बंगाल में भाजपा का शपथ ग्रहण समारोह इस मामले में ऐतिहासिक रहा कि पहली बार किसी सीएम ने ब्रिगेड परेड ग्राउंड में शपथ ली है। शायद ही कोई पीएम बंगाल के किसी सीएम की शपथ में शामिल हुआ हो. यह भी कि भाजपा शासित राज्यों के 20 मौजूदा मुख्यमंत्री और केंद्र के टाप मंत्रालयों के प्रधान पहुंचे हों। यह भाजपा के लिए सुखद स्थिति है।पर, चौथी बार सत्ता पाने से चूकीं ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए यह मारक माजरा है। भाजपा से टीएमसी के हारते ही उनके और आने वाले समय के संभावित सीएम भतीजे अभिषेक बनर्जी के घरों को विशेष सुरक्षा सुविधा से वंचित कर दिया गया।
4 मई की दोपहर तक टीएमसी का सपोर्टर बन कर ममता के लिए जान देने का डंका पीटने वाले लोग शाम होते-होते अचानक पलटी मारने लगे। हालत यह हो गई कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य को सार्वजनिक तौर पर घोषणा करनी पड़ी कि ऐसे लोगों को आज ही (4 मई) पहचान कर निकाल बाहर करेंगे।।
समर्थक छोड़ने लगे हैं ममता का साथ: टीएमसी के प्रवक्ता रिजू दत्ता समेत पार्टी के जिन 5 नेताओं को शो काज दिया गया है, उनका दोष सिर्फ इतना है कि उन्होंने हार के बाद असलियत बताई थी और भाजपा के प्रति उनकी सहानुभूति परोक्ष तौर पर साफ झलकती थी. हां, इनके बयानों की खास बात यह रही कि सबने ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी पर सीधा निशाना साधा. ममता को कुछ ने इसलिए कोसा कि वे 'धृतराष्ट्र' की सब कुछ देखतीं रहीं. ममता बनर्जी से अब तक जो लोग अलग हुए हैं, तकरीबन सभी का यह आरोप रहा है कि वे अपने भतीजे को आगे बढ़ा रही हैं. उसके हर गलत-सही काम पर ममता चुप्पी साध लेती हैं. हुमायूं कबीर को पहली बार टीएमसी से इसलिए निकाला गया था, क्योंकि उन्होंने अभिषेक बनर्जी को लेकर तिलमिलाने वाली टिप्पणी कर दी थी।
ममता 'दीदी' की पार्टी में सुलगी बगावत की आग:
कालांतर में और भी कई लोगों ने टीएमसी को अविदा कहा. जाहिरा तौर पर उनके मन में भी कोई खटास रही ही होगी. आज बीजेपी बंगाल में मजबूत स्थिति में है तो इसके पीछे टीएमसी से आए शुभेंदु अधिकारी जैसे नेता ही हैं, जो ममता की तुगलकी फरमान और भतीजे के उत्थान के लिए उनके प्रयासों से चिढ़े हुए थे. अभी जिन 5 लोगों को टीएमसी ने शो काज दिया है, उनका दोष भी यही है कि उन्होंने ममता के राजनीतिक निर्णयों पर सवाल उठाया है. अब तो पार्टी ने रिजू दत्ता समेत इन सभी को निकाल भी दिया है।
MP-MLA के पाला बदलने की चर्चा: चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद ममता ने अपने आवास पर नवनिर्वाचित टीएमसी विधायकों की बैठक बुलाई. समय की संवेदनशीलता को जानने-समझने के बावजूद 10 विधायकों ने दूरी बना ली. उन्होंने इसकी गंभीरता को भी तवज्जो नहीं दी कि बैठक पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने बुलाई है. इससे सोशल मीडिया में चल रही इस चर्चा को बल मिला है कि आने वाले समय में टीएमसी के कई सांसद-विधायक पाला बदलने वाले हैं। चर्चा तो यह भी है कि टीएमसी सांसदों का एक बड़ा वर्ग जल्द ही पार्टी को बाय बोलने वाला है. ममता भी अपनी कमजोर स्थिति से अनजान नहीं हैं। शायद यही वजह है कि चुनाव में टीएमसी की हार के बाद उन्हें अब वामपंथियों और कांग्रेस के साथ की जरूरत महसूस हो रही है उन्होंने सभी से भाजपा को परास्त करने के लिए एक साथ आने की अपील की है. जिस ममता ने उपचुनाव में जीते कांग्रेस के एकमात्र विधायक को तोड़ लिया, वामपंथी तो उन्हें फूटी आंख नहीं सुहाते. अब उनके साथ की ममता को जरूरत महसूस हो रही है।
ममता बनर्जी 15 साल तक पश्चिम बंगाल की सीएम रही,
सोशल मीडिया पर गॉसिप शुरू
अब सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि टीएमसी के कई सांसद-विधायक भाजपा की ओर रुख कर सकते हैं. पिछले पैटर्न देखें तो 2019-2021 के चुनाव के दौरान भी बड़े पैमाने पर टीएमसी से भाजपा में नेता/ काउंसिलर गए थे। इस बार टीएमसी की हार के बाद फिर ऐसी अफवाहें तेज हैं. कुछ विधाक पहले ही संकेत दे चुके हैं. भाजपा की तरफ से अभी सावधानी बरती जा रही है, लेकिन लॉयल्टी साबित करने वालों के लिए दरवाजे खुल सकते हैं.
