देश की राजधानी में शततंत्री वीणा के गूंजते स्वर जैसे ही वातावरण में प्रस्फुटित हुए, सभागार एक दिव्य नाद-मंडल में परिवर्तित हो गया। उपस्थित श्रोता मानो सम्मोहन की स्थिति में थे—पलक झपकाने तक का साहस न कर पाते हुए, वे पूरी तरह उस संगीत-यात्रा में डूब चुके थे। प्रस्तुति के अंतिम स्वर के विलीन होते ही सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
दिल्ली के सी.आर. पार्क स्थित देशबंधु चित्तरंजन भवन के मेंबर्स लाउंज में, देशबंधु चित्तरंजन मेमोरियल सोसाइटी द्वारा “तानसेन परंपरा की शततंत्री वीणा पर एकल संगीत यात्रा” शीर्षक से एक भावपूर्ण संगीत संध्या का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पंडित दिशारी चक्रवर्ती ने अपनी विलक्षण कला का प्रदर्शन किया। उनके साथ तबले पर बनारस घराने के प्रख्यात कलाकार पंडित रामकुमार मिश्रा ने संगत की, जबकि ड्रीमी नाइस ने तानपुरे का सुमधुर सहारा प्रदान किया।
कार्यक्रम का प्रारंभ राग हेमंत से हुआ, जो बाबा अलाउद्दीन खाँ की एक अत्यंत लोकप्रिय रचना है। प्रस्तुति से पूर्व पंडित चक्रवर्ती ने राग का गूढ़ विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने ध्रुपद अंग में विस्तृत आलाप के माध्यम से स्थायी, अंतरा, संचारी और अभोग का क्रमिक विस्तार किया। जोर के विकास के साथ पंडित रामकुमार मिश्रा ने पखावज-अंग शैली में तबला संगत कर प्रस्तुति को और समृद्ध किया। यह प्रस्तुति विलंबित-जोर, मध्य-जोर और द्रुत-जोर तिश्र जाति के साथ आगे बढ़ी।
इसके पश्चात उन्होंने विविध प्रकार की झाला शैलियों—सुरश्रृंगार की ठोक झाला, सरोद की लड़ी झाला, सितार की सीधी झाला तथा सुरबहार की उलटी झाला—का अद्भुत प्रदर्शन किया, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
अगली प्रस्तुति थी राग रसिया, जिसे भारत रत्न पंडित रवि शंकर ने रचा है। इसे संक्षिप्त आलाप, मध्यलय एकताल की बंदिश तथा द्रुत तीनताल की रेजाखानी गत और झाला के साथ प्रस्तुत किया गया। कोमल निषाद के विवादी स्वर के रूप में प्रयोग ने राग में एक विशिष्ट माधुर्य उत्पन्न किया।
इसके बाद बाबा अलाउद्दीन खाँ की एक अन्य सुप्रसिद्ध रचना राग दुर्गेश्वरी प्रस्तुत की गई। पंडित चक्रवर्ती ने इसमें अपनी स्वयं की रचना को अति-विलंबित लय में मसितखानी गत के रूप में प्रस्तुत करते हुए गत-विस्तार और स्वर-विस्तार का सुंदर समन्वय किया। तत्पश्चात मध्यलय में अलाउद्दीन खानी गत के माध्यम से छुट्टान, तोड़ा, सवाल-जवाब और झाला का प्रभावशाली प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम का समापन राग मांड की धुन से हुआ, जिसे दादरा ताल में प्रस्तुत किया गया। यह उस्ताद अली अकबर खाँ की रचना है। साथ ही, उन्होंने बाबा अलाउद्दीन खाँ से संबंधित एक भक्तिमय धुन को भी पिरोया—वही धुन जिसने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को “भालोबेशे सखी निभृते जतने…” जैसी अमर रचना के लिए प्रेरित किया था।
दो घंटे तक अविराम प्रवाहित इस सुर-साधना को श्रीमती सुस्मिता चक्रवर्ती ने अत्यंत सौम्यता एवं गरिमा के साथ संचालित किया। कार्यक्रम में भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत की अनेक विशिष्ट एवं सम्मानित विभूतियों की उपस्थिति रही, जिससे वातावरण और भी रससिक्त हो उठा।
उपस्थित गणमान्यों में प्रोफेसर डॉ. अपर्णा सोपोरी विशेष रूप से उल्लेखनीय रहीं, जो पद्मश्री पंडित भजन सोपोरी की धर्मपत्नी हैं—वे महान संतूर वादक, जिन्हें “संतूर के संत” के रूप में आदरपूर्वक स्मरण किया जाता है। सुप्रसिद्ध पत्रकार श्री जयंत रायचौधुरी की उपस्थिति ने सभा में एक विशेष जीवंतता का संचार किया।
अन्य प्रमुख अतिथियों में डॉ. देबाशीष धर (संस्था के सचिव), प्रोफेसर देबयानी बक्शीपात्र, पंडित अरूप रतन मुखर्जी, पंडित अजय पी. झा तथा पंडित राजकुमार मजूमदार सहित अनेक विद्वान एवं रसिक श्रोता सम्मिलित हुए, जिनकी उपस्थिति ने इस सांगीतिक संध्या को और अधिक गौरवमय बना दिया। ( ईरानी विश्वास की कलम से )
दुनियाभर के घुमक्कड़ पत्रकारों का एक मंच है,आप विश्व की तमाम घटनाओं को कवरेज करने वाले खबरनवीसों के अनुभव को पढ़ सकेंगे
https://www.roamingjournalist.com/