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बनारस में जहां मैं रहता हूं वहां की अनेक चीजें मशहूर हैं. मसलन भोजूबीर में यूपी कालेज है जिसकी स्थापना बीएचयू से पहले 1909 में हुई थी. एक किलोमीटर के दायरे में अंग्रेजों के जमाने का बना पागलखाना और सेंट्रल जेल है. यह पागलखाना आगरा से कम नहीं. अब पागलखाना की जमीन में बनारस का मेडिकल कालेज बन रहा है. उसी के बगल में जिला कारागार है, जो बस्ती के बीच आ गया है जिसे शासन ने हटाने का प्रस्ताव किया है. यही हालत सेंट्रल जेल की है, उसे भी हटाया जाएगा. पढ़ाई, पागलखाना, सेंट्रल जेल और इसके साथ भीखारी धर्मशाला भी कभी था.
यानी यूपी कालेज, पागलखाना और सेंट्रल जेल का स्वरूप अब वह नहीं है जो 1960 के दशक में था. पहले यूपी कालेज को समझिए. यहां खपरैल के दस छात्रावास थे जो अब भी हैं लेकिन छात्र वहां नहीं रहते. छात्रावास की चहल-पहल खत्म हो गई है. उसके परिसर में झाड़-झंखाड़ उगा है. एक छात्रावास में एनसीसी की आफिस है जो अब भी सुरक्षित है. दूसरे में पीएसी ने डेरा जमाया है. कालेज की कैंटीन अब उजाड़ हो गया है. कैंटीन के पास शिवजी का मंदिर है जो गुलजार है.
कैंटीन में पहले लालपेड़ा बनता था जो इतना प्रसिद्ध हुआ की चाहरदीवारी के बाहर शहर में अनेक दुकानें खुल गईं. इसे खोआ को पकाकर देसी गुड़ में पकाया जाता था जिसे एक माह तक बिना फ्रीज के रखा जा सकता है. अब न शुद्ध दूध व खोआ मिलेगा, न गुड़. तो फिर कैसे बनेगा लालपेड़ा..! यूपी कालेज का खेल का मैदान भी दो हिस्सों में बंट गया है. वहां एक हाॅकी और दूसरा फुटबाल का मैदान था. फुटबाल का मैदान खत्म हो गया.
यूपी कालेज से राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनेक हाॅकी के खिलाड़ी निकले थे. यह 70-80 के दशक की बात है. प्रत्येक छात्रावास के सामने फुटबाल का मैदान है जिसकी हालत खस्ता हो गई है. दो छात्रावासों के बीच में एक कुआं है जिसका जल में खाना बनाने के काम आता था. वहां छात्र भी स्नान करते थे. यह बीते दिनों की बात हुई, अब कुओं की उपयोगिता खत्म हो गई है जैसे गांवों में. बनारस में प्रत्येक पुरानी मकानों में आज भी कुआं है. पहले पेयजल का यही श्रोत था.
पागलखाना का नक्शा भी बदल गया और यूपी कालेज के घोड़े भी इतिहास बन गए. सेंट्रल जेल के स्थानांतरण की चर्चा है. यह कारागार एक तरफ वरूणा नदी से घिरा है. भोजूबीर से एक किलोमीटर के दायरे में एक भिखारी धर्मशाला था. वहां से भिखारियों को हटाकर उन्हें पहले आशापुर भेजा गया और अब उनका अस्थाई आवास भी खत्म हो गया. भिखारी धर्मशाला में अब शंकुल भवन बन गया है. वहां जाने से पहले अर्दलीबाजार में शिक्षक ट्रेनिंग सेंटर था जिसके परिसर में एक बंगाली की कोठी थी जहां अक्सर विवेकानंद आकर रूकते थे. यहीं विनोबा कुटी है जहां राजघाट में सर्वसेवा संघ के निर्माण के दौरान विनोबा जी रहते थे. अब सर्वसेवा संघ को दो साल पहले जमींदोज कर दिया गया.
जिस तरीके से बाबा विश्वनाथ धाम बनाने के लिए लाहौरी टोला और ललिता गली को खत्म किया गया वैसे ही काशी बदल रही है. दालमंडी की गली अब सड़क बनेगी. 2014 के बाद बनारस में विकास की आंधी चल रही है. सड़कें चौड़ी हो रही हैं और सड़क हाईवे बन रही है. कैंट रेलवे स्टेशन से गोदौलिया तक रोपवे बन रहा है. इसके लिए सैकड़ों मकान तोड़े गए. यूपी कालेज और बीएचयू के बीच 15 किलोमीटर के दायरे में नया इतिहास रचा जा रहा है. जो था, वह अब मेरी किताब "उड़ता बनारस" में ही मिलेगा. किसी बूढ़े शहर का इतिहास ऐसे ही करवट लेता है. गंगा उसपार "रेत की नहर" बनी थी जो पहली ही बाढ़ में बह गई. जो शहर जमाने के साथ कदमताल नहीं करता उसे बुलडोजर सही रास्ते पर चलना सीखाता है, इसे आधुनिक भाषा में विकास कहते हैं.
@ काशी के वरिष्ठ पत्रकार सुरेशप्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से साभार
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