- सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम, अन्याय के खिलाफ दी थी शहादत
अशोक झा/ कोलकाता: आज मुहर्रम पर कड़ी सुरक्षा के बीच ताजिया निकाला जाएगा। सिलीगुड़ी में मुख्यमार्ग को दोपहर बाद बंद कर दिया जाएगा। जहां अधिकतर धार्मिक पर्व खुशियों और उत्सव का प्रतीक होते हैं, वहीं मुहर्रम इतिहास की एक ऐसी घटना की याद दिलाता है जिसने इस्लामिक दुनिया को गहराई से प्रभावित किया।
इस महीने की 10वीं तारीख, जिसे अशूरा कहा जाता है, विशेष महत्व रखती है। इसी दिन कर्बला की धरती पर पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने अन्याय के खिलाफ लड़ते हुए अपनी शहादत दी थी। यही वजह है कि मुहर्रम को शोक, स्मरण और आत्मचिंतन का समय माना जाता है. दुनिया भर के करोड़ों मुसलमान इस दिन को सम्मान और श्रद्धा के साथ याद करते हैं। मुहर्रम की 10वीं तारीख यानी आशूरा के दिन ताजिये निकाले जाते हैं। ताजिया इमाम हुसैन के मकबरे का वो प्रतीकात्मक मॉडल माना जाता है, जो कर्बला में स्थित है।माना जाता है कि मुहर्रम की 10वीं तारीख को ही पैगंबर मोहम्मद के नवासे यानी नाती इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ शहीद हुए थे। आइए कर्बला के शहीदों के दर्द की कहानी जानते हैं।
इराक के कर्बला में हई जंग की कहानी आज 1346 साल बाद भी सभी की आंखों में पानी ला देती है.। ये जंग सत्ता के मद के सामने अपने सिद्धांतों की रक्षा के लड़ी गई थी। 10 मुहर्रम यानी आशूरा इतिहास का वो पन्ना माना जाता है, जब भूख और प्यास के बावजूद हक की आवाज खामोश नहीं हुई, बल्कि सदा के लिए अमर हो गई. दरअसल, इस्लाम के शुरुआती दौर में नेता यानी खलीफा का चुनाव आपसी सहमति से कर लिया जाता था, लेकिन मुआविया नाम के शासक ने इस नियम को बदल दिया।
इमाम हुसैन ने यजीद की सत्ता को नहीं माना:
मुआविया और हसन इब्न अली का जो शांति समझौता हुआ था, उसने उसको तोड़ दिया, जिसमें साफ कहा गया था कि मुआविया अपने बाद किसी को उत्तराधिकार नहीं सौंपेंगे, लेकिन इसके बाद भी मुआविया ने अपने बेटे यजीद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। यजीद ने पैगंबर मोहम्मद साहब की दी हुई शिक्षाओं के विपरीत भ्रष्टाचार और दमनकारी नीतियां अपनानी शुरू कर दीं। इमाम हुसैन एक बेहद नेक और सम्मानित इंसान थे। उन्होंने यजीद की सत्ता को नहीं माना.
उन्होंने साफ कहा कि वो उस इंंसान की हुकूमत को नहीं मान सकते, जो इस्लाम के बुनियादी उसूलों को ही बदल रहा है। फिर इराक के कूफा शहर के लोगों ने इमाम हुसैन को उनका नेतृत्व करने के लिए बुलाया।इमाम अपने परिवार के 72 साथियों के साथ वहां के लिए निकल पड़े, लेकिन यजीद द्वारा पहले ही एक क्रूर अफसर, उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद को वहां भेजा गया और लोगों को डराया गया।
अपने 72 साथियों के साथ कुर्बानी का रास्ता चुना:
इसका असर ये हुआ कि इमाम को बुलाने वाले लोग ही उनके खिलाफ हो गए. इमाम हुसैन के कर्बला के तपते मैदान में पहुंचते ही उनको यजीद की फौज ने घेर लिया। उसकी फौज द्वारा इमाम के परिवार और मासूम बच्चों के लिए फरात नदी का पानी तक बंद कर कर दिया गया। इसके बाद मुहरर्म की 10वीं तारीख आशूरा को इमाम और उनके 72 साथियों ने कुर्बानी का रास्ता चुना। इस जंग में इमाम के जवान बेटे, उनके भाई और यहां तक कि उनके छह महीने के मासूम बच्चे की भी शहादत हो गई. अंत में इमाम हुसैन की भी शहादत हो गई।
