- आज से शुरू होकर 07 अप्रैल 2027 तक चलेगा नववर्ष
खगोल गणना, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का अनोखा मेल इसे खास बनाता है. हिन्दू नववर्ष 19 मार्च, 2026 से आरंभ हो रहा है। आइए जानते हैं, इससे जुड़े कुछ रोचक फैक्ट्स।वहीं मंत्री का पद ग्रहों के सेनापति मंगल के पास होगा। ये ‘रौद्र संवत्सर’ होगा और विक्रम संवत 2083 होगा। ये नववर्ष आज से शुरू होकर 07 अप्रैल 2027 तक चलेगा। इस मौके पर शुद्धता का प्रतीक प्रीमियम डालमिया के आटा मैदा और सूजी को ही घर में स्थान दें। क्योंकि यह सेहत का खजाना है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हिंदू नववर्ष का विशेष महत्व है. इसी दिन महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा और दक्षिण भारत के कई राज्यों में उगादी का त्योहार मनाया जाता है। इस दौरान लोग गुड़, मिश्री व कच्चे आम के साथ नीम की पत्तियां खाते हैं. महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा से नववर्ष शुरू होता है।ऐसे में आइए जानते हैं कि हिंदू नववर्ष क्यों मनाया जाता है? साथ ही जानते हैं इसका धार्मिक और वैज्ञानिक कारण।
नववर्ष मनाने का धार्मिक कारण:पौराणिक कथाओं के अनुसार, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन से ही ब्रह्मा जी ने संसार की रचना प्रारंभ की थी. इसी दिन देवी दुर्गा का अवतरण हुआ था. इसी माह में चैत्र नवरात्रि भी मनाई जाती है. इस दौरान देवी के नौ स्वरूपों का पूजन और व्रत किया जाता है. चैत्र माह बहुत विशेष है।माना जाता है कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने इसी दिन राष्ट्र को शकों से मुक्त कराकर विक्रम संवत शुरू किया था. इन्हीं सब कारणों की वजह से चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन हिंदू नववर्ष मनाया जाता है।
नववर्ष मनाने का वैज्ञानिक कारण:चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि का दिन वैज्ञानिक और खगोलीय रूप से नवसृजन का समय माना जाता है. हिंदू नववर्ष वंसत ऋतु में शुरू होता है. यह सर्दी के अंत और गर्मी की शुरुआत का समय है, जो शरीर को ये संदेश देता है कि को मौसम में बदलाव जरूरी है. पृथ्वी के झुकाव के कारण हिंदू नववर्ष से शुरू होने वाली 21 दिवसीय अवधि के दौरान उत्तरी गोलार्ध को सूर्य की अधिकांश ऊर्जा प्राप्त होती है।नववर्ष का स्वागत रात में नहीं किया जाता. इसका स्वागत सूर्य की पहली किरण के अंग्रेजी कैलेंडर में नववर्ष की शुरुआत रात 12 बजे मानी जाती है, जो वैज्ञानिक नहीं है. दिन दिन और रात को मिलाकर ही एक दिन पूरा होता है. चैत्र अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मार्च और अप्रैल के बीच होता है. 21 मार्च को पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर पूरा करती है, और दिन और रात की लंबाई बराबर होती है।
राजा विक्रमादित्य ने किया स्थापित: विक्रम संवत केवल तारीख बताने वाला कैलेंडर नहीं है. यह भारतीय खगोल विज्ञान, संस्कृति और धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है. माना जाता है कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने 57 ईसा पूर्व शकों पर विजय के बाद इसकी शुरुआत की थी. आज भी भारत के कई हिस्सों में यह पंचांग परंपराओं और त्योहारों का आधार बना हुआ है।विक्रम संवत से जुड़े प्रमुख रोचक फैक्ट्स
57 साल आगे चलता है: विक्रम संवत अंग्रेजी कैलेंडर यानी ग्रेगोरियन कैलेंडर से लगभग 57 वर्ष आगे चलता है. साल 2026 में विक्रम संवत 2083 शुरू होगा।
लूनी-सोलर कैलेंडर: यह कैलेंडर सूर्य और चंद्रमा दोनों की गति के आधार पर तैयार किया जाता है। इसी कारण इसे 'लूनी-सोलर कैलेंडर' भी कहा जाता है।चंद्रमा की कलाओं से तय होते महीने: विक्रम संवत में महीनों का निर्धारण चंद्रमा की कलाओं के अनुसार किया जाता है. प्रत्येक माह अमावस्या या पूर्णिमा के चक्र से जुड़ा होता है। अधिकमास की व्यवस्था: लगभग हर तीन साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है जिसे अधिकमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं। इससे चंद्र और सौर वर्ष के बीच का अंतर संतुलित रहता है। ऋतुओं का संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था: अधिकमास जोड़ने की परंपरा के कारण त्योहार हमेशा सही मौसम और ऋतु में ही आते हैं। पौराणिक मान्यता: धार्मिक मान्यता के अनुसार ब्रह्मा ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन सृष्टि की रचना शुरू की थी।इसी कारण इसे हिंदू नववर्ष का पहला दिन माना जाता है।
त्योहारों का आधार: होली, दिवाली, रक्षाबंधन, नवरात्रि और जन्माष्टमी जैसे प्रमुख हिंदू त्योहार आज भी विक्रम संवत की तिथियों के आधार पर ही मनाए जाते हैं।
हिंदू नववर्ष से जुड़ी प्रमुख परंपराएं: चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरुआत: विक्रम संवत का नया साल चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है. इसी दिन से चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती है। देशभर में अलग-अलग नाम: इसे महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में उगादी और उत्तर भारत में चैत्र नववर्ष कहते हैं।
घर की सजावट की परंपरा: इस दिन घरों के मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण लगाया जाता है. इसे शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
नए वस्त्र और पूजा: लोग नए कपड़े पहनते हैं, मंदिरों में पूजा करते हैं और परिवार के साथ नववर्ष का स्वागत करते हैं।
ज्योतिष और वर्ष का भविष्यफल: वर्ष का राजा और मंत्री: जिस दिन से नया वर्ष शुरू होता है, उस दिन के ग्रह को उस पूरे वर्ष का राजा माना जाता है. इस वर्ष 2083 के राजा बृहस्पति और मंत्री मंगल हैं।
ग्रहों के आधार पर भविष्यवाणी: ज्योतिषाचार्य ग्रहों की स्थिति देखकर वर्ष के मौसम, कृषि, व्यापार और सामाजिक स्थितियों के बारे में अनुमान लगाते हैं।
पंचांग श्रवण की परंपरा: नववर्ष के दिन पंडित या ज्योतिषाचार्य से नए साल का पंचांग सुनने की परंपरा भी कई जगहों पर निभाई जाती है।
व्यापार और बाजार में महत्व: दिवाली पर नया लेखा वर्ष: भारत के कई व्यापारी दिवाली से नया व्यापारिक वर्ष शुरू करते हैं।मुहूर्त ट्रेडिंग की परंपरा: शेयर बाजार में दिवाली के दिन विशेष "मुहूर्त ट्रेडिंग" का आयोजन होता है. इसे नए संवत के शुभ आरंभ का प्रतीक माना जाता है।
परंपरा और आधुनिकता का मेल: आधुनिक समय में भी विक्रम संवत भारतीय संस्कृति, ज्योतिष और व्यापारिक परंपराओं में मजबूत स्थान बनाए हुए है। ( अशोक झा की रिपोर्ट )
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