भारत के पड़ोसी देश नेपाल में इस वक्त की राजनीति में ऐसा तूफान आया हुआ है, जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। यहां नई सरकार बनी, शपथ समारोह हुआ और फिर महज 24 घंटे के अंदर की ऐसा फैसला लिया गया, जिसने सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी। नेपाल पुलिस के प्रवक्ता अभिनारायण काफले ने बताया है कि पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के नेता केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को गिरफ़्तार कर लिया गया है। ये कार्रवाई जे-जेड प्रदर्शनों के दौरान सितंबर में प्रदर्शनकारियों पर हुई एक जानलेवा कार्रवाई में कथित संलिप्तता के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा की जांच करने वाले एक नेपाली पैनल ने इस सप्ताह की शुरुआत में सिफारिश की थी कि 74 वर्षीय ओली पर प्रदर्शनों पर हुई कार्रवाई को रोकने में विफल रहने के लिए मुकदमा चलाया जाए। काठमांडू घाटी पुलिस के प्रवक्ता ओम अधिकारी ने बताया, "उन्हें आज सुबह गिरफ्तार किया गया है और यह प्रक्रिया कानून के अनुसार आगे बढ़ेगी।"
ये गिरफ्तारियां प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह और उनके मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण के एक दिन बाद हुई हैं। यह शपथ ग्रहण 2025 के उस विद्रोह के बाद हुए पहले चुनावों के बाद हुआ था, जिसने ओली की सरकार को गिरा दिया था।
नेपाल के नव-नियुक्त गृह मंत्री, सुदान गुरुंग, जो इन प्रदर्शनों में एक प्रमुख चेहरा थे, ने ओली की गिरफ्तारी के बाद इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया कि 'कानून से ऊपर कोई नहीं है'।
गुरुंग ने लिखा, "कानून से ऊपर कोई नहीं है... यह किसी से बदला नहीं है, बल्कि न्याय की बस शुरुआत है। मेरा मानना है कि अब देश एक नई दिशा लेगा।"
ओली की पार्टी, नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के वरिष्ठ नेता मिन बहादुर शाही ने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री को शनिवार सुबह उनके आवास से गिरफ्तार किया गया। KP शर्मा ओली की गिरफ्तारी की वजह क्या थी?
8 और 9 सितंबर को हुए भ्रष्टाचार विरोधी युवा विद्रोह में कम से कम 77 लोग मारे गए थे। यह विद्रोह सोशल मीडिया पर लगाए गए एक संक्षिप्त प्रतिबंध के कारण शुरू हुआ था, लेकिन इसने आर्थिक कठिनाइयों को लेकर लोगों में लंबे समय से पनप रहे गुस्से को भी हवा दे दी।
प्रदर्शनों के पहले दिन हुई पुलिस कार्रवाई में कम से कम 19 युवा मारे गए थे।
अगले ही दिन यह अशांति पूरे देश में फैल गई, जब संसद और सरकारी कार्यालयों में आग लगा दी गई, जिसके परिणामस्वरूप सरकार गिर गई।
इस जानलेवा विद्रोह की जांच के लिए नेपाल सरकार द्वारा समर्थित एक रिपोर्ट में तत्कालीन प्रधानमंत्री KP शर्मा ओली और अन्य अधिकारियों पर मुकदमा चलाने की सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि "यह साबित नहीं हुआ है कि गोली चलाने का कोई आदेश दिया गया था," लेकिन साथ ही यह भी कहा गया कि "गोलीबारी को रोकने या नियंत्रित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया, और उनके लापरवाही भरे आचरण के कारण नाबालिगों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी।" ( नेपाल बॉर्डर से अशोक झा की रिपोर्ट )
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