अशोक झा/ कोलकाता: कोलकाता में जमीन हड़पने के एक बड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच तेज हो गई है। इस मामले में कोलकाता पुलिस के लगभग 30 अधिकारी अब ईडी की जांच के दायरे में हैं। केंद्रीय जांच एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सोमवार को यह जानकारी दी।कोलकाता में जमीन हड़पने के एक बड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच तेज हो गई है। इस मामले में कोलकाता पुलिस के लगभग 30 अधिकारी अब ईडी की जांच के दायरे में हैं। केंद्रीय जांच एजेंसी के एक बेहद वरिष्ठ अधिकारी ने सोमवार को इस पूरे मामले का खुलासा करते हुए बताया कि अलग-अलग रैंक के इन पुलिसकर्मियों पर एक ऐसे शातिर गिरोह से सीधे तौर पर जुड़े होने का गहरा संदेह है, जो शहर के बुजुर्ग और बेसहारा नागरिकों को निशाना बनाता था।
बुजुर्गों पर खाकी का खौफ: ईडी के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे रैकेट का काम करने का तरीका बेहद खौफनाक था. पुलिस के ये अधिकारी और उनके साथ जुड़े अपराधी गिरोह के लोग शहर के उन वरिष्ठ नागरिकों की पहचान करते थे जो अकेले रहते थे।इसके बाद स्थानीय पुलिस तंत्र का गलत इस्तेमाल करके और खाकी की धौंस दिखाकर उन बुजुर्गों को इस बात के लिए मजबूर किया जाता था कि वे अपनी करोड़ों की संपत्ति और जमीनों को बाजार मूल्य से बेहद कम दाम पर इन जालसाजों के हवाले कर दें. मना करने पर उन्हें झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी दी जाती थी।
डिजिटल सबूतों से खुलेगा राज: जांच से जुड़े ईडी के एक आला अधिकारी ने बताया कि छापेमारी और शुरुआती तफ्तीश के दौरान कई पुलिसकर्मी सीधे तौर पर संदेह के घेरे में आए हैं. उनके खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाए जा रहे हैं और उनकी सटीक भूमिका की बारीकी से जांच हो रही है. ईडी को जांच के दौरान कई ऐसे संदिग्ध दस्तावेज और डिजिटल सबूत हाथ लगे हैं, जिनका अभी गहराई से विश्लेषण किया जा रहा है. जांच का मुख्य फोकस अब इस बात पर है कि इस पूरे काले कारोबार में पैसे का लेनदेन कहां-कहां हुआ और इस अवैध कमाई के असली लाभार्थी कौन-कौन हैं।
डिलीट डेटा की फॉरेंसिक जांच: इस मामले में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है. आरोपियों के पास से जो मोबाइल फोन जब्त किए गए थे, उनमें से कई महत्वपूर्ण डेटा और चैट को जानबूझकर डिलीट कर दिया गया है. केंद्रीय एजेंसी के अधिकारी ने बताया कि इस डेटा को वापस पाने के लिए फॉरेंसिक विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है. बहुत जल्द ही डिलीट किए गए डेटा को रिकवर कर लिया जाएगा, जिसके बाद इस रैकेट में शामिल पुलिस अधिकारियों की गर्दन तक कानून का हाथ पहुंचना बिल्कुल तय माना जा रहा है।
तीन मास्टरमाइंड और पुलिस का गठजोड़:
प्रवर्तन निदेशालय इस वक्त मुख्य रूप से गिरफ्तार किए जा चुके तीन बड़े आरोपियों की कुंडली खंगालने में जुटा हुआ है. इनमें पहला नाम बिस्वजीत पोद्दार उर्फ सोना पप्पू का है, दूसरा नाम कोलकाता पुलिस के पूर्व उपायुक्त (DCP) शांतनु सिन्हा बिस्वास का है, और तीसरा नाम कारोबारी जॉय कामदार का है. जांचकर्ताओं का साफ कहना है कि यह पूरा सिंडिकेट सीधे तौर पर आम लोगों को डराने-धमकाने और पुलिस के रसूख का खुला दुरुपयोग करके ही इतनी बड़ी जमीनों पर कब्जा कर रहा था।
धमकी, रसूख और जमीनी खेल:
आरोपों के मुताबिक, इस खेल में सबका काम बंटा हुआ था. सोना पप्पू जमीनों के असली मालिकों को डराने और धमकाने का जिम्मा संभालता था, जबकि पूर्व डीसीपी शांतनु बिस्वास पर आरोप है कि वह अपने स्थानीय पुलिसिया नेटवर्क का इस्तेमाल करके पीड़ितों पर मानसिक दबाव बनाते थे ताकि वे घुटने टेक दें. वहीं, जॉय कामदार अपने बड़े कारोबारी नेटवर्क के जरिए इन औने-पौने दामों पर खरीदी गई विवादित संपत्तियों को खरीदता था और फिर उन पर बहुमंजिला इमारतें या अन्य प्रोजेक्ट्स बनाकर बड़ा मुनाफा कमाता था.
ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी
इसी कड़ी में ईडी की टीमों ने शुक्रवार को बड़ी कार्रवाई करते हुए कारोबारी मोहम्मद अली उर्फ मैक्स राजू, पूर्व डीसीपी के भतीजे सौरभ अधिकारी और उप निरीक्षक (SI) रुहिल अमीन अली के कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की. इसके अलावा जांच एजेंसी ने मुर्शिदाबाद जिले में स्थित पूर्व पुलिस अधिकारी शांतनु सिन्हा बिस्वास के पैतृक आवास पर भी घंटों तलाशी ली. यह पूरी कार्रवाई सोना पप्पू और शांतनु बिस्वास से रिमांड के दौरान हुई कड़ी पूछताछ में मिले इनपुट्स के आधार पर की गई है।
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