- तिब्बती इतिहास की अनकही दास्तान या बीजिंग का नया प्रोपेगैंडा वॉर?
- आखिर क्यों दलाई लामा पर बनी इस फिल्म पर बौखलाया चीन
कलिंगपोंग की वादियों में 12 साल की मेहनत से दार्जिलिंग के
शैंपेन खिमसर ने किया फिल्म का निर्माण
अशोक झा/ सिलीगुड़ी:
पड़ोसी राष्ट्र चीन विस्तारवादी के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता जा। ऐसे में 14 वें दलाई लामा पर बनी फिल्म देशभर में सिनेमा घरों में 11 सितंबर से प्रदर्शित करने का निर्णय लिया है। इसकी जानकारी मिलते ही चीनी सरकार में खलबली मच गई है। वह इस फिल्म के प्रदर्शन से बेहद नाराज है। इस फिल्म की पूरी कहानी बंगाल के दार्जिलिंग और कालिम्पोंग के पहाड़ी इलाकों से बेहद करीबी तौर पर जुड़ी है। फिल्म का डायरेक्शन दार्जिलिंग में ही जन्मे जाने-माने तिब्बती फिल्म डायरेक्टर शैंपेन खिमसर ने किया है। ये फिल्म अपने इतिहास, पहाड़ों के पुराने संघर्ष और स्थानीय संस्कृति को बड़े पर्दे पर बहुत ही असरदार तरीके से पेश करने की तैयारी में है।
सिनेमा प्रेमियों के बीच इस फिल्म को लेकर काफी एक्साइटमेंट बनी हुई है। ये पूरी कहानी 1959 के उस नाजुक दौर के इर्द-गिर्द घूमती है, जब 14वें दलाई लामा तिब्बत से बचकर भारत की शरण में आए थे। इसमें 'चुशी गंगड्रुक' यानी तिब्बती स्वतंत्रता सेनानियों के उस सीक्रेट रेजिस्टेंस को पर्दे पर दिखाया गया है, जिसने उस ऐतिहासिक सफर में सबसे बड़ी ढाल बनकर पहरा दिया था। फिल्म के सिनेमाघरों में आने से ठीक पहले चीन की सरकारी मीडिया मशीनरी ने इस फिल्म रे खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इतना ही नहीं, उन्होंने इस फिल्म को एक प्रोपेगैंडा बताया है। बीजिंग के आरोप और अलगाववाद का दावा: चीन के सरकारी मीडिया ग्रुप के प्रमुख चैनल सीजीटीएन ने एक लंबा आर्टिकल छापकर फिल्म पर तीखा हमला बोला। चीनी मीडिया ने अपने आर्टिकल में इस फिल्म को तिब्बत के इतिहास के साथ की गई एक मनगढ़ंत और झूठी छेड़छाड़ करार दिया है। बीजिंग का आरोप है कि फिल्ममेकर शेनपेन खिमसर ने सोशल मीडिया पर तिब्बत को चीन से अलग बताकर गलत जानकारी फैलाई है। चीन का साफ कहना है कि तिब्बत सदियों से उसका अभिन्न हिस्सा रहा है और ये फिल्म दुनिया भर में अलगाववादी सोच को बढ़ावा देने की एक सोची-समझी कोशिश भर है।
इतिहास की सच्चाई और अंतरराष्ट्रीय रुख:
चीन लगातार ये दावा करता आया है कि इंटरनेशनल लेवल पर तिब्बत की निर्वासित सरकार को कोई कानूनी मान्यता नहीं मिली है। चीनी मीडिया का तर्क है कि 1951 और 1959 की घटनाओं को लेकर दुनिया में जो बातें कही जाती हैं, वे असल हकीकत से कोसों दूर हैं। बीजिंग का कहना है कि भाषा, इतिहास और कानूनी आधार पर तिब्बत हमेशा से चीन का हिस्सा रहा है और इस फिल्म के जरिए उस सच्चाई को मिटाने का खेल खेला जा रहा है। दूसरी तरफ, निष्पक्ष जानकारों का मानना है कि जब भी तिब्बत की आजादी, वहां के लोगों के दर्द और दलाई लामा के संघर्ष पर कोई बात सामने आती है, तो चीन हमेशा असहज होकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऐसे ही आक्रामक रुख अपना लेता है।
