- पृथ्वी की हरियाली सिमटने लगे, नदियों का निर्मल जल विषाक्त होने लगे
- वायुमंडल का संतुलन डगमगाने लगे और ऋतुओं का शाश्वत संगीत असंगति में बदलने लगे
- मानव सभ्यता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां विकास और विनाश के बीच की रेखा अत्यंत सूक्ष्म हो गई
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: आज विश्व पर्यावरण दिवस है। आज हमारे बच्चों को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है। कभी उत्तरबंगाल को चेरापूंजी के नाम से जाना जाता था। आज कंक्रीट के जंगल में ऐसी और अस्पतालों में ऑक्सीजन से लोग अपनी सांसे बचाने में लगे है।जब पृथ्वी की हरियाली सिमटने लगे, नदियों का निर्मल जल विषाक्त होने लगे, वायुमंडल का संतुलन डगमगाने लगे और ऋतुओं का शाश्वत संगीत असंगति में बदलने लगे, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव सभ्यता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां विकास और विनाश के बीच की रेखा अत्यंत सूक्ष्म हो गई है। प्रकृति केवल मानव जीवन की पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व की आधारशिला है। मनुष्य जिस वायु में सांस लेता है, जिस जल से जीवन प्राप्त करता है, जिस भूमि पर अपने सपनों का संसार रचता है और जिस जैव विविधता से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, वह सब पर्यावरण का ही अमूल्य उपहार है। “माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः।” अर्थात् यह भूमि हमारी माता है और हम इस पृथ्वी के पुत्र हैं।इसी सत्य को स्मरण कराने और वैश्विक समुदाय को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। यह दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि पृथ्वी के प्रति मानवता की सामूहिक जिम्मेदारी का स्मरण-पर्व है। आज जब जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वनों की कटाई और जैव विविधता के संकट जैसे प्रश्न मानव अस्तित्व को चुनौती दे रहे हैं, तब विश्व पर्यावरण दिवस का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। यह वसुंधरा के मौन क्रंदन को सुनने, अपनी जड़ों की ओर लौटने और मानवता को आत्मनिरीक्षण की कसौटी पर कसने का महा-अनुष्ठान है।
विश्व पर्यावरण दिवस का इतिहास
विश्व पर्यावरण दिवस की पृष्ठभूमि बीसवीं शताब्दी के उस दौर से जुड़ी है जब औद्योगिकीकरण और तीव्र आर्थिक विकास के दुष्प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे थे। वर्ष 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में United Nations Conference on the Human Environment का आयोजन हुआ। यह सम्मेलन मानव और पर्यावरण के संबंधों पर आयोजित पहला वैश्विक सम्मेलन था। इसी सम्मेलन के दौरान पर्यावरण संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय एजेंडा का महत्वपूर्ण विषय बनाया गया। बाद में United Nations ने 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया और वर्ष 1973 से इसका आयोजन प्रारंभ हुआ। तब से यह दिवस विश्व के 150 से अधिक देशों में पर्यावरणीय चेतना के सबसे बड़े जन-अभियान के रूप में मनाया जा रहा है।
पर्यावरण : जीवन का आधार
पर्यावरण शब्द का अर्थ है, वह समग्र परिवेश जो किसी जीव को चारों ओर से घेरे रहता है। इसमें प्राकृतिक तथा मानव-निर्मित दोनों प्रकार के तत्व सम्मिलित होते हैं। पृथ्वी का पर्यावरण एक विराट जीवंत तंत्र है जिसमें वायु, जल, भूमि, वनस्पति, वन्यजीव, सूक्ष्मजीव और मानव समाज परस्पर जुड़े हुए हैं। इनमें से किसी एक तत्व में असंतुलन उत्पन्न होने पर संपूर्ण पारिस्थितिकी व्यवस्था प्रभावित होती है। प्रकृति की यह व्यवस्था एक सिम्फनी की भांति है, जिसमें प्रत्येक घटक अपनी भूमिका निभाता है। यदि एक भी स्वर बिगड़ जाए तो संपूर्ण संगीत असंतुलित हो जाता है।
वर्तमान वैश्विक पर्यावरणीय संकट
आज जलवायु परिवर्तन मानवता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग, औद्योगिक उत्सर्जन और वनों की अंधाधुंध कटाई ने वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ा दी है। परिणामस्वरूप पृथ्वी का औसत तापमान निरंतर बढ़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, चक्रवातों और बाढ़ की तीव्रता बढ़ रही है तथा सूखा और गर्मी की लहरें सामान्य होती जा रही हैं। प्रकृति मानो मानव की अनियंत्रित महत्वाकांक्षाओं का मूल्य चुका रही है। वास्तव में प्रकृति पर मनुष्य के आक्रमण का काल है।
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