हाल ही में जब "News18" से मुझको विदाई दी गई तो कई गिफ्ट्स के साथ एक सूटकेस भी भेंट किया गया. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मित्र अभय मेहता ने फेसबुक पर कौतुक दिखाया, भारत में रिटायरमेंट और विदाई के समय सूटकेस देने की परंपरा कैसे शुरू हुई.
आपको बता दूं कि भारत में ये परंपरा सरकारी विभागों में ट्रांसफर और रिटायरमेंट जैसे अवसरों पर शुरू हुई. रेलवे, पुलिस, डाक विभाग, सरकारी बैंकों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में जब कोई सेवानिवृत्ति होता है तो उसको सूटकेस या ब्रीफकेस दिया जाता है. ये प्रचलन केवल गिफ्ट नहीं है बल्कि इसके एक खास मतलब भी होता है. इसके पीछे गहरा सामाजिक, व्यावहारिक और ऐतिहासिक महत्व है.
ये परंपरा मुख्य रूप से 1970 और 1980 के दशक में मजबूत हुई, जब भारत में सरकारी नौकरियों का दबदबा था. सरकारी नौकरी का मतलब था बार-बार कुछ सालों के बाद तबादले. तब 'VIP' या 'Safari' जैसे ब्रांड्स के सूटकेस मिडिल क्लास परिवारों के लिए बहुत बड़ी संपत्ति माने जाते थे. 70-80 के दशक में एक अच्छा 'हार्ड-शेल' सूटकेस खरीदना एक बड़ा खर्च माना जाता था. ये मध्यम वर्ग के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक भी था.
रिटायरमेंट का मतलब होता था सेवा से मुक्ति और इसके बाद अपने गृह नगर की ओर अंतिम रूप से वापसी. तब सहकर्मी सूटकेस देकर प्रतीकात्मक तौर पर ये संदेश देते थे, "अब आपने अपनी सेवाएं पूरी कर ली हैं, अपना सामान इस सूटकेस में रखिए. ससम्मान अपने घर की यात्रा पर निकलिए."
सूटकेस देने की एक खास वजह ये भी होती थी कि अब रिटायर होकर व्यक्ति जब घूमेगा तो सूटकेस बहुत काम आएगा. रिटायरमेंट के दिन कर्मचारी को भविष्य निधि यानि पीएफ, पेंशन बुक, ग्रेच्युटी के कागजात और सेवा से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज मिलते हैं. सूटकेस या अटैची इन सभी कागजातों को सुरक्षित घर ले जाने का एक बेहद व्यावहारिक जरिया बनती थी.
जब देश आजाद हुआ तो शुरुआती दशकों में विदाई के समय आमतौर पर केवल शॉल, श्रीफल यानि नारियल और एक स्मृति चिह्न देने का रिवाज था. समय के साथ जब कर्मचारी संगठनों और वेलफेयर एसोसिएशनों का गठन हुआ, तो उन्होंने विदाई उपहारों के लिए एक बजट तय करना शुरू किया. जब पूरी टीम या ऑफिस के लोग मिलकर पैसे इकट्ठा करते थे तो एक ऐसी चीज चुनी जाती थी जो टिकाऊ हो, ब्रांडेड हो और हर किसी के काम आ सके. सूटकेस इस कसौटी पर बिल्कुल खरा उतरा....और अब तो ये रिवाज ही बन गया. विदाई में कुछ मिले या ना मिले लेकिन सूटकेस तो पक्का है.
हालांकि पश्चिमी देशों में कॉर्पोरेट और सरकारी विदाई का तरीका काफी अलग होता है. अमेरिका और ब्रिटेन में दशकों से रिटायरमेंट विदाई के समय सोने की घड़ी दी जाती है. किसी कंपनी में 25-30 साल देने वाले कर्मचारी को विदाई पर 'सोने की कलाई घड़ी' या 'पॉकेट वॉच' दी जाती है. इसका प्रतीकात्मक संदेश होता है, "आपने हमें अपना इतना कीमती वक्त दिया, अब यह वक्त आपका है."
आजकल पश्चिमी देशों में कोई सामान देने की बजाय विदाई पर गिफ्ट कार्ड दिए जाते हैं, जैसे किसी गोल्फ क्लब की मेंबरशिप, किसी लक्ज़री क्रूज़ या ट्रिप का वाउचर या उनके पसंदीदा रेस्तरां का कूपन. ( देश के वरिष्ठ खेल पत्रकार संजय श्रीवास्तव की कलम से )
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