भारत और चीन के बीच की सीमा विवादित है। इसकी वजह से दोनों देशों के बीच कई बार हालात तनाव पूर्ण हो चुके हैं। पूर्वोत्तर में भारत के पहाड़ी राज्य सिक्किम में एक ऐसी जगह है जहां भारत-चीन और भूटान की सीमाएं मिलती हैं। सवाल सिर्फ एक बयान का नहीं था, बल्कि उस पुराने टकराव का भी था, जिसने कभी दो एशियाई ताकतों को युद्ध के बेहद करीब ला दिया था। आइए जानें कि आखिर डोकलाम में उस दिन हुआ क्या था? संसद में डोकलाम पर क्यों भड़का संग्राम : सोमवार को लोकसभा में माहौल अचानक तब गर्म हो गया जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भारत-चीन तनाव का जिक्र करते हुए डोकलाम विवाद का मुद्दा उठा दिया। उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख जनरल (रिटायर्ड) मनोज मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित किताब और एक मैगजीन रिपोर्ट का हवाला दिया। जैसे ही उन्होंने दावा किया कि चीन के टैंक डोकलाम में एक पहाड़ी रिज पर कब्जा करने की तैयारी में थे, सरकार की ओर से कड़ी आपत्ति दर्ज की गई. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि जो किताब अभी छपी ही नहीं है, उसे संसद में कोट करना नियमों के खिलाफ है. इसी बात पर हंगामा इतना बढ़ा कि सदन को एक ही दिन में कई बार स्थगित करना पड़ा।
क्या है डोकलाम और क्यों है इतना अहम?
डोकलाम भारत के उत्तर-पूर्वी इलाके के पास स्थित करीब 14 हजार फीट ऊंचा एक पठार है. यह एक ट्राई-जंक्शन प्वाइंट है, जहां भारत, भूटान और चीन (तिब्बत क्षेत्र) की सीमाएं मिलती हैं। भूटान डोकलाम को अपना इलाका मानता है, जबकि चीन इसे डोंगलांग क्षेत्र बताकर दावा करता है। भारत का सीधा दावा यहां नहीं है, लेकिन रणनीतिक कारणों से यह जगह उसके लिए बेहद संवेदनशील है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर की वजह से बढ़ती चिंता : डोकलाम भारत के लिए इसलिए अहम है, क्योंकि यह सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब है। इस कॉरिडोर को चिकन नेक भी कहा जाता है. यही वह पतली जमीन की पट्टी है, जो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को बाकी देश से जोड़ती है। अगर किसी हालात में चीन इस इलाके में मजबूत हो जाए, तो भारत के लिए अपने पूर्वोत्तर से संपर्क बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। यही वजह है कि भारत भूटान की सुरक्षा को अपनी रणनीतिक जिम्मेदारी मानता है।विवाद की शुरुआत कैसे हुई?: डोकलाम विवाद की जड़ें जून 2017 की हैं. उस समय चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने डोकलाम में एक पुरानी सड़क को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया. बुलडोजर, एक्सकेवेटर और सैनिकों के साथ निर्माण तेज किया गया। 16 जून 2017 को जब यह काम तेजी से आगे बढ़ा, तो भूटान ने इसका विरोध किया, लेकिन चीन ने भूटान की आपत्ति को नजरअंदाज कर दिया।
भारत की एंट्री और आमने-सामने की स्थिति;: 18 जून 2017 को भारत ने हस्तक्षेप करने का फैसला किया। सिक्किम के रास्ते करीब 270-300 भारतीय सैनिक डोकलाम में दाखिल हुए और चीनी सैनिकों के सड़क निर्माण को रोक दिया। दोनों सेनाएं आमने-सामने आ गईं। सामने भले कुछ सौ सैनिक थे, लेकिन पीछे दोनों देशों की ओर से हजारों जवान अलर्ट पर थे। हालात ऐसे बन गए थे कि किसी भी छोटी चूक से बड़ा सैन्य टकराव हो सकता था। 73 दिन तक चला तनाव: डोकलाम में यह गतिरोध पूरे 73 दिनों तक चला। इस दौरान न तो भारत पीछे हटा और न ही चीन ने निर्माण पूरी तरह छोड़ा। चीन इसे अपने इलाके में दखल बता रहा था, जबकि भारत का तर्क था कि वह भूटान की संप्रभुता की रक्षा कर रहा है। दोनों ओर से बयानबाजी तेज थी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस टकराव पर नजर रखी जा रही थी।
