अशोक झा/ गुवाहाटी: यह कहानी केवल एक नेता के उभार की नहीं, बल्कि समय को पहचानने की असाधारण क्षमता की कहानी है।
असम की राजनीति में अगर किसी एक नेता ने पिछले एक दशक में खेल का पूरा समीकरण बदल दिया है, तो वह हैं हिमंता बिस्वा सरमा। कभी कांग्रेस के भीतर सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाने वाले सरमा आज उसी राजनीति के सबसे आक्रामक और निर्णायक खिलाड़ी बन चुके हैं। छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर, पार्टी बदलने का जोखिम भरा फैसला और फिर सत्ता के शिखर तक पहुंचना – यह कहानी केवल एक नेता के उभार की नहीं, बल्कि समय को पहचानने की असाधारण क्षमता की कहानी है।
1 फरवरी 1969 को असम के जोरहाट में जन्मे सरमा का शुरुआती जीवन साधारण था। पढ़ाई के दौरान ही उनमें नेतृत्व के गुण दिखने लगे थे। गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज और फिर गुवाहाटी विश्वविद्यालय से पढ़ाई के दौरान वे छात्र राजनीति में सक्रिय रहे। यहीं से उन्होंने यह समझ लिया था कि राजनीति केवल विचार नहीं, बल्कि संगठन और समय की समझ का खेल भी है। एक छोटा-सा किस्सा उनके शुरुआती दौर से जुड़ा है। छात्र राजनीति के दिनों में कहा जाता है कि वे बैठकों में सबसे कम बोलते थे, लेकिन जब बोलते थे तो सीधे मुद्दे पर। उनके करीबी मानते हैं कि यह आदत आगे चलकर उनकी पहचान बनी कम शब्द, लेकिन सटीक वार।कांग्रेस में उनका उभार तेज था। 2001 के बाद से उन्होंने असम सरकार में कई अहम विभाग संभाले – वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा। यहां उनकी छवि एक ऐसे मंत्री की बनी, जो फाइलों में नहीं, फैसलों में विश्वास करता है। एक और किस्सा: शिक्षा मंत्री के दौर का अक्सर सुनाया जाता है। भर्ती प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे। उस समय उन्होंने इंटरव्यू सिस्टम खत्म करने का फैसला लिया। कई लोगों ने इसका विरोध किया, लेकिन उन्होंने कहा – “अगर सिस्टम पर भरोसा नहीं है, तो उसे बदलना ही पड़ेगा।” बाद में पारदर्शी परीक्षा से 50,000 से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति इसी फैसले का नतीजा बनी। लेकिन असली कहानी यहां से शुरू होती है। टर्निंग मोमेंट: जब रास्ते अलग हो गए
कांग्रेस के भीतर उनकी बढ़ती भूमिका के साथ ही टकराव भी बढ़ने लगा। असम की राजनीति में नेतृत्व को लेकर खींचतान खुलकर सामने आ गई। कहा जाता है कि एक समय ऐसा भी आया, जब उन्होंने अपनी बात रखने की कोशिश की, लेकिन उन्हें वह महत्व नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी।
यही वह क्षण था, जिसने उनकी पूरी राजनीतिक दिशा बदल दी।
उन्होंने कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया – एक ऐसा कदम, जिसे उस समय कई लोगों ने राजनीतिक जोखिम बताया। लेकिन यही फैसला उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने खुद को केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक रणनीतिकार के रूप में स्थापित किया। उत्तर-पूर्व में भाजपा के विस्तार की कहानी में उनकी भूमिका केंद्रीय रही। संगठन को मजबूत करना, गठबंधन बनाना और चुनावी रणनीति तैयार करना – इन सबमें उनकी पकड़ साफ दिखी। यहां एक दिलचस्प किस्सा और जुड़ता है। भाजपा में आने के बाद शुरुआती दौर में उन्हें लगातार अलग-अलग राज्यों में जिम्मेदारी दी जाती थी। कहा जाता है कि वे हर दौरे में स्थानीय समीकरणों को बारीकी से समझते थे और नोट्स बनाते थे। यही आदत उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती गई। उनकी राजनीति की सबसे बड़ी पहचान उनकी आक्रामक शैली है। वे सीधे बोलते हैं, बिना लाग-लपेट के। यही वजह है कि वे समर्थकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं और विरोधियों के लिए चुनौती भी। खासकर कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होंने जिस तरह से अपने पुराने राजनीतिक घर पर हमले किए, उसने उनकी नई छवि को और मजबूत किया।
मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी कार्यशैली में भी यही तेजी दिखाई देती है। फैसले जल्दी लेना, प्रशासन को सक्रिय रखना और कानून-व्यवस्था पर सख्ती – ये उनकी पहचान बन चुके हैं। वे विकास और क्षेत्रीय पहचान दोनों को साथ लेकर चलते हैं।
अब जब हिमंता बिस्वा सरमा दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, तो यह साफ है कि वे केवल एक राजनीतिक चेहरा नहीं रहे, बल्कि असम की राजनीति के केंद्र में स्थापित हो चुके हैं।
उनकी कहानी यह बताती है कि राजनीति में केवल मौके नहीं मिलते, उन्हें पहचानना और पकड़ना भी पड़ता है। छात्र राजनीति से शुरू हुआ यह सफर आज सत्ता के शिखर तक पहुंच चुका है, लेकिन उनकी शैली अब भी वही है – तेज, स्पष्ट और निर्णायक। और शायद यही वजह है कि हिमंता बिस्वा सरमा अब सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि असम की राजनीति का एक दौर बन चुके हैं। असम की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिनकी कहानी सिर्फ सत्ता तक सीमित नहीं रहती। वे एक पूरे दौर, एक आंदोलन और एक पीढ़ी की उम्मीदों को अपने भीतर समेटे होते हैं। प्रफुल्ल कुमार महंत का नाम उन्हीं में आता है। एक साधारण छात्र नेता से लेकर राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बनने तक का उनका सफर सिर्फ पद हासिल करने की कहानी नहीं है, बल्कि धैर्य, अनुशासन और दूरदृष्टि का उदाहरण भी है। इस सफर के बीच एक वाक्य बार-बार सामने आता है – ‘आंदोलन लंबा चलेगा, इसलिए ऊर्जा बचाकर रखनी होगी।’ यह सिर्फ एक सलाह नहीं थी, बल्कि पूरी पीढ़ी के लिए रास्ता दिखाने वाली सोच थी।
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