- 28 साल में सबसे बड़ा धमाका करने वाले बने नेता, माकपा और टीएमसी दोनों से निष्कासित इकलौते है 'चाणक्य'
अशोक झा/ कोलकाता: बंगाल की सियासत में पिछले 28 सालों का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक भूचाल लाने वाले चेहरे का नाम सामने आ चुका है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) में भीषण बगावत के बीच पार्टी से निष्कासित नेता ऋतुब्रत बनर्जी अब बंगाल के 'एकनाथ शिंदे' बनकर उभरे हैं। बुधवार को टीएमसी के 58 बागी विधायकों ने ऋतुब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया है।
स्पीकर रथिंद्र बोस से मिले बागी विधायक:
बागियों के इस गुट ने विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस से मुलाकात कर उन्हें अलग विधायक दल के रूप में मान्यता देने की आधिकारिक चिट्ठी भी सौंप दी। उन्हें अनुमति भी मिल गई। विधायकों की सहमति से वे विरोधी दल के नेता बने है।
कभी ममता बनर्जी की राजनीति में रूसी क्रांति के नायक व्लादिमीर लेनिन की झलक देखने वाले ऋतुब्रत आज खुद 'दीदी' के राजनीतिक साम्राज्य को ढाहने वाले सबसे बड़े विद्रोही बन गये हैं।
माकपा और टीएमसी दोनों से निष्कासित इकलौते : 'चाणक्य': रीतब्रत बनर्जी का राजनीतिक सफरनामा जितना दिलचस्प है, उतना ही विरोधाभासों से भी भरा है. वे संभवतः बंगाल के इतिहास के इकलौते ऐसे बड़े नेता हैं, जिन्हें वामपंथी पार्टी सीपीएम (CPIM) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) दोनों ही विचारधाराओं ने अपनी पार्टी से धक्के मारकर निकाला, लेकिन आज वे दोनों को पछाड़कर विपक्ष के सबसे बड़े नेता बन गये हैं.
ममता को बताते थे जनहितैषी: ऋतुब्रत बनर्जी (46) ने कभी सार्वजनिक रूप से कहा था कि ममता बनर्जी को लाखों लोगों के बीच जमीन पर काम करते देखकर ही उन्हें जनहितैषी राजनीति पर लेनिन का प्रसिद्ध कथन समझ आया था. आज ठीक उसके उलट रीतब्रत ने ममता बनर्जी की नाक के नीचे से 58 विधायकों को तोड़कर तृणमूल के इतिहास की सबसे बड़ी बगावत को अंजाम दिया, जिसने महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन की यादें ताजा कर दी।
एसएफआई के पोस्टर बॉय से राज्यसभा और 'लक्जरी लाइफ' का विवाद:
धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने और टेलीविजन बहसों में विरोधियों के छक्के छुड़ाने वाले ऋतुब्रत बनर्जी का छात्र राजनीति से लेकर इस विद्रोही नेता बनने तक का सफर बेहद नाटकीय है।
बुद्धदेव और येचुरी के दुलारे थे ऋतुब्रत: वर्ष 2008 में एसएफआई (SFI) के महासचिव के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले रीतब्रत को पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य और सीताराम येचुरी का बेहद करीबी माना जाता था. इसी रसूख के कारण माकपा ने उन्हें महज 35 साल की उम्र में वर्ष 2014 में राज्यसभा भेज दिया था, जिससे अलीमुद्दीन (माकपा मुख्यालय) के कई वरिष्ठ नेता नाराज हो गये थे।
ऋतुव्रत लग्जरी लाइफ और निष्कासन: खुद को कम्युनिस्ट कहने वाले रीतब्रत की लक्जरी लाइफस्टाइल (महंगे शौक) पर जब उनकी ही पार्टी के साथियों ने सवाल उठाये, तो वर्ष 2017 में माकपा ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया. माकपा से निकलने के बाद वे मुकुल रॉय और कैलाश विजयवर्गीय जैसे भाजपा नेताओं के करीब आये. हालांकि, एक महिला से जुड़े मामले के बाद उन्होंने अपना पैंतरा बदला और वर्ष 2020 में औपचारिक रूप से टीएमसी का दामन थाम लिया था।
ममता के चक्रव्यूह को तोड़ेगा रीतब्रत का मास्टरस्ट्रोक!
बुधवार को ममता बनर्जी द्वारा पार्टी की सभी कमेटियां भंग किये जाने और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम के इस्तीफे के बीच रीतब्रत बनर्जी का बागी गुट का मुखिया बनना टीएमसी के ताबूत में आखिरी कील माना जा रहा है. 58 विधायकों का यह आंकड़ा विधानसभा में टीएमसी को दोफाड़ करने के लिए कानूनी रूप से पूरी तरह मजबूत है।
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