- 17 अगस्त को है नागपंचमी पर्व उज्जैन में विराजमान नागचंद्रेश्वर मंदिर में दुनिया भर से पहुंचते हैं भक्त
अशोक झा/ भोपाल: 17 अगस्त को नागपंचमी पर्व मनाया जाना है।विश्व प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग बाबा महाकाल मंदिर के शिखर पर विराजमान नागचंद्रेश्वर साल में एक बार दर्शन देते हैं. जिस प्रतिमा के दर्शन के लिए भक्त देश दुनिया से उज्जैन पहुंचते हैं, एक झलक पाने के लिए लालायित रहते हैं. कितनी प्राचीन ये प्रतिमा है, कहां से लाई गई, कब स्थापित की गई, क्या खासियत है. क्या ये मंदिर प्राचीन काल से साल में 1 बार खुलता आया है या फिर 12 महीनों ये मंदिर खुला रहता था. वक्त के साथ 1 दिन की परंपरा कैसे शुरू हुई। साल में एक बार खुलता है मंदिर: कहा जाता है कि नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं। नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक दुर्लभ प्रतिमा भी है। जिसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। बताया जाता है कि यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। महाकाल मंदिर के शिखर में विराजित दुर्लभ प्रतिमा ही असली नागचंद्रेश्वर है, इसी तल पर पिंडी स्वरूप में जो हैं, उन्हें सिद्धेश्वर कहा जाता है। हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। नागों को भगवान शिव के गले का हार भी कहा जाता है। देशभर में नागों के कई मंदिर हैं। इन्हीं में से एक है महाकाल मंदिर के शिखर के ऊपरी हिस्से में स्थापित नागचंद्रेश्वर का मंदिर। यह मंदिर वर्ष में सिर्फ एक दिन 24 घंटे के लिए नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही खोला जाता है। यहां विराजित दुर्लभ प्रतिमा की ही नागचंद्रेश्वर के रूप में पूजा की जाती है। कहा जाता है कि नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं। नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक दुर्लभ प्रतिमा भी है, जिसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। बताया जाता है कि यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। महाकाल मंदिर के शिखर में विराजित दुर्लभ प्रतिमा ही असली नागचंद्रेश्वर है, इसी तल पर पिंडी स्वरूप में जो हैं, उन्हें सिद्धेश्वर कहा जाता है। नागपंचमी के दिन दोनों की ही विधिवत पूजा की जाती है। महानिर्वाणी अखाड़े के महंत विनीत गिरि महाराज ने बताया कि पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। एमपी के उज्जैन में मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या है। भगवान भोलेनाथ के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए नजर आते हैं। नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है।
5 खण्ड में है शिखर: महाकाल मंदिर के महेश : पुजारी बताते हैं कि "महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर 5 खंडों में बना हुआ है। सबसे नीचे स्वयं भू शिव विराजमान हैं महाकाल रूप में, उनके ऊपर ओमकारेश्वर विराजमान हैं।वहीं कंडे की राख से भस्म बनाने के लिए एक खण्ड अलग से है और उनके ऊपर सिध्देश्वर शिवलिंग और दुर्लभ नागचंद्रेश्वर प्रतिमा स्वरूप में एक ही जगह पास-पास में विराजमान है और सबसे ऊपर शिखर है।"61 वर्षों से मन रहा मंदिर में नागचंद्रेश्वर पर्व?:
महेश पुजारी बताते हैं कि "महाकाल मंदिर में ये उत्सव बीते 60 वर्षों से मनाया जा रहा है. इससे पूर्व क्षिप्रा नदी के श्रीराम घाट पर राम सीढ़ी के यहां नागचंद्रेश्वर की प्रतिमा है वहीं पूजन होता था और वहीं मेला लगता था नागपंचमी पर. समय के साथ दुर्लभ प्रतिमा आई और उसका पूजन होने लगा. शेष शैय्या पर हमने अब तक विष्णु को ही विराजमान देखा होगा लेकिन यहां लगी प्रतिमा में शेष शैय्या पर शिव परिवार है. शेष शैय्या पर उमा महेश्वर, कार्तिक स्वामी, गणेश, सिंह, सूर्य, चंद्रमा, नंदी भी दिखाई देते हैं।