सिलीगुड़ी और KMC के वार्डों में TMC हुई कमजोर:
राज्य की सत्ता ममता बनर्जी से छिन गई है
केंद्र में राजसुख की कोई गुंजाइश भी नहीं है. अब तो भाजपा भी इन्हें नहीं पूछेगी. इसलिए कि इनके ही खिलाफ लड़ कर ही भाजपा ने सत्ता हासिल की है. लोगों को ममता से मुक्ति का भरोसा देकर ही भाजपा ने उनका मत हासिल किया है. ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी की तरह भाजपा के उदार होने की तो कम से कम 5 साल तक उम्मीद की ही नहीं जा सकती. उसके बाद अगर स्थिति अनुकूल हुई भी तो भाजपा ममता की टीएमसी को अटल जी की तरह ही एनडीए का हिस्सा बना सकती है. पर, यह आसान नहीं दिखता. इसके लिए उन्हें नीतीश कुमार, चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी की तरह एनडीए के प्रति पहले लायल्टी सिद्ध करनी होगी.
'दीदी' के नाव से कौन-कौन कूद सकते हैं?:
विधानसभा चुनाव में हार के बाद कोलकाता म्यूनिसिपलकॉर्पोरेशन (KMC) जैसे स्थानीय निकायों में भी TMC का आधार सिकुड़ सकता है. राज्य की सत्ता हाथ से निकलने के बाद कार्पोरेशन चुनाव में टीएमसी की बदहाली की आशंका बढ़ गई है. इस साल के विधानसभा चुनाव में केएमसी के कुल 144 वार्डों में करीब 100 पर भाजपा की बढ़त देखने को मिली है। बंगाल की सियासत ऐसे ही बदलती है:
बंगाल की सियासत का यही सिलसिला आजादी के बाद से अब तक अनवरत जारी है. कांग्रेस से निकल कर ममता ने टीएमसी बनाई और कांग्रेस छोड़ने वालों को साथ जोड़ा. वाम के अलग-अलग घटक- सीपीआईएम, सीपीआई, आर इंडिया फारवर्ड ब्लाक वगैरह एकजुट हुए, जिनके कैडर कांग्रेसी और समाजवादी दलों से ही थे. बंगाल में जब-जब सत्ता बदली, पाला बदल या साथ छोड़ने की आंधी भी चली. वामपंथी भी बदले. शुभेंदु अधिकारी टीएमसी छोड़ कर भाजपा के साथ आए.
