अशोक झा/ कोलकाता: कहते है कि अंधेरे में मनुष्य का साया भी साथ छोड़ देता है। चुनाव हार के बाद तृणमूल कांग्रेस भ्रष्ट्राचार के कारण एजेंसियों के निशाने पर थी। हार के बाद भी अपने 80 विधायकों के दम पर दिल्ली की गद्दी से भाजपा को उखाड़ फेंकने का ममता बनर्जी भर रही थी। इसी बीच उनके साथ अपनों ने ही गेम कर दिया। विद्रोही विधायकों में मुस्लिम विधायकों का भी बड़ा हिस्सा साथ है। सभी विधायक कहते है कि उन्हें ममता से नहीं अभिषेक से नाराजगी है। या यह कह ले कि भतीजा प्रेम में ममता बनर्जी ने तृणमूल के तृण और मूल को अलग अलग कर लिया है। विधानसभा चुनाव 2026 के बाद शुरू हुआ तृणमूल कांग्रेस (TMC) का बिखराव अब थमता हुआ नजर नहीं आ रहा है। एक तरफ जहां पार्टी के भीतर चल रही ऐतिहासिक बगावत को विधानसभा के स्तर पर आधिकारिक मान्यता मिल गई है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक मोर्चे पर भी ममता बनर्जी को अब तक का सबसे बड़ा झटका लगा है। तृणमूल कांग्रेस के सबसे कद्दावर, प्रभावशाली और ममता बनर्जी के सबसे करीबी नेताओं में शुमार फिरहाद हकीम उर्फ बॉबी हकीम ने कोलकाता नगर निगम के मेयर पद से इस्तीफा दे दिया है. ममता बनर्जी ने भारी मन से उनके इस इस्तीफे को स्वीकार भी कर लिया है।
फिरहाद हकीम का इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब ठीक इसी वक्त बंगाल विधानसभा के स्पीकर ने सदन के भीतर टीएमसी के 58 बागी विधायकों के अलग गुट को संसदीय मान्यता प्रदान कर दी है। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले इस बागी गुट को मंजूरी मिलना ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के लिए किसी बड़े राजनीतिक वज्रपात से कम नहीं है।इस दोहरी मार ने कोलकाता से लेकर दिल्ली तक टीएमसी के वजूद पर बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
कौन हैं फिरहाद हकीम और क्यों माना जाता है उन्हें ममता का 'हनुमान'?:फिरहाद हकीम केवल एक नेता नहीं, बल्कि पिछले डेढ़ दशक से तृणमूल कांग्रेस का सबसे मजबूत सांगठनिक और सामाजिक स्तंभ रहे हैं। अल्पसंख्यक वोट बैंक के सबसे बड़े चेहरे: बंगाल की राजनीति में करीब 30% आबादी वाले अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर फिरहाद हकीम की पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती है। वे ममता बनर्जी के कोर वोट बैंक को साधे रखने वाले सबसे बड़े रणनीतिकार हैं।
फिरहाद हकीम का ऐतिहासिक रिकॉर्ड: साल 2018 में फिरहाद हकीम ने तब इतिहास रचा था जब वे आजादी के बाद कोलकाता के पहले मुस्लिम मेयर बने थे। वे राज्य सरकार में शहरी विकास और नगरपालिका मामलों जैसे कई भारी-भरकम मंत्रालय भी संभाल चुके हैं।चर्चा और विवादों में जुड़ा नाम: फिरहाद हकीम का नाम साल 2016 के चर्चित नारदा स्टिंग ऑपरेशन के दौरान देश भर की सुर्खियों में आया था. इसके अलावा, कोलकाता नगर निगम के तहत आने वाले इलाकों में उनके बेहतरीन प्रशासनिक नियंत्रण के लिए भी वे हमेशा चर्चा में बने रहते थे।
इस्तीफा क्यों दिया?: सुवेंदु अधिकारी के सरकार का दबाव या बदली हुई हवा का रुख? आधिकारिक तौर पर फिरहाद हकीम ने अपने इस्तीफे के पीछे राज्य में नवगठित भाजपा सरकार के तहत प्रशासनिक कामकाज में आ रही गंभीर दिक्कतों का हवाला दिया है। सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के कार्यभार संभालने के बाद कोलकाता नगर निगम के फंड और विकास योजनाओं को लेकर राज्य सरकार ने बेहद कड़ा रुख अपना लिया था, जिसके चलते मेयर के तौर पर काम करना मुश्किल हो रहा था।
हालांकि, राजनीति के जानकार इस इस्तीफे के पीछे गहरी क्रोनोलॉजी देख रहे हैं।बताया जा रहा है कि फिरहाद हकीम ने पहले भी ममता बनर्जी से पद छोड़ने की इच्छा जताई थी, लेकिन तब संकट को देखते हुए उन्हें रोक दिया गया था। लेकिन अब, जब 58 विधायकों का धड़ा पूरी तरह अलग हो चुका है और जिसे स्पीकर ने वैधानिक मंजूरी भी दे दी है, फिरहाद हकीम जैसे कद्दावर नेता का पद छोड़ना यह साफ इशारा करता है कि वे अब डूबते हुए जहाज की जिम्मेदारी अपने सिर पर नहीं लेना चाहते।
टीएमसी के लिए अब आगे क्या?: ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले 58 विधायकों के गुट को मान्यता मिलने के बाद अब ममता बनर्जी तकनीकी रूप से भी विधानसभा में बेहद कमजोर हो गई हैं. बागी गुट ने पहले ही साफ कर दिया है कि वे ममता को मार्गदर्शक मानने को तैयार हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को पूरी तरह खारिज करते हैं।ममता बनर्जी इस समय कोलकाता के रानी रासमणि एवेन्यू में धरने पर बैठी हैं और 'ईश्वर अल्लाह तेरो नाम' का जाप कर रही हैं, लेकिन उनके इस आध्यात्मिक और राजनैतिक विलाप के बीच उनकी बनाई हुई पार्टी ताश के पत्तों की तरह ढह रही है। फिरहाद हकीम का मेयर पद से हटना यह साबित करता है कि अब तृणमूल कांग्रेस के भीतर का आंतरिक असंतोष उस स्तर पर पहुंच चुका है जहां से पार्टी की वापसी नामुमकिन दिखाई दे रही है।
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