251 वर्ष पुरानी प्रतिमा?: दिल्ली विश्वविद्यालय इतिहास विभाग के सहायक प्राध्यापक पुराविद शुभम केवलिया बताते हैं कि "नाग पूजा का भारत में प्राचीन प्रचलन है. भारत के किसी कोने में चले जाएं आपको पूजन होते हुए दिखेगा. विश्व धरोहर स्थल रानी की वाव में भी नागपूजन के साक्ष्य मिलते हैं. लेकिन बात श्री महाकाल मंदिर के शिखर पर विराजमान नागचंद्रेश्वर की करें तो जो प्रतिमा है वह स्टेट पीरियड की प्रतिमा है. यह लगभग 251 साल पुरानी प्रतिमा है।प्रतिमा में उमा महेश्वर, नाग का अंकन है. कोई कहता है नेपाल से लाई गई, कोई कहता है यहीं गढ़ी गई लेकिन ये प्रतिमा स्टेट पीरियड की है और 251 वर्ष पूर्व की अति दुर्लभ प्रतिमा है जो और कहीं अभी तक नहीं देखी गई। कब लाई गई या यही गढ़ी गई, इसका कोई प्रमाण भी दिखाई नहीं देता कहीं। पहले 12 महीने खुला रहता था मंदिर?: मंदिर के महेश पुजारीबताते हैं कि "60 साल पहले ये मंदिर 12 महीने खुला रहता था. आसानी से भक्त ऊपर विराजमान सिध्देश्वर शिवलिंग के दर्शन लाभ लिया करते थे लेकिन बाद में दुर्लभ प्रतिमा नागचंद्रेश्वर की आई और प्रचार प्रसार हुआ।मंदिर 12 महीने के लिए खुला रहता था और शिखर के यहां से आसानी से श्रद्धालुओं का सीढ़ियों से आना जाना था।मंदिर के स्ट्रक्चर और हादसों की संभावना के चलते इसे साल में एक बार खोलने का निर्णय लिया गया तभी से ये परंपरा शुरू हुई।कहा जाता है कि नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं। नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक दुर्लभ प्रतिमा भी है, जिसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। बताया जाता है कि यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है। महाकाल मंदिर के शिखर में विराजित दुर्लभ प्रतिमा ही असली नागचंद्रेश्वर है, इसी तल पर पिंडी स्वरूप में जो हैं, उन्हें सिद्धेश्वर कहा जाता है। नागपंचमी के दिन दोनों की ही विधिवत पूजा की जाती है। महानिर्वाणी अखाड़े के महंत विनीत गिरि महाराज ने बताया कि पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। एमपी के उज्जैन में मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या है। भगवान भोलेनाथ (Lord Shiva) के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए नजर आते हैं। नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है।
यहां देवता पिंडी स्वरूप में पूजे जाते हैं
बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में हर देवता पिंडी स्वरूप में पूजे जाते हैं। चाहे वे गोलामंडी के बृहस्पतेश्वर हों या शनि मंदिर के नौ ग्रह देवता। पुजारी महेश गुरु का कहना है कि महाकाल मंदिर के शिखर में स्थापित प्रतिमा को नागचंद्रेश्वर माना जाने लगा है, जबकि नीचे ओंकारजी और महाकालजी पिंडी रूप में हैं। शिखर के तीसरे तल में जो शिवलिंग है, वह सिद्धेश्वर कहलाते हैं। रही बात दीवार में दुर्लभ मूर्ति की, उसमें तो पूरा शिव परिवार विराजमान है।
नागचंद्रेश्वर अकेले नहीं हैं। ऐसे में उस प्रतिमा को नागचंद्रेश्वर कहना कुछ ठीक नहीं लगता है, लेकिन लोक मान्यताओं के कारण इस प्रतिमा को ही नागचंद्रेश्वर मानकर पूजा जाने लगा है। यह क्रम साल-दर-साल से चला आ रहा है। पुराने नाग मंदिर की बात करें तो पटनी बाजार में 84 महादेव के क्रम में जो नागचंद्रेश्वर मंदिर है, जहां से पंचक्रोशी यात्री बल लेकर यात्रा करते हैं। दूसरा रामघाट पर शेषनाग की प्रतिमा है, जहां वर्षों पहले नागपंचमी के दिन मेले लगते थे। शहर में इन दो स्थानों पर नागचंद्रेश्वर के मंदिर स्थापित हैं।
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