न 'ऑपरेशन लोटस' चला न 'महाराष्ट्र फॉर्मूला', फिर किसने तृणमूल को "तृण-मूल" बना मिट्टी में मिलाया?
जून 09, 2026
0
- ऑपरेशन बंगाल' के इस खेल के पीछे 3 दिग्गजों की कहानी
अशोक झा/ कोलकाता : जो दिल्ली कभी ममता के समर्थक सांसदों और नेताओं की भीड़ से गुलजार रहती थी, वहां इस बार उनके साथ केवल कुछ चुनिंदा चेहरे ही दिखाई दिए. यह बदलाव महज संयोग नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती बेचैनी और असंतोष का संकेत माना जा रहा है.
एक समय था जब दिल्ली में ममता बनर्जी की मौजूदगी का मतलब होता था कि टीएमसी सांसदों और नेताओं का पूरा जत्था उनके आसपास दिखाई दे. पार्टी सांसद उनके साथ बैठकों में शामिल होने और सार्वजनिक रूप से समर्थन जताने को उत्सुक रहते थे. लेकिन इस बार तस्वीर अलग थी. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन के अलावा शायद ही कोई बड़ा चेहरा उनके साथ नजर आया. अभिषेक अपनी बुआ यानी ममता दीदी के दिल्ली दौरे से दो दिन पहले ही दिल्ली आ गए थे. उन्होंने यहां तमाम सांसदों से संपर्क करने की कोशिश थी. चीजों को व्यवस्थित करने की कोशिश की लेकिन अधिकतर सांसदों को फोन बंद मिले, किसी ने कोई रिटर्न कॉल नहीं किया.
सबसे बड़ा झटका तब लगा जब वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने दावा किया कि करीब 20 टीएमसी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर एनडीए का समर्थन करने की इच्छा जताई है. उन्होंने पार्टी के भीतर एक विद्रोही गुट के गठन की भी घोषणा की. हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन इसने राजनीतिक हलकों में हलचल जरूर बढ़ा दी है। पश्चिम बंगाल की सियासत में सोमवार को जो हुआ, उसने भारतीय राजनीति के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। देश की राजनीति में इस वक्त सबसे बड़ा भूचाल पश्चिम बंगाल से आया है, जहां ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) ताश के पत्तों की तरह बिखरे जाने की कगार पर पहुंच गई है। चुनाव नतीजों के महज एक महीने के भीतर जोड़ा फूल के कई बड़े चेहरों ने बगावत का बिगुल फूंक दिया है। दिलचस्प बात यह है कि इस टूट के पीछे न तो बीजेपी का पुराना ‘ऑपरेशन लोटस’ है और न ही शिवसेना-एनसीपी को तोड़ने वाला ‘महाराष्ट्र मॉडल’। सवाल तो फिर कैसे टीएमसी इस तरह बिखर गई। यह सबके मन में सवाल है।
क्या खत्म होने वाला है तृणमूल कांग्रेस का वजूद बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व का दावा- बंगाल में तानाशाही शासन का अंत करने के लिए सांसद खुद आ रहे साथ। बंगाल में कौन सा चला मॉडल? सवाल उठना जायज भी है, क्योंकि भारतीय राजनीति में पिछले कुछ सालों के भीतर ‘ऑपरेशन लोटस’ शब्द विपक्षी दलों के लिए सबसे बड़ा खौफ बन चुका है। कर्नाटक से लेकर मध्य प्रदेश और फिर महाराष्ट्र में शिवसेना को तोड़कर बनाया गया ‘शिंदे फॉर्मूला’ इस रणनीति का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। देश के किसी भी राज्य में जब कोई पार्टी टूटती है या सरकार गिरती है, तो इसका सीधा ठीकरा बीजेपी के कथित ‘ऑपरेशन’ पर फोड़ दिया जाता है। लेकिन इस वक्त पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मची भयंकर बगावत ने एक नए ‘ऑपरेशन’ मॉडल को जन्म दिया है, जो महाराष्ट्र या अन्य राज्यों के पुराने ढर्रे से बिल्कुल जुदा है।
बंगाल में भी महाराष्ट्र वाला खेला, ममता के हाथ से छिन जाएगी TMC की कमान?लो जी, दीदी के साथ ही हो गया 'खेला'! 60 विधायकों का टूटना तय! TMC का कौन बनने जा रहा नया अध्यक्ष? अब पार्टी और चुनाव निशान पर बागियों की नजर। बंगाल में क्यों बदले सारे समीकरण?
