बंगाल, असम, नेपाल और भूटान के श्रद्धालुओं के आस्था का केन्द्र है। सालाें भर इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ होती है पर सावन में इसकी छटा कुछ अलग ही निराली होती है। मंदिर के पुरोहित जयंत गांगुली के अनुसार ठाकुरगंज का पुराना नाम कनकपुर था, जिसे रविंद्र नाथ टैगोर के वंशज ज्योनिन्द्र मोहन ठाकुर ने खरीदी थी। उसके बाद इसका नाम ठाकुरगंज रखा गया। कहते है कि इतिहास है कि 1897 में उनके परिवार द्वारा पूर्वोत्तर कोण में पाण्डव काल के भग्नावशेष की खुदाई क्रम में कई शिवलिंग मिले। इसमें एक जाे एक फुट काले पत्थर का था। शिवलिंग पर आधे हिस्से में भगवान शिव और आधे हिस्से में मां पार्वती अंकित है। इन मूर्तियों को कोलकोता लेकर टैगोर पैलेश में रखा गया। इसी बीच परिवार को स्वप्न आया कि इस शिवलिंग को जहां से लाया गया है वहां स्थापित करों। हरगौरी मंदिर और खुदाई में प्राप्त हरगौरी शिवलिंग: स्वप्नमें निर्देश मिलने के बाद बांग्ला संवत 21 माघ 1957 को एक टीन के घर में ठाकुर परिवार द्वारा इसकी स्थापना यहां की गई। चार फरवरी 1901 से हरगौरी मंदिर में पूजा -अर्चना विधिवत रूप से शुरु हुई। इस बात की पुष्टि स्वर्गीय पंडित यशोधर झा द्वारा लिखित हर गौरी मंदिर नमक पुस्तक में भी वर्णित है। ठाकुर परिवार द्वारा नियुक्त पुरोहित भोलानाथ गांगुली के वंशज आज भी मंदिर में पूजा-अर्चना कराते आ रहे हैं, जिसे हरगौरी धाम के नाम से जाना जाता है। स्वर्गीय गणपत रामजी अग्रवाल, सुधीर लाहिड़ी, भूतपूर्व आपूर्ति निरीक्षक रूदानंद झा के प्रयास से इस मंदिर के भव्य रूप का सपना साकार हुआ। 2001 चार फरवरी को मंदिर के सौ वर्ष पूर्ण होने पर स्वर्गीय सुशील अग्रवाल ने स्वर्गीय निरंजन मोर के देखरेख में मंदिर का जीर्णोद्धार और शताब्दी समारोह कराया गया था।अब फिर से मंदिर में करोड़ों का खर्च कर विशेष पुनर्निमाण कार्य किया जा रह है। लेकिन अगर इसे शिव सर्किट में शामिल कर उचित विकसित किया जाये तो पास ही जिला परिषद की काफी जमीन है जो या तो अतिक्रमित है बेकार पड़ी है। उसमें मार्केट धर्मशाला शिव भक्तों के लिए उचित ठहराव की व्यवस्था और पार्किंग की व्यवस्था की जा सकती है।
दुनियाभर के घुमक्कड़ पत्रकारों का एक मंच है,आप विश्व की तमाम घटनाओं को कवरेज करने वाले खबरनवीसों के अनुभव को पढ़ सकेंगे
https://www.roamingjournalist.com/