- 30 जून, 1855 की आज भी कहता है संघर्ष की गाथा
- सिद्दाे-कान्हू का नारा था "अबुआ राज अबु दिशाेम"
- सिद्धू कान्हू के अंग्रेज हमारी भूमि छोड़ के नारे को किया चरितार्थ
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: बंगाल में आदिवासियों की करीब 16लाख की आबादी आज भी हूल दिवस पर अपने वीर नायक सिद्धू - कान्हा को याद करता है। उनके बताए मार्ग पर आज भी अपनी परंपरागत हथियार के साथ जल जंगल जमीन की रक्षा को तत्पर रहते है। क्यों मनाया जाता है हूल दिवस आपको हम जानकारी देते है। संथाल विद्रोह के लिए आदिवासियों के लिए इतिहास साक्षी है कि अपनी देश और जन चेतना की रक्षा के लिए वह निरंतर संघर्ष करता रहता है। देश में जनजातीय समाज में अब तक जितने भी संघर्ष हुए हैं, उनका एक प्रधान पहलु सामुदायिक पहचान बचाना रहा है जोत जमीन के रक्षा के लिए जमीन से जुड़े आदिवासियों के आंदोलन के एक लंबा इतिहास है। जनजातियों में संथालों का विद्रोह सबसे जबरजस्त था। भारत से अंग्रेजों को भगाने के लिए यह प्रथम जनक्रांति थी जो संथाल हूल के नाम से प्रसिद्ध हुई। कौन थे शाहिद वीर सिद्धू - कान्हू
संथाल हूल का नेतृत्व भोगनाडीह निवासी चुन्नी मांझी के चार पुत्रों ने किया। ये थे सिद्धू कान्हू, चाँद और भैरव। हूल के समय कान्हू की उम्र 35 वर्ष, चाँद की आयु 30 वर्ष और भैरव की उम्र 20 वर्ष बतायी जाती हैं। सिद्धू सबसे बड़ा था किन्तु उसकी जन्मतिथि 1825 के आस-पास मानी गई है। सिद्दाेे-कान्हू का जन्म झारखंड राज्य के साहेबगंज जिले मे भाेगनाडीह नामक पर हुआ था। सिद्धू - कान्हू ने शोषण के विरूद्ध विद्रोह करने का संकल्प ले लिया तो जन समूह को एकजुट करने तथा एकत्रित करने के लिए परंपरागत ढंग से अपनाया। दूगडूगी पिटवा दी और साल टहनी का संदेशा गाँव - गाँव भेजवाया। साल टहनी क्रांति संदेश का प्रतीक है। 30 जून, 1855 की तिथि भगनाडीहा में विशाल सभा रैली के लिए निर्धारित की गई। तीर धनुष के साथ लोगों को सभा में लाने की जिम्मेवारी मांझी/परगनाओं को सौंपी गई। संदेश चारों ओर फ़ैल गया। दूरदराज के गांवों से पद- यात्रा करते लोग चल पड़े तीर-धनुष और पारंपरिक हथियारों से लैस कोई बीस हजार संथाल 30 जून को भगनाडीह पहुँच गये। इस विशाल सभा में सिद्धू कान्हू के अंग्रेज हमारी भूमि छोड़ के नारे गूँज उठे। कभी तिलक ने कहा था। स्वाधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने कहा था तुम हमें खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा और गाँधी ने नारा दिया था -करो या मरो। इनसे पहले ही उसी तर्ज पर सिद्धू ने ललकारा था करो या मरो, अंग्रेजों हमारी पार्टी छोड़ दो। सिद्दाे-कान्हू का नारा था "अबुआ राज अबु दिशाेम"। जैसा कि ऊपर दिया गया है इसलिए 30जून काे संथाल हुल दिवस मनाया जाता है। इस दिन शहिदाें की शहादत है।
सिद्धू का लोकतंत्र में विश्वास था। उसने समझ लिया था कि केवल संथालों द्वारा जन – आंदोलन संभव नहीं है। इसलिए औरों का भी सहयोग लिया। इस विद्रोह में अन्य लोग भी जैसे कुम्हार, चमार, ग्वाला, तेली, लोहार, डोम और मुस्लिम भी शामिल हो गये।
