*बेहद दर्दनाक असंवैधानिक घटना*
*भरत तिवारी* कोई अपराधी नहीं था,कोई उग्रवादी नहीं था। वह एक सजग, पढ़ा-लिखा और समाज की फिक्र करने वाला नौजवान था। उसका “जुर्म” सिर्फ इतना था कि उसकी रीढ़ की हड्डी सीधी थी और उसने #सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछने की हिम्मत की। लेकिन इस अहंकारी व्यवस्था को सच बर्दाश्त नहीं हुआ। सच बोलने वाली उस मुखर आवाज को हमेशा के लिए खामोश कर दिया गया।
एक मां का कलेजा फट गया है, पिता टूट चुके हैं। आज एक बेटे को खोने का यह असहनीय दर्द सिर्फ उस अभागे परिवार का नहीं है, बल्कि हर उस नागरिक का है जो खुद को इस लोकतांत्रिक देश का हिस्सा मानता है।
भरत तिवारी की बिलखती मां का यह बयान रूह कंपा देने वाला है:
"मेरे सामने 4 गोली पैर में मारा गया... फिर गाड़ी के अंदर ले जाकर 1 गोली पेट में ठोक दी..."
सोचिए, उस मां पर क्या गुजरी होगी जिसने अपने बेटे को अपनी आंखों के सामने पुलिस की बर्बरता का शिकार होते देखा। क्या पुलिस का काम रक्षा करना है या किसी की आवाज उठाने पर कसाई बन जाना?
पहले पैर में गोलियां मारकर उसे लाचार किया गया, और फिर गाड़ी के अंदर बेरहमी से पेट में गोली मार दी गई। यह मुठभेड़ नहीं, यह सरेआम की गई हत्या है!
अगर आज हम इस खौफनाक सितम पर चुप रह गए, तो याद रखिए, कल आपके और हमारे बच्चों को भी व्यवस्था के खिलाफ बोलने पर “पागल” घोषित कर दिया जाएगा। हर सच बोलने वाली आवाज को इसी तरह सत्ता के बूटों तले कुचल दिया जाएगा।
बिहार पुलिस और वहां के प्रशासन की इस दरिंदगी ने पूरे देश का कानून और न्याय पर से विश्वास हिलाकर रख दिया है। अपराधियों के आगे घुटने टेकने वाली पुलिस निहत्थे सवाल पूछने वालों पर शूरवीर बन रही है। इस अमानवीय कृत्य में शामिल हर एक पुलिस अधिकारी और इसके पीछे बैठे सफेदपोश आकाओं पर हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
यह लड़ाई अब सिर्फ भरत तिवारी के परिवार की नहीं है
यह हमारे मौलिक अधिकारों, हमारे वजूद, हमारे लोकतंत्र और हमारी आने वाली नस्लों की आवाज को जिंदा रखने की लड़ाई है। जागिए, इससे पहले कि अगली गोली आपके सवाल पर चले!
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