मुहर्रम क्या है और क्यों है खास?: पमुहर्रम इस्लामिक हिजरी कैलेंडर का पहला महीना माना जाता है।इस्लाम में इसे चार पवित्र महीनों में शामिल किया गया है. हालांकि इसका सबसे महत्वपूर्ण दिन अशूरा होता है, जो मुहर्रम की 10वीं तारीख को पड़ता है. इस दिन को केवल एक ऐतिहासिक घटना के कारण ही नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और सिद्धांतों के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान की याद के रूप में भी देखा जाता है. यही कारण है कि मुहर्रम का महत्व धार्मिक सीमाओं से आगे बढ़कर मानवीय मूल्यों से भी जुड़ जाता है।
कर्बला का युद्ध और इमाम हुसैन की शहादत
कैसे शुरू हुआ विवाद?:
इस्लामिक इतिहास के अनुसार, पैगंबर हजरत मोहम्मद के निधन के बाद मुस्लिम समुदाय के नेतृत्व को लेकर अलग-अलग विचार सामने आए. समय के साथ राजनीतिक और धार्मिक मतभेद बढ़ते गए. जब यजीद सत्ता में आया तो उसने लोगों से अपनी बैअत यानी निष्ठा की मांग की, लेकिन हजरत इमाम हुसैन ने इसे स्वीकार नहीं किया. उनका मानना था कि सत्ता का इस्तेमाल न्याय और धर्म के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।
कर्बला में क्या हुआ था?:
680 ईस्वी में वर्तमान इराक के कर्बला क्षेत्र में इमाम हुसैन और उनके सीमित साथियों को यजीद की सेना ने घेर लिया. कई दिनों तक पानी और आवश्यक संसाधनों से वंचित रखने के बाद युद्ध हुआ. इतिहास बताता है कि इस संघर्ष में इमाम हुसैन समेत उनके परिवार और समर्थकों ने शहादत प्राप्त की. यह घटना इस्लामिक इतिहास की सबसे भावनात्मक और महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है. इसी शहादत की याद में अशूरा के दिन मातम मनाया जाता है।
क्यों मनाया जाता है मातम?: मुहर्रम का मातम केवल दुख व्यक्त करने का माध्यम नहीं है. यह अन्याय के खिलाफ संघर्ष, सच्चाई के साथ खड़े रहने और बलिदान को याद करने का प्रतीक भी है. शिया समुदाय विशेष रूप से इस दिन इमाम हुसैन की शहादत को याद करता है. कई स्थानों पर लोग काले कपड़े पहनते हैं, मजलिसों में शामिल होते हैं और कर्बला की घटनाओं का वर्णन सुनते हैं. कुछ जगहों पर ताजिया जुलूस भी निकाले जाते हैं. हालांकि समय के साथ कई धार्मिक विद्वानों ने यह भी कहा है कि आत्म-पीड़ा पहुंचाने की बजाय लोगों को समाज सेवा, रक्तदान और मानवता की सेवा जैसे कार्यों पर ध्यान देना चाहिए, ताकि इमाम हुसैन के संदेश को सकारात्मक रूप से आगे बढ़ाया जा सके।
ताजिया का क्या होता है महत्व?: शहादत की याद का प्रतीक: मुहर्रम के दौरान ताजिया विशेष आकर्षण का केंद्र होता है. यह बांस, कागज और सजावटी सामग्री से बनाया जाने वाला एक प्रतीकात्मक ढांचा होता है, जो कर्बला में मौजूद इमाम हुसैन के रौजे की याद दिलाता है। भारत समेत कई देशों में ताजिया जुलूस निकाले जाते हैं।।लोग श्रद्धा के साथ इसमें भाग लेते हैं और शहादत की याद को जीवित रखते हैं।
शिया और सुन्नी मतभेद से क्या संबंध है?:
इतिहासकारों के अनुसार, पैगंबर मोहम्मद के बाद नेतृत्व के सवाल पर मुस्लिम समुदाय में अलग-अलग विचार उभरे।धीरे-धीरे यही मतभेद शिया और सुन्नी परंपराओं के रूप में विकसित हुए. कर्बला की घटना ने इन मतभेदों को और गहरा प्रभाव दिया. शिया समुदाय इमाम हुसैन की शहादत को अपने धार्मिक इतिहास की केंद्रीय घटना मानता है, जबकि सुन्नी समुदाय भी उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखता है और अशूरा के दिन को विशेष महत्व देता है।
आज के दौर में मुहर्रम का संदेश: मुहर्रम केवल एक ऐतिहासिक घटना की याद नहीं है यह हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों और सच्चाई का साथ नहीं छोड़ना चाहिए. इमाम हुसैन का बलिदान आज भी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने और नैतिक मूल्यों की रक्षा करने की प्रेरणा देता है।
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