- पूरे मंदिर परिसर में भक्ति, साधना और आध्यात्म का अनोखा माहौल
- यहां बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी हो जाता है लाल रंग, मूर्ति नहीं होती है योनि रूपी शिला की पूजन
अशोक झा/ गौहाटी: असम के कामाख्या मंदिर में लगने वाला अंबुबाची मेला देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में प्रसिद्ध है। हर साल यहां लाखों श्रद्धालु, साधु-संत और तांत्रिक पहुंचे हैं। तो चलिए आपको बताते हैं कि इस बार अंबुबाची मेले का आयोजन कब किया जाएगा। कामाख्या देवी मंदिर को 51 शक्तिपीठों में विशेष स्थान प्राप्त है। यह मंदिर असम के गुवाहाटी शहर की नीलांचल पहाड़ियों पर स्थित है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां किसी देवी की प्रतिमा नहीं पूजी जाती। यहां योनि आकार की एक शिला की पूजा होती है, जिसे स्त्री शक्ति और सृष्टि के स्रोत का प्रतीक माना जाता है।मान्यता के अनुसार अंबुबाची मेले के दौरान मां कामाख्या रजस्वला होती हैं। इसी वजह से मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। इस दौरान किसी प्रकार की पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान नहीं किए जाते।भक्त इसे देवी के विश्राम का समय मानते हैं। चौथे दिन विशेष शुद्धिकरण अनुष्ठान के बाद मंदिर के द्वार खोले जाते हैं और श्रद्धालु देवी के दर्शन करते हैं। इस बार अंबुबाची मेले का आयोजन अगले महीने 22 जून से 26 जून 2026 तक किया जाएगा। अंबुबाची मेले से जुड़ी एक खास मान्यता यह भी है कि इन दिनों पास बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल रंग का दिखाई देता है। भक्त इसे देवी के रजस्वला होने का संकेत मानते हैं. मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को 'अंगवस्त्र' के रूप में लाल कपड़े का टुकड़ा दिया जाता है, जिसे देवी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। अंबुबाची मेले को दुनिया का सबसे बड़ा तांत्रिक मेला भी कहा जाता है। इस दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से साधु-संत और तांत्रिक कामाख्या मंदिर पहुंचते हैं और विशेष तंत्र साधना करते हैं।पूरे मंदिर परिसर में भक्ति, साधना और आध्यात्म का अनोखा माहौल देखने को मिलता है।गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में हर साल अंबुबाची मेले के दौरान एक अनोखी घटना होती है। जब ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल दिखाई देता है। इसे देवी के मासिक धर्म से जोड़ा जाता है। इस रहस्य के पीछे आस्था, परंपरा और विज्ञान, तीनों की अलग-अलग मान्यताएं हैं।
मन्नत मांगने और पूरी होने पर उड़ाते हैं कबूतर: कामाख्या मंदिर में लोग मन्नत मांगने या पूरी होने पर कोई भेंट देने के रूप में यहां कबूतर उड़ाते हैं और बकरा छोड़ते हैं. इस तरह ये दोनों जीव देवी को ही अर्पित कर दिए जाते हैं, जिसे जीवित अर्पण या जीवित बलि कहते हैं। इस बलि में कोई खून नहीं बहता है, कोई कष्ट नहीं होता और हिंसा नहीं होती है। इसलिए कामाख्या मंदिर जो कई तांत्रिक परंपराओं और बलि का गढ़ है, वहां ऐसी अहिंसक बलि भी एक सच है।
कबूतर उड़ाकर विकार समर्पण का प्रतीकवाद और मानवता: कहते हैं कि कबूतर हमारे लालच, हमारे विकारों का प्रतीक है. हमारे घमंड के ऊंचे आसमान पर उड़ान भरता पक्षी है. कबूतर उड़ाकर अपने सभी विकार देवी को समर्पित कर दिए जाते हैं. एक लोककथा है कि किसी दंपती ने माता से संतान का आशीर्वाद मांगा और मनौती मानी. इसके बाद जब उस दंपती को संतान हुई तब वह अपनी मनौती पूरी होने के बाद मंदिर में कपोत बलि (कबूतर की बलि) देने आए. इस दौरान कबूतर के साथियों और उनके बच्चों की आवाज से पूरा परिसर गूंज उठा. यह देखकर दंपति का कलेजा भर आया और उनकी आंख से आंसू निकल आए। इसके बाद उन्होंने कबूतर की बलि देने का विचार छोड़ दिया और उसे माता को समर्पित करते हुए ऐसे ही उड़ा दिया. इसके बाद से यह एक परंपरा बन गई, जहां लोग अभी भी कबूतर उड़ाते हैं. मान्यता है कि पक्षियों को आज़ाद करना पुण्य का कार्य है और इससे देवी की कृपा प्राप्त होती है. कुछ लोग इसे बंधनों, कष्टों या नकारात्मकता से मुक्ति का प्रतीक भी मानते हैं। कबूतर से जुड़ी मान्यताएं: माना जाता है कि कबूतर आपके शरीर से सारी नेगेटिविटी और सारी बाधाएं, रोग आदि अपने साथ ले जाते हैं. किसी बीमार व्यक्ति के कमरे के बाहर कहीं कबूतर कुछ देर बैठे और फिर उड़ जाए तो ऐसा माना जाता है कि कबूतर उसका रोग उड़ाकर ले गया है.
सनातनी धार्मिक परंपराओं में कबूतर को कामदेव के साथ जुड़ा हुआ बताते हैं. कबूतर और कामदेव का संबंध प्रेम, संदेश और पौराणिक मान्यता से सामने आता है. हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कबूतर को प्रेम और वासना के देवता कामदेव और उनकी पत्नी देवी रति का प्रिय पक्षी या वाहन (सवारी) माना गया है।प्राचीन काल से ही कबूतरों का इस्तेमाल प्यार, लगाव और प्रेम पत्र एक जगह से दूसरी जगह भेजने के लिए किया जाता रहा है।कामदेव भी प्रेमियों के बीच अपने संदेश भेजने के लिए कबूतरों का उपयोग करते थे। यह प्रतीकवाद केवल भारतीय संस्कृति तक ही सीमित नहीं है।प्राचीन ग्रीक और रोमन पौराणिक कथाओं में भी, प्रेम की देवी वीनस (या एफ़्रोडाइट) को सफेद कबूतरों के साथ जोड़ा जाता है, जो प्यार, प्रजनन और कामुकता का प्रतीक है। वहीं कामाख्या मंदिर में बकरों की परंपरा भी ऐसी ही है. लेकिन कुछ श्रद्धालु बलि देने के बजाय बकरा देवी को समर्पित कर उसे जीवित छोड़ देते हैं। ऐसे बकरों को मंदिर परिसर या आसपास स्वतंत्र रूप से घूमते देखा जा सकता है।इसे देवी को अर्पण और पशु-जीवन की रक्षा, दोनों का प्रतीक माना जाता है।कई लोग मानते हैं कि मनोकामना पूरी होने पर बकरे को छोड़ना भी एक प्रकार का धार्मिक व्रत पूरा करना है।
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