- प्रकृति से नदियों से, पहाड़ों से, गुफाओं से, झीलों से, समुद्र से, बर्फ के गिलेशियरों से प्रकृति के झरनों से लगातार हो रही छेड़छाड़
-चट्टानों- पहाड़ों को खोद-खोद कर रास्ते बनाने की कीमत भी चुकानी पड़ रही इंसान को
- नदियों के कोख को किया जा रहा छलनी, तो बस फिर तबाही ही तबाही
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: नेपाल में मचे जल प्रलय को लेकर भारत को 13 साल पहले उस उत्तराखंड के केदारनाथ तबाही की याद आ गयी जब हमारे यहां भी प्रकृति ने ऐसा ही जल प्रकोप दिखाया था। नेपाल फ्लैश फ्लड में मरने वालों की संख्या बढ़कर 734 हो गई है, जबकि 2,498 लोग अभी भी लापता हैं। नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी ने रविवार सुबह 9 बजे तक का आंकड़ा शेयर किया है। इसी कड़ी में अगर हम भारत की राजधानी दिल्ली या पड़ोसी राज्यों की बात करें तो मानसून के दिनों में वर्षा अपना रौद्र रूप दिखाती है तो वह प्रशासन को सजग रहने की चेतावनी भी देती है। इसलिए सरकार को राज्य, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उपाय जरूर कर लेने चाहिए। नेपाल की त्रासदी हो या दिल्ली एनसीआर की बाढ़ यह हमें सतर्क रहने का अलार्म दे रही है और इसका गंभीर नोटिस लेकर हमें उपाय करते हुए सतर्क और सुरक्षित रहने के लिए कुछ न कुछ जरूर करना होगा। यह संदेश सरकारों और प्रशासन के लिए है। वर्ष 2000 से हर दो साल बाद कई अमरीकी और यूरोपीय संगठनों ने पर्वतीय जीवन और प्रकृति से छेड़छाड़ को लेकर अपनी रिपोर्टें जारी करनी शुरू की थीं। जिनमें प्रकृति से नदियों से, पहाड़ों से, गुफाओं से, झीलों से, समुद्र से, बर्फ के गिलेशियरों से प्रकृति के झरनों से छेड़छाड़ न करने की चेतावनी भी इन संगठनों ने समय-समय पर जारी की है। नेपाल में जो तबाही बाढ़ के पानी ने मचायी वह तिब्बत के इलाकों से आयी है जहां बर्फ के गिलेशियरों के एकदम से फट जाने से उनमें दस लाख गुना पानी एक साथ तबाही मचा गया। चीन, नेपाल सीमा पर एक नदी भोटेकोशी बहती है जिसमें तिब्बत से आयी बाढ़ का पानी मिल गया और वह तबाही मचाता चला गया। जिसमें हजारों लोगों की जान चली गयी और हजारों लापता हैं। गांव के गांव बह गये। हालांकि भारत और चीन ने मिलकर आपदा प्रबंधन कार्यों से बहुत कुछ किया है। लेकिन ये घटनाएं आज भी मानव को प्रकृति से छेड़छाड़ न करने की चेतावनी देती हैं। अमरीका और कनाडा की सीमाओं पर लियागरा फाल्स से कभी भी मानवीय छेड़छाड़ नहीं की गई तथा इसके लिए कनाडा व अमरीका की तारीफ की गई है।
अभी ब्रिटेन के एक संगठन ने उत्तराखंड और हिमाचल पर आधारित एक रिपोर्ट में कहा है कि पहाड़ों में अब अनावश्यक तोड़फोड़ के परिणाम घातक होने वाले हैं। यदा-कदा भूस्खलन की घटनाएं होती रहती हैं और मानसून के दिनों में बादलों का फटना अनेक गांव में तबाही मचा देता है। ऐसे में चाहे वह तीर्थ यात्री हों या पर्यटक हों सबको कीमत चुकानी पड़ती है। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि आज की तारीख में नदियों के बहने के क्षेत्र में जब पानी गर्मियों में नहीं पहुंचता तो वहां आबादी बसने लगती है, गांव बसते हैं जो विस्तार करते-करते शहरों में बदल जाते हैं लेकिन नदियां जो प्रकृति का हिस्सा है हर पांच या छह साल बाद अपने उसी रास्ते पर आती हैं जहां आबादी बस रही होती हैं। तो बस फिर तबाही ही तबाही है। इसलिए इन चीजों से बचना चाहिए। चट्टानों को खोद-खोद कर पहाड़ों को खोद-खोद कर रास्ते बनाने की कीमत भी इंसान को चुकानी पड़ रही है। वैश्विक स्तर पर अगर अंटार्टिका जहां सालों साल बर्फ जमी रहती है वहां हम एयरपोर्ट बनाएंगे तो इसका असर भी वैश्विक ही होगा। जलवायु परिवर्तन अपना रंग दिखाता ही है। दिल्ली के आसपास आजकल पश्चिमी विक्षोभ के चलते जाते-जाते मानसून ने इस कदर विनाश लीला दिखायी है कि पूरी दिल्ली, गुरुग्राम और सोनीपत बुरी तरह प्रभावित हुए है। नेशनल हाइवे पर अगर राजीव चौक या सुभाष चौक के आसपास छह-छह आठ-आठ घंटे तक स्कूली बसें चार से छह फुट पानी में फंसी रहें और उनमें बच्चे भी फंसे रहें तो इसे क्या कहेंगे। प्रशासन को इस दृष्टिकोण से ऐसे हालात से निपटने के लिए कागजों पर नहीं जमीन पर ठोस व्यवस्थाओं की जरूरत है। कितने ही माता-पिता चार दिन पहले गुरुग्राम में अपने बच्चों की सलामती पूर्वक घर लौटने की भगवान से दुआएं कर रहे थे। मेरा मानना है कि यहां प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत है। पानी का इक्ट्ठा होना और उचित निकासी न होना बहुत ही पेरशानी भरा सबब है। लेकिन हाईटेक शहर गुरुग्राम में सोसायटी की पार्किंग में कारें तैरने लगती है और हाइवे पर दस-दस घंटे तब बीस-बीस किमी. का जाम एक आम कहानी बनता जा रहा है। ठोस व्यवस्था जरूरी है। इससे पहले कि हम और तबाही को झेलें पहले ही उचित व्यवस्था कर लेनी चाहिए। सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने की व्यवस्था बंद होनी चाहिए। जल निकासी के उचित और लेटेस्ट वैज्ञानिक तरीके लागू करने चाहिएं, ताकि छोटे बच्चे पानी में न फंसें और कोई भी व्यक्ति जो दिल्ली से गुरुग्राम या सोनीपत हर रोज आता-जाता है वह समय पर अपने घर पहुंच सके।
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