मुकुल रॉय और राजीब बनर्जी भी टीएमसी से भाजपा में गए. यही नहीं, जब वाम मोर्चा से टीएमसी ने सत्ता छीनी, तब वाम दलों के कई नेता भी उसके साथ हो गए थे. यह परंपरा जारी है. जब-जब सत्ता बदली कांग्रेस से वाम, वाम से TMC और अब TMC से BJP में कार्यकर्ता और नेता नई ताकत के साथ जुड़ते गए।
घोर विरोधी दलों के साथ भी समझौता करने को ममता तैयार :
ममता ने संकेत दिए हैं कि भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए उन्हें वामदलों और यहां तक कि धुर-वामपंथियों से भी परहेज नहीं है। उनका यह बयान न केवल बंगाल बल्कि देश की राजनीति में एक बड़ी हलचल पैदा कर रहा है। जिस ममता बनर्जी ने तीन दशक पुराने वामपंथी किले को ढहाया था, आज वही उनके साथ मंच साझा करने की बात कह रही हैं।
ममता बनर्जी की राजनीति की नींव ही वामपंथ के विरोध पर टिकी थी। 1970 और 80 के दशक में जब पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा अभेद्य माना जाता था, तब ममता बनर्जी एक आक्रामक युवा नेता के रूप में उभरी।
सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन से बनाई पहचान:
साल 2006-2008 के दौरान सिंगूर में टाटा नैनो प्लांट के खिलाफ भूमि अधिग्रहण आंदोलन और नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग की घटनाओं ने ममता बनर्जी को बंगाल की जनमानस का मसीहा बना दिया। उन्होंने 'मां, माटी, मानुष' का नारा दिया, जिसने वामपंथ के उस सर्वहारा वर्ग को अपनी ओर खींच लिया जो कभी माकपा (CPIM) का आधार था।
साल 2011 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी ने वह कर दिखाया जो असंभव माना जाता था। उन्होंने 34 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका। बुद्धदेव भट्टाचार्य की हार और राइटर्स बिल्डिंग से लाल झंडे का हटना भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक थी। उस समय ममता ने कसम खाई थी कि वह बंगाल से वामपंथ का नामोनिशान मिटा देंगी।
आज की मजबूरी या रणनीति?: पिछले एक दशक में बंगाल की राजनीतिक जमीन पूरी तरह बदल चुकी है। वामदल हाशिए पर चले गए हैं और भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है। ममता बनर्जी अब महसूस कर रही हैं कि मतों का बिखराव अंततः भाजपा को फायदा पहुंचाता है। हालिया बयानों में ममता ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय स्तर पर और विशेष रूप से बंगाल में भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए विपक्ष की एकता अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि यदि देश को बचाना है और धर्मनिरपेक्षता को कायम रखना है तो सभी गैर-भाजपाई ताकतों को एक साथ आना होगा। इसमें उन्होंने विशेष रूप से 'वाम' और 'घोर वामपंथी' विचारधारा वाले समूहों का नाम लेकर सबको चौंका दिया है। जमीनी कार्यकर्ताओं का टकराव: बंगाल के गांवों में आज भी टीएमसी और वामपंथी कार्यकर्ताओं के बीच खूनी संघर्ष का इतिहास रहा है। क्या शीर्ष नेतृत्व के हाथ मिलाने से जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता एक-दूसरे को स्वीकार करेंगे? वामदलों के लिए ममता बनर्जी आज भी उनकी सत्ता छीनने वाली नेता हैं। माकपा के कई नेता ममता पर ही भाजपा को बंगाल में जगह देने का आरोप लगाते रहे हैं। धुर-वामपंथी समूह अक्सर संसदीय राजनीति से दूरी बनाकर रखते हैं या बेहद कट्टर रुख अपनाते हैं। ममता का उन्हें साथ आने का न्योता देना यह दर्शाता है कि वह भाजपा के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। ममता बनर्जी का यह हृदय परिवर्तन राजनीति की उस कड़वी सच्चाई को दर्शाता है जहां "दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।" 2011 में जिस वामपंथ को उन्होंने अपना सबसे बड़ा शत्रु माना था, 2026 की दहलीज पर खड़े बंगाल में वह उसे एक संभावित सहयोगी के रूप में देख रही हैं। भाजपा के 'हिंदुत्व कार्ड' की बढ़ती स्वीकार्यता ममता बनर्जी अब एक व्यापक छतरी तैयार करना चाहती हैं। यदि यह गठबंधन आकार लेता है तो यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी गठबंधनों में से एक होगा। जहां 'तृणमूल' और 'लाल सितारा' एक ही झंडे के नीचे भाजपा को चुनौती देते नजर आएंगे। ( कोलकाता से अशोक झा की रिपोर्ट )
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