डॉ अर्चना तिवारी
भारत की संसद में कल जो कुछ हुआ,उसे केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व के लोगों ने ठीक से देखा। भारत की संसद में उपस्थित दृश्य ने चीख चीख कर संदेश दिया कि भारत की विपक्षी पार्टियों को भारत की महिलाओं का सशक्तिकरण अच्छा नहीं लगता। जिस तरह महिला आरक्षण का विधेयक कल संसद में गिरा है उससे भारत की सभी महिलाओं को बहुत निराशा हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार बार कहते रहे कि इस कानून को पास होने दीजिए। इसके पास न होने से मेरा कोई नुकसान नहीं होगा लेकिन पास हो जाने से भारत की आधी आबादी को उसका वर्षों से लंबित अधिकार मिल जाएगा। भारत के विपक्ष को भारत के प्रधानमंत्री की यह अपील बिल्कुल पसंद नहीं आई जबकि प्रधानमंत्री ने यहां तक कहा कि यदि कानून पास होता है तो वह इसका क्रेडिट विपक्ष को देने के लिए इश्तहार प्रकाशित कराएंगे। विपक्ष को नहीं मानना था, वह नहीं माना और भारत की नारी शक्ति की आस टूट गई।
संसद के तीन दिवसीय विशेष के दौरान महिला आरक्षण 131वें संशोधन बिल को पास नहीं कराया जा सका। महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े तीन बिलों के ऊपर शुक्रवार की शाम को हुई वोटिंग में पक्ष में सिर्फ 298 वोट ही पड़े। यानी 50 प्रतिशत आबादी की उम्मीद को बड़ा झटका लगा । बिल गिरने के बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि कुल वोट 528 पड़े, जिनमें से इसके पक्ष में 298 और ना में 230 वोट पड़े। पहले राउंड में कुल 489 वोट पड़े जिनमें पक्ष में 278 और खिला में 211 वोट पड़े. इस बिल को दो तिहाई बहुमत यानी 352 वोटों की जरूरत थी, यानी जरूरत से 54 वोट कम पड़े।
इससे पहले, महिला आरक्षण विधेयक को लेकर लोकसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली. एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सभी दलों से इस बिल का समर्थन करने की अपील की, तो वहीं विपक्ष ने इसे लेकर गंभीर आपत्तियां उठाईं।
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि इस सदन में 543 सांसद बैठते है। किसी के संसदीय क्षेत्र में मतदाता की संख्या 49 लाख तो किसी के यहां 60 हज़ार है। कई सीटें इतनी बड़ी हो गई हैं कि सांसद उनसे मिल भी नहीं पाता है। मतदाताओं की अपेक्षा होती है, वो सांसद से मिलना चाहता है.उन्होंने कहा कि क्या जो लोग विरोध कर रहे हैं, वो मुझे समझा सकता है कि जिनके यहां 49 लाख मतदाता हो, वो अपने ज़िम्मेदारी का निर्वाहन कैसे करता होगा ? इसी को ध्यान में रखते हुए संविधान में समय समय पर परिसीमन का प्रावधान है।
अब भारत के नेता प्रतिपक्ष की दलील सुनिए। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस बिल को छलावा करार दिया और कहा कि यह बिल यहीं गिर जाएगा। पता नहीं किस आधार पर उन्होंने दावा किया कि यह वास्तव में महिलाओं के हित में लाया गया विधेयक नहीं है।
राहुल गांधी ने अपने भाषण में कहा कि 2023 में जो महिला आरक्षण बिल पास हुआ था, उसी समय सत्ता पक्ष के सहयोगियों ने संकेत दिया था कि इसे लागू करने में लंबा समय लग सकता है।
कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने ने महिला आरक्षण विधेयक पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए साफ कहा कि उनकी पार्टी महिलाओं को आरक्षण देने के खिलाफ नहीं है, लेकिन जिस तरीके से इस बिल को लागू करने की कोशिश की जा रही थी, वह स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि पुरानी जनगणना के आधार पर परिसीमन (Delimitation) करके महिला आरक्षण लागू करना गलत है, खासकर तब जब इसमें ओबीसी (OBC) वर्ग को शामिल नहीं किया गया. उनके मुताबिक, इस वजह से कांग्रेस इस बिल का समर्थन नहीं कर सकती थी।
बहरहाल, भारत की संसद में भारत की नारी शक्ति को सशक्त बनाने का यह बिल पास नहीं हो सका।
भारत में महिला आरक्षण का इतिहास लगभग चार दशकों के राजनीतिक संघर्ष का परिणाम है, जो 1996 में शुरू हुआ और सितंबर 2023 में "नारी शक्ति वंदन अधिनियम" (106वां संवैधानिक संशोधन) के रूप में पास हुआ। यह ऐतिहासिक कानून लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% (एक-तिहाई) सीटें आरक्षित करता है, जो परिसीमन के बाद लागू होगा।
अब यह जरूरी हो जाता है कि भारत में महिला आरक्षण के इतिहास के प्रमुख घटनाक्रम पर दृष्टि डाली जाय। सबसे पहले 1993 में इसकी नींव पड़ी थी। उस समय 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 1/3 सीटों का आरक्षण अनिवार्य किया गया।
वर्ष 1996 में पहली कोशिश की गई। उस साल 12 सितंबर, 1996 को एचडी देवगौड़ा सरकार ने 81वां संविधान संशोधन विधेयक पहली बार पेश किया, लेकिन आम सहमति न बनने के कारण यह पास नहीं हो सका। वर्ष 1998-2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में प्रयास हुए। वाजपेयी सरकार ने चार बार इस बिल को लाने की कोशिश की, लेकिन राजनीतिक विरोध के चलते यह हर बार लैप्स (lapse) हो गया।
2008-2010 में यूपीए सरकार में भी कुछ प्रयास किए गए। वर्ष 2008 में विधेयक फिर पेश किया गया और 2010 में इसे भारी गहमागहमी के बीच राज्यसभा में पारित कराया गया, लेकिन लोकसभा में यह नहीं लाया जा सका। अब आया वर्ष 2023 जब यह बिल ऐतिहासिक रूप से पारित हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार द्वारा 19 सितंबर, 2023 को नारी शक्ति वंदन अधिनियम ,128वां संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किया गया। 20 सितंबर, 2023 को यह विधेयक लोकसभा में 454 मतों के समर्थन के साथ पारित हुआ और बाद में राज्यसभा से भी पास हो गया।
इस कानून की मुख्य बातें यह हैं कि
यह 15 वर्षों के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं में 33% आरक्षण सुनिश्चित करता है। इसमें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों में से भी 1/3 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। उसी समय यह तय हुआ था कि
यह कानून परिसीमन (Delimitation) और जनगणना के बाद लागू होगा।
भारत की महिलाओं के लिए यह वास्तव में एक बड़ा झटका तो है, लेकिन प्रतीक्षा करने में कोई हर्ज नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की भावनाओं और संकल्पशक्ति पर भरोसा रखिए, यह अधिकार बहुत जल्दी मिलेगा।
वंदे मातरम।
( लेखिका प्रख्यात शिक्षाविद और स्त्री विमर्श की राष्ट्रवादी चिंतक हैं।)
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