कूटनीति से निकला समाधान: आखिरकार अगस्त 2017 के आखिर में दोनों देशों के बीच एक्सपीडिशस डिसएंगेजमेंट पर सहमति बनी। इसका मतलब था कि दोनों सेनाएं विवाद वाले इलाके से पीछे हटेंगी। भारत ने अपने सैनिक वापस बुलाए और चीन ने निर्माण उपकरण हटा लिए। सड़क निर्माण रोक दिया गया और पहले जैसी स्थिति बहाल की गई। दोनों देशों ने इस समझौते को अपनी-अपनी जीत बताया।
अजित डोभाल की भूमिका: इस विवाद को सुलझाने में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की अहम भूमिका मानी जाती है। जुलाई 2017 में वे बीजिंग गए और चीनी अधिकारियों से बातचीत की. BRICS से जुड़ी बैठकों के दौरान चीनी नेतृत्व के साथ हुई इन चर्चाओं ने तनाव कम करने में बड़ी भूमिका निभाई। इसके बाद ही अगस्त में समाधान का रास्ता साफ हुआ। इस जगह भारत और चीन की सेनाएं 5 से 6 किलोमीटर की दूरी पर ही तैनात हैं। इस ट्राइजंक्शन पाइंट को डोकलाम पठार कहते हैं जिसे भारत भूटान का हिस्सा मानता है। साल 2017 में इस जगह को लेकर भारत और चीन के बीच टकराव भी हो चुका है. ये इलाका क्यों सामरिक रूप से अहम है और कैसे भारतीय सेना ने इस इलाके में चीन के मंसूबों पर पानी फेरा था, इसकी पूरी कहानी भारतीय सेना के पूर्व डीजीएमओ अनिल भट्ट ने बताई है।
क्यों अहम है डोकलाम
भारतीय सेना के पूर्व डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस अनिल भट्ट ने बात करते हुए डोकलाम विवाद से जुड़ी कई बातें बताईं। पूर्व डीजीएमओ अनिल भट्ट ने बताया कि डोकलाम इलाके को कब्जे में लेने का मंसूबा चीन काफी समय से पाले हुए हैं। इस इलाके में अगर चीन का नियंत्रण होता है तो सामरिक रूप से अहम जाम्फेरी रिज पर भी चीनी सेना का कंट्रोल हो जाएगा। पूर्व डीजीएमओ के अनुसार, अगर जाम्फेरी रिज पर भी चीनी सेना का कंट्रोल होता है तो सिलिगुड़ी कॉरिडेर पर भी खतरा बढ़ जाएगा। चीन इस इलाके में लंबे समय से पेट्रोलिंग कर रहा है। लेकिन, चीन की रणनीति धीरे-धीरे आगे बढ़कर जमीन कब्जा करने की थी। पूर्व डीजीएमओ अनिल भट्ट ने आगे कहा कि हम चीन के मंसूबों से परिचित थे लेकिन वो जगह भूटान की थी इसलिए भारतीय सेना बेहद संयम से काम कर रही थी। लेकिन, साल 2017 में स्थितियां बदल गईं. एक दिन अचानक पता चला कि चीनी सैनिक उपकरण लेकर एक सड़क बनाने के लिए पहुंच गए हैं।
भारतीय सेना ने चीन को कैसे रोका: पूर्व डीजीएमओ ने बताया कि अगर चीन वह सड़क अगले कुछ दिनों में बना लेता तो उसके सैनिक पहले जाम्फेरी रिज तक आते और फिर चिकन नेक पर खतरा मंडराने लगता। अनिल भट्ट ने कहा कि जिस दिन उन्हें सुबह इस बारे पता चला उन्होंने पूरी घटना के बारे में अपने चीफ जनरल बिपिन रावत को बताया। तुरंत ये तय हुआ कि चीनी सैनिकों को सड़क बनाने से रोकना है।
पूर्व डीजीएमओ अनिल भट्ट ने आगे कहा कि भारतीय सेना ऐसी स्थिति के लिए पहले से ही तैयार थी और हमारे पास अतिरिक्त रिजर्व सैनिक मौजूद थे। इस दौरान पूर्व डीजीएमओ एक अहम बात भी बताई. उन्होंने कहा कि हमने पहले एक्शन किया और फिर अपने राजनीतिक नेतृत्व को बताया। इस बीच उच्च स्तर पर लगातार स्थिति की जानकारी दी जाती रही। अनिल भट्ट ने कहा कि हमें पूरा भरोसा था कि हम जो कर रहे हैं उसे देश के प्रधानमंत्री का पूरा समर्थन मिलेगा।पूर्व डीजीएमओ अनिल भट्ट ने कहा कि 1962 और 2017 में यही एक बड़ा फर्क था। न तो फौज निर्णय लेने के लिए पीछे देख रही थी न ही राजनीतिक नेतृत्व निर्णय लेने में देरी कर रहा था। सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व का मत स्पष्ट था कि देश की सुरक्षा के लिए अगर खतरा है तो चीन को रोका जाएगा भले ही लड़ाई लग जाए।
पूर्व डीजीएमओ अनिल भट्ट ने बताया कि डोकलाम टकराव पूरे 75 दिन चला और बीच में कई बार ऐसा लगा कि युद्ध शुरू हो जाएगा।उन्होंने कहा कि सेना के शौर्य और राजनीतिक नेतृत्व के दृढ़ निश्चय से चीन को रोका भी गया और शांति भी बनी रही। पूर्व डीजीएमओ ने कहा कि डोकलाम टकराव के दौरान शीर्ष नेतृत्व की अवेयरनेस और आपसी तालमेल शानदार रहा। ( अशोक झा की रिपोर्ट )
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