आज देश राष्ट्रीय युवा दिवस मना रहा है। लोग उनके आदर्शों और विचारों पर चलने की बात कर रहे है। लेकिन जिस नरेंद्र ने लाहौर की धरा पर खड़ा होकर लोगों को हिंदुत्व का पाठ पढ़ाया क्या नेता ओर युवा आज अपने घर में भी हिंदुत्व की बात करने से क्यों डरते है? हम क्या वोट बैंक के डर से अपनी आत्मा को ही बेच देंगे? हम आपको बता रहे है कि विवेकानंद की जयंती 12 जनवरी पर पढ़िए लाहौर में हिंदू धर्म पर दिए उनके भाषण के कुछ अंश।
'यह वही भूमि है, जो पवित्र आर्यावर्त में पवित्रतम मानी जाती है। यह वही ब्रह्मावर्त है जिसका उल्लेख हमारे महर्षि मनु ने किया है...यह वही भूमि है, जहां से उसकी वेगवती नद-नदियों के समान आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षाएं उत्पन्न हुईं और धीरे-धीरे एक धारा में सम्मिलित होकर शक्तिसम्पन्न हुईं और अंत में संसार की चारों दिशाओं में फैल गईं...यह वही वीरभूमि है, जिसे भारत पर चढ़ाई करनेवाले शत्रुओं के सभी आक्रमणों और अतिक्रमणों का आघात सबसे पहले सहना पड़ा था। आर्यावर्त में घुसनेवाली बाहरी बर्बर जातियों के प्रत्येक हमले का सामना इसी वीरभूमि को अपनी छाती खोलकर करना पड़ा था. यह वही भूमि है, जिसने इतनी आपत्तियां झेलने के बाद भी अब तक अपने गौरव और शक्ति को एकदम नहीं खोया. यही भूमि है, जहां बाद में दयालु नानक ने अपने अद्भुत विश्वप्रेम का उपदेश दिया. जहां उन्होंने अपना विशाल हृदय खोलकर सारे संसार को केवल हिंदुओं को ही नहीं बल्कि मुसलमानों को भी-गले लगाने के लिए अपने हाथ फैलाये. यहीं पर हमारी जाति के सबसे बाद के और महान तेजस्वी वीरों में से एक गुरु गोबिंद सिंह ने धर्म की रक्षा के लिए अपना एवं अपने प्राणप्रिय कुटुम्बियों (परिवार के सदस्यों) का रक्त बहा दिया. और जिनके लिए यह खून की नदी बहाई गई, उन लोगों ने भी जब उनका साथ छोड़ दिया, तब वे मर्माहत सिंह की भांति चुपचाप दक्षिण देश के निर्जनवास के लिए चले गए और अपने देशवासी भाइयों के प्रति अधरों पर एक भी कटु वचन न लाकर बिल्कुल भी असंतोष प्रकट न कर, शांत भाव से इहलोक छोड़कर चले गए।
हे पंचनद-देशवासी भाइयो! यहां अपनी इस प्राचीन पवित्र भूमि में तुमलोगों के सामने मैं आचार्य के रूप में नहीं खड़ा हुआ हूं. कारण, तुम्हें शिक्षा देने योग्य ज्ञान मेरे पास बहुत ही थोड़ा है. मैं तो पूर्वी प्रांत से अपने पश्चिमी प्रांत के भाइयों के पास इसलिए आया हूं कि उनके साथ हृदय खोलकर वार्तालाप करूं. उन्हें अपने अनुभव बताऊं और उनके अनुभव से स्वयं लाभ उठाऊं. मैं यहां यह देखने नहीं आया कि हमारे बीच क्या मतभेद हैं बल्कि मैं तो यह खोजने आया हूं कि हम लोगों की मिलनभूमि कौन-सी है? यहां मैं यह जानने का प्रयत्न कर रहा हूं कि वह कौन-सा आधार है, जिस पर हमलोग आपस में सदा भाई बने रह सकते हैं? किस नींव पर प्रतिष्ठित होने से वह वाणी, जो अनंत काल से सुनाई दे रही है, उत्तरोत्तर अधिक प्रबल होती रहेगी? मैं यहां तुम्हारे सामने कुछ रचनात्मक कार्यक्रम रखने आया हूं, ध्वंसात्मक नहीं. कारण, आलोचना के दिन अब चले गए और आज हम रचनात्मक कार्य करने के लिए उत्सुक हैं. यह सत्य है कि संसार को समय-समय पर आलोचना की जरूरत हुआ करती है, यहां तक कि कठोर आलोचना की भी, पर वह केवल अल्पकाल के लिए ही होती है...'