डायरेक्टर का जवाब और बारह साल की मेहनत
चीन के इन सभी आरोपों पर फिल्म के डायरेक्टर शैंपेन खिमसर ने भी बहुत ही मजबूती और बेबाकी से अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि उनकी ये फिल्म किसी तरह की नफरत या बंटवारा फैलाने के लिए नहीं बनाई गई है, बल्कि ये उन पुराने घावों, बलिदानों और सच को याद करने की एक ईमानदार कोशिश है। शैंपेन खिमसर का कहना है कि ये फिल्म तिब्बती लोगों के संघर्ष, दलाई लामा की रक्षा करने वालों की शहादत और उनके जीने की जंग को दर्ज करने का एक जरूरी दस्तावेज है। शैंपेन खिमसर खुद दार्जिलिंग में शरणार्थी के तौर पर पले-बढ़े हैं और इस पूरे प्रोजेक्ट को बड़े पर्दे तक लाने के लिए उन्होंने करीब 12 साल तक दिन-रात लगातार मेहनत की है।
दार्जिलिंग कनेक्शन और नवाजुद्दीन सिद्दीकी की आवाज:
इस पूरी फिल्म का दार्जिलिंग और कालिम्पोंग से बहुत ही गहरा और जज्बाती नाता है। फिल्म के निर्माता दोरजी वांग्दी देवात्शांग और लीड एक्टर थुप्तेन चुकात्सांग दोनों ने कालिम्पोंग के मशहूर सेंट ऑगस्टीन स्कूल से अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की है। भारत में रिलीज होने वाले इसके हिंदी डब वर्जन में बॉलीवुड के बेहतरीन एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने अपनी दमदार आवाज देकर इस कहानी के असर को कई गुना बढ़ा दिया है। पहाड़ों में जन्मे और पले-बढ़े कलाकारों की ये टोली जब अपनी ही मिट्टी और अपने पुरखों के संघर्ष की दास्तान दुनिया के सामने रख रही है, तो इंडियन ऑडियंस में भी इसे देखने को लेकर एक अलग ही उत्सुकता और जुड़ाव देखने को मिल रहा है।
रोटरडैम से भारतीय सिनेमाघरों तक का सफर:
भारत में दस्तक देने से पहले यह फिल्म दुनिया के कई बड़े फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाई जा चुकी है। साल 2025 में जब नीदरलैंड के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल रोटरडैम में इसका प्रीमियर हुआ था, तब भी चीनी मीडिया ने इस पर जमकर जहर उगला था। इसके बावजूद इंटरनेशनल ऑडियंस और फिल्म क्रिटिक्स ने इस कहानी को मानवीय नजरिए से बेहद संवेदनशील और साहसिक बताया था। अब जब 11 सितंबर को ये फिल्म भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज होने जा रही है, तो सबकी नजरें इस पर टिकी हैं। लगभग 4 दशकों तक तिब्बत आजाद रहा. 1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन आने के बाद माओ त्से तुंग ने तिब्बत को अपना हिस्सा बताया. 1950 में चीन ने तिब्बत पर हमला कर उस पर कब्जा कर लिया. मई 1951 में तिब्बती नेताओं को चीन की शर्तों वाले एक समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया गया। समझौते के तहत तिब्बत की स्वायत्तता की गारंटी तो दी गई, लेकिन साथ ही ल्हासा में चीनी नागरिकों के आने और मिलिट्री हेडक्वार्टर बनाने की भी इजाजत दी गई। ये देखना दिलचस्प होगा कि तिब्बती संघर्ष की ये अनकही और बेहद साहसिक दास्तान भारतीय दर्शकों के दिलों में अपनी क्या छाप छोड़ पाती है।
#दलाईलामा
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