- आज का व्रत गुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु दोनों का प्राप्त होगा आशीर्वाद
आज ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाने वाला है।शास्त्रों में इस एकादशी को सबसे बड़ी और अधिक पुण्य देने वाली एकादशी माना गया है।
ऐसे में निर्जला एकादशी और गुरुवार के शुभ संयोग में कुछ उपाय आपके लिए बेहद लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं। इन उपायों को करने से जहां भगवान विष्णु की कृपा आपको प्राप्त होगी वहीं कुंडली में गुरु ग्रह भी मजबूत होंगे। गुरु के मजबूत होने से आपको पारिवारिक जीवन और करियर के क्षेत्र में शुभ परिणाम मिल सकते हैं। आइए जान लेते हैं निर्जला एकादशी और गुरुवार के संयोग में किए जाने वाले इन उपायों के बारे में।
निर्जला एकादशी और गुरुवार के शुभ संयोग में करें ये उपाय:
निर्जला एकादशी के दिन आपको व्रत के साथ ही पीली चीजों का दान भी करना चाहिए। आप पीले वस्त्र, हल्दी, पीली दालें दान कर सकते हैं। इन चीजों का दान करने से कुंडली में गुरु की स्थिति मजबूत होती है और जीवन में आपको शुभ फल प्राप्त होते हैं। गुरु के मजबूत होने से वैवाहिक और प्रेम जीवन में आ रही परेशानियों का हल भी आपको प्राप्त होता है।
निर्जला एकादशी के शुभ दिन पर आपको व्रत के साथ ही केले के पेड़ की पूजा भी करनी चाहिए। केले का संबंध देव गुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु दोनों से है। ऐसे में आपको केले की जड़ पर सबसे पहले जल अर्पित करना चाहिए। इसके बाद आपको घी के तेल का दीपक केले के पास जलाना चाहिए। दीपक जलाने के बाद आपको भगवान विष्णु और गुरु ग्रह के मंत्रों का जप करना चाहिए। ऐसा करने से गुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु दोनों का आशीर्वाद आपको प्राप्त होता है। यह उपाय जीवन की हर परेशानी का अंत कर सकता है।
निर्जला एकादशी के व्रत के दिन गुरुवार है इसलिए विष्णु पूजन के साथ ही गुरु ग्रह के बीज मंत्र 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः' का आपको कम से कम 108 बार जप करना चाहिए। यह उपाय प्रगति के रास्ते आपके लिए खोल सकता है। बीज मंत्र का जप करने से संबंधित ग्रह की ऊर्जा बढ़ती है, ऐसे में अगर आप गुरु ग्रह के मंत्र का जप निर्जला एकादशी और गुरुवार के शुभ संयोग में करेंगे तो गुरु की सकारात्मक ऊर्जा आपके जीवन के अंधकार को दूर कर सकती है।निर्जला एकादशी का व्रत सबसे कठिन माना जाता है, क्योंकि इसमें बिना जल ग्रहण किए व्रत रखना पड़ता है. भक्त इस दिन निर्जला उपवास रखकर विधि-विधान से श्री हरि विष्णु की पूजा किया करते हैं.
धार्मिक मान्यता है कि निर्जला एकादशी का व्रत रखने से सभी 24 एकादशी व्रतों का पुण्य प्राप्त हो जाता है. वहीं जब ये एकादशी अधिकमास में आती है, तो ये व्रत 26 एकादशी व्रतों का पुण्य फल प्रदान करता है. इस साल ज्येष्ठ माह में ही अधिकमास लगा था. ऐसे में कल जो भी लोग निर्जला एकादशी का व्रत करेंगे, उनको 26 एकादशी व्रतों का पुण्य फल प्राप्त होगा. इस दिन पूजा के समय व्रत कथा का पाठ भी अवश्य करें. निर्जला एकादशी की व्रत कथा पांडु पुत्र भीम से जुड़ी है, इसलिए इसको भीम सेनी एकादशी भी कहते हैं, तो आइए पढ़ते हैं निर्जला एकादशी की व्रत कथा।
निर्जला एकादशी की कथा: निर्जला एकादशी की कथा के अनुसार, एक बार वेदव्यास जी से भीमसेन ने कहा कि माता कुंती और मेरे सभी चार भाई व्रत और स्नान-दान करते हैं, लेकिन मैं व्रत नहीं रखता हूं. ऐसे में मुझको पुण्य कैसे प्राप्त होगा. भीम ने व्रत न रख पाने की वजह भी बताई. उन्होंने कहा कि मैं बिना भोजन के नहीं रह सकता हूं. क्योंकि मुझको भूख बहुत अधिक लगती है. तब व्यास जी ने कहा कि तुमको माह की दोनों एकादशी का व्रत रखना ही चाहिए.
इस पर भीम ने कहा कि मेरे लिए बिना भोजन के रह पाना संभव ही नहीं है, क्योंकि मेरे पेट में वृक नामक आग है, जो भोजन किए बिना शांत हो ही नहीं सकती है. उसे शांत करने के लिए मुझको दिनभर में कई बार भोजन करना पड़ता है. उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर व्यास जी से एक ऐसे व्रत के बारे में पूछा, जिसको सालभर में एक ही बार करना पड़े और सभी पाप मिट जाएं. इस पर व्यास जी ने कहा कि ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत एक मात्र ऐसा व्रत है, जो साल में एक बार पड़ता है, जिसे निर्जला एकादशी कहते हैं.
व्यास जी ने भीम से कहा कि इस व्रत में न जल पीना है और न ही अन्न ग्रहण करना है. अगर इस व्रत को तुमने नियमानुसार पूरा कर लिया तो तुमको साल की सभी एकादशी व्रतों का पुण्य और मोक्ष प्राप्त हो जाएगा. इसके बाद ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भीम ने विधि-विधान से निर्जला एकादशी का व्रत किया और भगवान विष्णु की पूजा की. फिर द्वादशी तिथि पर व्रत का पारण किया. इससे उन पर श्रीहरि की कृपा हुई और उनके पाप मिट गए व उनको पुण्य फल प्राप्त हुए।
गुरु ग्रह को घर के बड़े-बुजुर्गों, शिक्षक आदि का कारक माना गया है। इसलिए निर्जला एकादशी और गुरुवार के शुभ संयोग में आपको गुरुजनों और घर के बड़े बुजुर्गों की सेवा करनी चाहिए। उनके साथ कुछ समय आपको बिताना चाहिए और हो सके तो उनके पसंद की कोई चीज आप उनको उपहार के रूप में दे सकते हैं। ऐसा करने से गुरु प्रसन्न होकर आपकी दुख-विपदाओं को दूर कर सकते हैं। ( पंडित अशोक झा की कलम से )
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