प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत में ही नहीं विश्व में किसी भी स्थान पर भारतीय संस्कृति व विरासत के प्रतीकों के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। इंडोनेशिया यात्रा को दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर भारत और इंडोनेशिया ने प्रम्बानन मंदिर परिसर के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए एक महत्वपूर्ण सहयोग शुरू किया गया है। यह निर्णय 7 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री मोदी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति की वार्ता के दौरान लिया गया। भारत अपने पुरातत्व और संरक्षण विशेषज्ञों के माध्यम से लगभग 1,200 वर्ष पुराने प्रम्बानन मंदिर के संरक्षण और पुनर्स्थापन में सहायता करेगा। इसमें क्षतिग्रस्त संरचनाओं के वैज्ञानिक संरक्षण, पत्थरों के पुनर्संयोजन और प्राचीन वास्तुकला को सुरक्षित रखने की तकनीकों का उपयोग किया जाएगा।
प्रम्बानन मंदिर केवल एक प्राचीन इमारत नहीं, बल्कि भारत और इंडोनेशिया के साझा सांस्कृतिक इतिहास का जीवंत साक्ष्य है। लगभग 1,200 वर्षों से खड़ा यह मंदिर बताता है कि भारतीय ज्ञान, कला, स्थापत्य और आध्यात्मिक परंपरा का प्रभाव कभी पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में फैला हुआ था। आज इसका संरक्षण केवल एक स्मारक को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि साझा सभ्यतागत विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचाने का संकल्प है। दोनों देशों ने माना कि प्रम्बानन केवल इंडोनेशिया की धरोहर नहीं, बल्कि भारत और इंडोनेशिया की साझा सभ्यतागत विरासत का प्रतीक है। इसलिए इसका संरक्षण दोनों देशों की साझा जिम्मेदारी है।
9वीं शताब्दी का निर्माण
इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर को विश्व के सबसे भव्य हिंदू मंदिरों में गिना जाता है। यह मंदिर लगभग 1,200 वर्ष पुराना है और दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदू सभ्यता के उत्कर्ष का जीवंत प्रमाण माना जाता है। यह मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है और आज भी भारत तथा इंडोनेशिया के साझा सांस्कृतिक संबंधों का महत्वपूर्ण प्रतीक है। इतिहासकारों के अनुसार प्रम्बानन मंदिर का निर्माण (लगभग 850 ईस्वी) में प्रारंभ हुआ। यह उस समय बनाया गया जब जावा द्वीप पर हिंदू धर्म का प्रभाव चरम पर था। बाद के राजाओं ने भी इस मंदिर परिसर का विस्तार कराया। अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि इसका निर्माण रकाई पिकाटन ने कराया था, जो हिंदू संजय वंश के शासक थे। बाद में उनके उत्तराधिकारियों, विशेषकर बालितुंग के काल में मंदिर परिसर का विस्तार हुआ।
मंदिर की विशेषताएँ
• यह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर है।
• मूल रूप से यहाँ 240 मंदिर बनाए गए थे।
• मुख्य मंदिर लगभग 47 मीटर (154 फीट) ऊँचा है और भगवान शिव को समर्पित है।
• इसके साथ भगवान विष्णु और ब्रह्मा के भी भव्य मंदिर हैं।
• मंदिर की दीवारों पर रामायण की कथा अत्यंत सुंदर शिल्पकला के रूप में उकेरी गई है, जो भारतीय संस्कृति के गहरे प्रभाव को दर्शाती है।
1991 से यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में
लगभग 10वीं-11वीं शताब्दी में जावा की राजनीतिक राजधानी पूर्वी जावा स्थानांतरित हो गई। इसके बाद मंदिर धीरे-धीरे उपेक्षित होता गया। बाद में आए भूकंपों और ज्वालामुखीय गतिविधियों से इसकी अनेक संरचनाएँ ढह गईं। सदियों तक यह खंडहरों में दबा रहा और 17वीं शताब्दी में फिर से इसकी पहचान हुई। व्यवस्थित संरक्षण और पुनर्निर्माण का कार्य 1918 से शुरू हुआ और आज भी जारी है। 1991 से यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल यह मंदिर इंडोनेशिया के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। महाशिवरात्रि पर यहाँ हिंदू धार्मिक अनुष्ठान भी आयोजित होते हैं। 2006 के भूकंप के बाद इसके कई भागों का वैज्ञानिक तरीके से पुनर्संरक्षण किया गया गया था। यद्यपि आज इंडोनेशिया विश्व का सबसे बड़ा मुस्लिम-बहुल देश है, फिर भी वहाँ की संस्कृति, भाषा और कला पर भारतीय परंपरा की गहरी छाप दिखाई देती है। प्रम्बानन मंदिर इसका सबसे भव्य उदाहरण है। यहाँ आज भी रामायण बैले का मंचन होता है, जो भारतीय महाकाव्य की जीवंत सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
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