विपक्ष का आरोप है कि बंगाल में भी महाराष्ट्र वाला मॉडल ही दोहराया जा रहा है, लेकिन मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने इस बात को पूरी तरह खारिज कर दिया है.। बीजेपी सूत्रों का कहना है कि बंगाल का समीकरण बिल्कुल अलग है। यहाँ बीजेपी के पास पहले से ही एक मजबूत आधार और विपक्ष की बड़ी ताकत है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी सत्ता में रहते हुए टूटी थीं, जबकि बंगाल में चुनाव के तुरंत बाद टीएमसी के भीतर का आंतरिक असंतोष और जनता का भारी आक्रोश फूट पड़ा है, जिससे पार्टी खुद ब खुद बिखरने लगी है। टीएमसी के बागी सांसदों का रुख
मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, सोमवार को दिल्ली में टीएमसी की वरिष्ठ सांसद काकली घोष दस्तीदार और बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बागी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर जो बैठक की, उसने साफ कर दिया कि यह बगावत किसी बाहरी दबाव में नहीं बल्कि पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी और ममता बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ एक सोची-समझी बगावत है। बीजेपी सूत्रों का दावा है कि बंगाल में किसी को ‘तोड़ने’ की जरूरत ही नहीं पड़ी, बल्कि टीएमसी के ही कद्दावर नेता खुद एनडीए के पाले में आने को बेताब दिखे।
‘ऑपरेशन बंगाल’ का नया मॉडल
बीजेपी के एक शीर्ष केंद्रीय नेता ने स्पष्ट किया है कि ‘ऑपरेशन बंगाल’ दरअसल जनभावनाओं का आदर करने का मॉडल है। बंगाल की जनता तृणमूल कांग्रेस के कथित कुशासन से त्रस्त हो चुकी थी और राज्य में ‘डबल इंजन’ की सरकार चाहती थी। इसी वजह से चुनाव के महज एक महीने के भीतर टीएमसी के संसदीय दल में यह ऐतिहासिक दो फाड़ देखने को मिल रहा है। इस बार बीजेपी ने किसी को गुवाहाटी या सूरत के होटलों में नहीं छिपाया, बल्कि टीएमसी के बागी नेताओं ने खुद सीधे दिल्ली आकर केंद्रीय नेतृत्व और बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ खुली बैठक की है। दिल्ली की सियासी गलियारों में इस नई उठापटक को ‘ऑपरेशन बंगाल’ का नाम दिया गया है, जिसने टीएमसी के संसदीय दल को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है.
दिल्ली में अचानक हुआ बड़ा खेला?
दिल्ली के बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों को भी भनक नहीं थी कि बंगाल में बगावत की जो चिंगारी सुलगी थी, वो दिल्ली आकर इतनी बड़ी आग बन जाएगी। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के दिल्ली स्थित आवास 9 मोतीलाल नेहरू मार्ग पर अचानक टीएमसी के बागी सांसदों का जमावड़ा शुरू हो गया. किसी को अंदाजा नहीं था कि ये बागी नेता वहां पहुंच रहे हैं. इसी बैठक के बीच में अचानक बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी वहां पहुंच गए और बागी सांसदों के साथ आधे घंटे से ज्यादा समय तक बंद कमरे में सीक्रेट मीटिंग की। इस मुलाकात ने ममता बनर्जी की नींद उड़ा दी है।
पर्दे के पीछे के तीन बड़े सिकंदर: मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, बीजेपी सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे ‘ऑपरेशन बंगाल’ की कमान पर्दे के पीछे से बीजेपी के तीन हैवीवेट केंद्रीय नेताओं के हाथों में थी। उन्होंने इस पूरे ऑपरेशन को इतनी गोपनीयता से अंजाम दिया कि विरोधी खेमे के किसी भी जासूस को कानों-कान खबर तक नहीं हुई। इन तीनों रणनीतिकारों ने केवल टीएमसी के अंदरूनी कलह को सही रास्ता दिखाने का काम किया। कोलकाता में इस बगावत की शुरुआत टीएमसी विधायक और विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने की थी, जिसे दिल्ली लाकर वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पूरी तरह अंजाम तक पहुंचा दिया। क्या दीदी खो देंगी पार्टी का नाम-सिंबल?: पार्टी में इस ऐतिहासिक टूट के बाद अब बागी गुट के भीतर इस बात की जोर-शोर से तैयारियां चल रही हैं कि क्या वे असली टीएमसी होने का दावा ठोकेंगे? मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, अब सबसे बड़ा खतरा इस बात का है कि कहीं ममता बनर्जी के हाथ से उनकी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह ‘जौड़ा फूल’ भी न निकल जाए. बागी खेमे के पास पर्याप्त संख्या में सांसदों और विधायकों का समर्थन होने का दावा किया जा रहा है। अगर ऐसा होता है, तो शरद पवार और उद्धव ठाकरे की तरह ममता बनर्जी को भी अपनी ही बनाई पार्टी से हाथ धोना पड़ सकता है।
Tags

दुनियाभर के घुमक्कड़ पत्रकारों का एक मंच है,आप विश्व की तमाम घटनाओं को कवरेज करने वाले खबरनवीसों के अनुभव को पढ़ सकेंगे
https://www.roamingjournalist.com/