विवेकानंद ने कहा कि आज हमें एक महावाणी सुनाई दे रही है, 'बस करो, बस करो!' निंदा पर्याप्त हो चुकी, दोष-दर्शन बहुत हो चुका! अब तो पुनर्निमाण का, फिर से संगठन एकत्र करने का, उनसे सबको एक ही केंद्र में लाने का और उस सम्मिलित शक्ति द्वारा देश को सदियों से रुकी हुई उन्नति के मार्ग में अग्रसर करने का समय आ गया है. घर की सफाई हो चुकी है. अब आवश्यकता है उसे नए सिरे से आबाद करने की. रास्ता साफ कर दिया गया है। आर्य संतानो, अब आगे बढ़ो!सज्जनो! इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर मैं आपके सामने आया हूं और आरम्भ में ही यह प्रकट कर देना चाहता हूं कि मैं किसी दल या विशिष्ट सम्प्रदाय का नहीं हूं. सभी दल और सभी सम्प्रदाय मेरे लिए महान् और महिमामय हैं. मैं उन सबसे प्रेम करता हूं और अपने जीवनभर मैं यही ढूंढ़ने का प्रयत्न करता हूं कि उनमें कौन-कौन सी बातें अच्छी और सच्ची हैं इसीलिए आज मैंने संकल्प किया है कि तुमलोगों के सामने उन बातों को पेश करूं, जिनमें हम एकमत हैं, जिससे कि हमें एकता की सम्मिलनभूमि प्राप्त हो जाय और अगर ईश्वर के अनुग्रह से यह सम्भव हो तो आओ, हम उसे ग्रहण करें और उसे सिद्धान्त की सीमाओं से बाहर निकालकर कार्यरूप में परिणत करें। हमलोग हिन्दू हैं. मैं 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग किसी बुरे अर्थ में नहीं कर रहा हूं और मैं उनलोगों से कदापि सहमत नहीं, जो उससे कोई बुरा अर्थ समझते हों. प्राचीन काल में उस शब्द का अर्थ था- सिन्धुनद के दूसरी ओर बसनेवाले लोग. हमसे घृणा करने वाले बहुतेरे लोग आज उस शब्द का कुत्सित अर्थ भले ही लगाते हों, पर केवल नाम में क्या धरा है?... अगर आज 'हिन्दू' शब्द का कोई बुरा अर्थ है तो उसकी परवाह मत करो. आओ, अपने कार्यों और आचरणों द्वारा यह दिखाने को तैयार हो जाओ कि समग्र संसार की कोई भी भाषा इससे ऊंचा, इससे महान् शब्द का आविष्कार नहीं कर सकी है. मेरे जीवन के सिद्धान्तों में से एक यह भी सिद्धान्त रहा है कि मैं अपने पूर्वजों की सन्तान कहलाने में लज्जित नहीं होता. मुझ जैसा गर्वीला मानव इस संसार में शायद ही हो।
दुनियाभर के घुमक्कड़ पत्रकारों का एक मंच है,आप विश्व की तमाम घटनाओं को कवरेज करने वाले खबरनवीसों के अनुभव को पढ़ सकेंगे
https://www.roamingjournalist.com/