- इस व्रत के माध्यम से यमराज से अपने पति को छीन लेती है पत्नी
- पति की लंबी उम्र के लिए उत्साह और श्रद्धा से होती है वट वृक्ष की पूजा
अशोक झा/ सिलीगुड़ी: वट सावित्री व्रत सिर्फ एक परंपरा नहीं बल्कि अटूट प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक है।इस दिन महिलाएं कठोर व्रत रखकर अपने दांपत्य जीवन की खुशहाली और पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। शास्त्रों में इसका विशेष महत्व बताया गया है। जिसका मुहूर्त आज सुबह 5 बजे के आसपास शुरू हो चुका है। आज वट सावित्री व्रत रखा जा रहा है। वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं के लिए बेहद खास माना जाता है। यह व्रत हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए व्रत रखती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत का संबंध सावित्री और सत्यवान की कथा से जुड़ा है। वट सावित्री व्रत शुभ मुहूर्त : इस बार ज्येष्ठ अमावस्या तिथि 16 मई यानी आज सुबह से शुरू हो रही है, इसलिए उदया तिथि के अनुसार व्रत इसी दिन रखा जाएगा। अमावस्या तिथि की शुरुआत 16 मई यानी आज सुबह 05 बजकर 11 मिनट से शुरू हो चुकी है और तिथि का समापन 17 मई यानी रात 01 बजकर 30 मिनट पर होगा। वट सावित्री की पूजा के लिए सबसे उत्तम पूजा मुहूर्त सुबह 07 बजकर 12 मिनट से सुबह 08 बजकर 24 मिनट तक रहेगा। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक रहेगा।
वट सावित्री व्रत पूजन विधि : इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें।इसके बाद वट वृक्ष (बरगद) के नीचे जाकर विधि-विधान से पूजा करें।पूजा के दौरान कच्चा सूत लेकर पेड़ के चारों ओर लपेटें और जल, फूल, रोली तथा चावल अर्पित करें. इसके पश्चात सावित्री-सत्यवान की पवित्र कथा सुनें या पढ़ें और अंत में अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना करें।
वट सावित्री व्रत 2026 शुभ संयोग : वट सावित्री व्रत पर आज कई सारे दुर्लभ संयोगों का निर्माण हो रहा है. जिसमें शनि जयंती, शनिश्चरी अमावस्या, मिथुन राशि में शुक्र-गुरु ग्रह की युति, ज्येष्ठ अमावस्या व दर्श अमावस्या, शनिवार का दिन और मासिक कार्तिगाई जैसे शुभ योगों का संयोग बनेगा.
वट सावित्री व्रत का महत्व
वट सावित्री व्रत का संबंध बरगद (वट) के पेड़ से है, जिसे अमरता और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है. इस व्रत को करने से पति की आयु लंबी होती है और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।सावित्री-सत्यवान की कथा :
पौराणिक कथा के अनुसार, जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तब उनकी पत्नी सावित्री ने अपने तप और वाकचातुर्य से यमराज को प्रसन्न कर लिया. उन्होंने यमराज से तीन वरदान मांगे, जिनमें अंतिम वरदान में अपने लिए 'सौ पुत्रों' का सुख मांगा. यमराज ने 'तथास्तु' कह दिया, जिसके बाद उन्हें सत्यवान के प्राण वापस लौटाने पड़े क्योंकि बिना सत्यवान के सावित्री का मां बनना संभव नहीं था वट सावित्री व्रत पर क्यों पढ़नी चाहिए ये व्रत कथा, जानें संपूर्ण कहानी और महत्व
वट सावित्री व्रत कथा 2026: ज्येष्ठ अमावस्या को वट सावित्री का व्रत रखा जा रहा है। इस दिन बरगद के पेड़ की विधिवत पूजा करने के सा सावित्री और सत्यवान की इस कथा का पाठ करना लाभकारी माना जाता है। वट सावित्री व्रत कथा : हिंदू धर्म में व्रत सावित्री व्रत कथा का विशेष महत्व है। हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। इस साल 16 मई को ये व्रत रखा जा रहा है। सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए निर्जला व्रत रखकर बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। विधिवत पूजा करने के साथ बरगद की परिक्रमा करके कच्चा सूत या फिर धागा बांधती हैं। इसके बाद सत्यवान और सावित्री की व्रत कथा पढ़ने या सुनने के बाद अपना व्रत खोलती हैं। अगर आप भी वट सावित्री का व्रत रख रही हैं, तो इस दिन इस व्रत कथा का पाठ अवश्य करें। आइए जानते हैं वट सावित्री व्रत की संपूर्ण कथा: पौराणिक एवं प्रचलित वट सावित्री व्रत कथा के अनुसार राजर्षि अश्वपति की एक ही संतान थीं सावित्री। सावित्री ने वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति रूप में चुना था। लेकिन जब नारद जी ने उन्हें बताया कि सत्यवान अल्पायु हैं तो भी सावित्री ने अपना निर्णय नहीं बदला। वह समस्त राजवैभव त्याग कर सत्यवान के साथ उनके परिवार की सेवा करते हुए वन में रहने लगीं।
सत्यवान लकड़ियां काटने जंगल गए। वहां वह मूर्छित होकर गिर पड़े। सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने गोद में पति का सिर रख उसे लेटा दिया। उसी समय यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए। यमराज सत्यवान के जीव को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं। सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल देती हैं।वट सावित्री व्रत की पूजा थाली में शामिल करें ये चीजें, जानें धार्मिक महत्व और संपूर्ण पूजन सामग्री: उन्हें आता देख यमराज ने कहा कि हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है। तुम वापस लौट जाओ। सावित्री ने कहा- जहां मेरे पति रहेंगे वहीं मुझे भी रहना है। यही मेरा पत्नी धर्म है। यमराज के कई बार मना करने पर भी वह नहीं मानी, अंत में सावित्री के साहस और त्याग से यमराज ने प्रसन्न होकर उनसे तीन वरदान मांगने को कहा।
तब सावित्री ने सास-ससुर के लिए नेत्र ज्योति मांगी, ससुर का खोया हुआ राज्य मांगा एवं अपने पति सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वर भी मांगा। तीनों वरदान सुनने के बाद यमराज ने कहा- तथास्तु! ऐसा ही होगा। यमराज आगे बढ़ने लगे। सावित्री ने कहा कि है प्रभु मैं एक पतिव्रता पत्नी हूं और आपने मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है। यह सुनकर यमराज को सत्यवान के प्राण छोड़ने पड़े। सावित्री उसी वट वृक्ष के पास आ गईं जहां उसके पति का मृत शरीर पड़ा था। सत्यवान जीवित हो गए।माता छाया की तपस्या से क्यों काला हुआ शनिदेव का रंग? जानें शनि जयंती पर संपूर्ण जन्म कथा
इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रता व्रत के प्रभाव से न केवल अपने पति को पुन: जीवित करवाया बल्कि सास को नेत्र ज्योति प्रदान करते हुए ससुर को उनके ससुर को खोया राज्य फिर दिलवाया। तभी से वट सावित्री व्रत पर वट वृक्ष का पूजन-अर्चन करने का विधान है। कहा जाता है कि इस व्रत को करने से सौभाग्यवती महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती हैं और उनका सौभाग्य अखंड रहता है।
वट सावित्री व्रत कथा का महत्व: वट सावित्री व्रत कथा माता सावित्री द्वारा अपने पति सत्यवना के प्राण यमराज से वापस लेकर आई थी। इस व्रत कथा का पाठ करने से पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य, परिवार में सुख-समृद्धि आ सकती है। इसके अलावा वृ वृक्ष में त्रिदेवों का वास होता है। ऐसे में उनकी पूजा करने से ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ अन्य देवी-देवता का आशीर्वाद मिल सकता है। इसके अलावा दांपत्य जीवन में खुशियां बनी रहती हैं। पति-पत्नी का रिश्ता मजबूत हो सकता है। पुण्यों की प्राप्ति होने के साथ मानसिक शांति मिल सकती है।
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