सिद्धू - कान्हू ने हूल को सजीव और सफल बनाने के लिए धर्म का भी सहारा लिया। मरांग बूरू (मुख्य देवता) और जाहेर एस (मुख्य देवी) के दर्शन और उनके आदेश (अबुआ राज स्थापित करने के लिए) की बात को प्रचारित कर लोगों की भावना को उभारा। सखुआ डाली घर- घर भेजवा का लोगों तक निमंत्रण पहूंचाया कि मुख्य देवी - देवता का आशीर्वाद लेने के लिए 30 जून को भगनाडीह में जमा होना है। फलस्वरूप 30 जून को भगनाडीह में कोई 30 हजार लोग सशस्त्र इकट्ठे हो गये। उस सभा में सिद्धू को राजा, कान्हू को मंत्री, चाँद को प्रशासक और भैरव को सेनापति मनोनीत कर नये संथाल राज्य के गठन की घोषणा कर दी गई। महाजन, पुलिस, जमींदार, तेल अमला, सरकारी कर्मचारी के साथ ही नीलहे गोरों को मार भगाने का संकल्प लिया गया तथा लगान नहीं देने व सरकारी आदेश हिन् मानने का निश्चय किया गया। नीलहे गोरों ने नील खेतों के लिए संथाली को उत्साहित किया था पर शीघ्र ही उनका शोषण शुरू हो गया था जो बढ़ता ही गया। संथाल उनसे भी क्रोधित थे।
इसी समय एक घटना घटी। रेल निर्माण कार्य से जुड़े एक अंग्रेज ठीकेदार ने तीन संथाली मजदूरिनों का अपरहण कर लिया। यह आग में घी का काम किया। क्रांति की शुरूआत हो गई। कुछ संथालों ने अंग्रेजों पर आक्रमण कर दिया। तीन अंग्रेज मारे गये। और अपहृत स्त्रियाँ मुक्त कर ली गई। हूल यात्रा शुरू हुई तो कलकत्ता की ओर बढ़ती गई। गाँव के गाँव लुटे गए, जलाये गये और लोग मारे जाने लगे। कोई 20 हजार संथाली युवकों ने अंबर परगना के राजभवन पर धावा बोल दिया और 2 जूलाई को उस पर कब्जा का लिया। फूदनीपुर, कदमसर और प्यालापुर के अंग्रेजों को मार गिराया गया। निलहा साहबों की विशाल कोठियों पर अधिकार पर अधिकार कर लिया गया। 7 जुलाई को दिघी थाना के दारोगा और अंग्रेजों के पिट्टू, महेशलाल दत्त की हत्या कर दी गई। तब तक 19 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था। सुरक्षा के लिए बनाये गये मारटेल टाबर से अंधाधुंध गोलियां चलाकर संथाल सैनिकों को भारी क्षति पहुँचायी गई। फिर भी बन्दूक का मुकाबला तीर–धनुष करता रहा। संथालों ने वीरभूमि क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और वहां से अंग्रेजों को भगा दिया। वीरपाईति में अंग्रेज सैनिकों की करारी हारी हुई। रघुनाथपुर और संग्रामपुर की लड़ाई में संथाली की सबसे बड़ी जीत हुई। इस संघर्ष में एक यूरोपियन सेनानायक, कुछ स्वदेशी अफसर और 25 सिपाही मार दिए गये। अंग्रेज बौखला गये। भागलपुर कमिश्नरी के सभी जिलों में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया। विद्रोहियों की गिरफ्तारी के लिए पुरस्कार की घोषणा कर दी गई। उनसे मुकाबला के लिए भी जबरदस्त बंदोबस्त हुआ। बडहैत की लड़ाई में चाँद भैरव कमजोर पड़ गये और जब अंग्रेजों की गोलियों के शिकार हो गए। अब अंग्रेजों ने सिद्धू - कान्हू के कुछ साथी लालच में आकर अंग्रेजों से मिल गये। गद्दारों के सहयोग से आखिर उपरबंदा गाँव के पास कान्हू को गिरफ्तार कर लिया गया। बड़हैत में 19 अगस्त को सिद्धू को भी पकड़ा गया। मेहर शकवार्ग ने उसे बंदी बनाकर भागलपुर जेल ले गया। दोनों भाईयों को खुलेआम फांसी दे दी गई। सिद्धू को बड़हैत में जिस स्थान पर दरोगा मारा गाया था और कान्हू को भगनाडीह में ही फांसी पर चढ़ा दिया गया। इसके साथ ही संथाल विद्रोह का सशक्त नेतृत्व समाप्त हो गया। धीरे- धीरे विद्रोह को कुचल दिया गया। 30 नवंबर को कानूनन संथाल परगना जिला की स्थापना हुई और इसके प्रथम जिलाधीश के एशली इडेन बनाये गये। पूरे देश से भिन्न कानून से संथाल परगना का शासन शुरू हुआ।
संथाल हूल का तो अंत हो गया। किन्तु दो वर्ष के बाद ही 1857 में होने वाले सिपाही विद्रोह – प्रथम स्वतंत्रता संग्राम - की पीठिका तैयार कर दी गई। आज भी इन चारों भाईयों पर छोटानागपुर को गर्व है और संथाली गीतों में आज भी सिद्धू – कान्हू याद किये जाते हैं। इन शहीदों की जयंती संथाल हूल दिवस के रूप में मनाई जाती है।
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